भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पुष्टि बिगडती । कांति उतरती । मान भी कांपती । अस्थिरतासे ॥ ५६ ॥ बाल सब पकते । अंगांग भी कांपते । तो भी फंसे रहते । माया-जालमें ॥ ५७ ॥ सामनेका जब नहीं टकराता । तब तक अंधा कुछ न जानता । अथवा आंखोंके नशा पर होता । आलसी संतुष्ट ॥ ५८ ॥ भोगता वैसे ही आजका यौवन । तो आ पहुंचता वार्धक्य दारुण । नहीं देखता इसको जो अज्ञान । कहलाता पार्थ ॥ ५९ ॥ दुबला कुबडा देखकर । चिढाता है अकडकर । कल होगा अपना शरीर । ऐसा यह न जानता ॥ ७६० ॥ शरीरमें वार्धक्य दीखता । जो है मृत्यूका संदेश देता । किंतु वह भ्रममें रहता । अपने तारुण्यके ॥ ६१ ॥ वह है अज्ञानका आगार । और भी सुन लक्ष देकर । और भी लक्षण धनुर्धर । कहता हूं मैं ॥ ६२ ॥ १४ अज्ञानका लक्षण, रोगसे असावधान— जैसे कभी व्याघ्र वनसे । चरके लौटा जो दैवसे । फिर जाता है ढिटायीसे । जैसे सांड ॥ ६३ ॥ अथवा घरसे सांपके । द्रव्य अचानक उठाके । लाता जो मानता सांपके । नहीं होते दांत ॥ ६४ ॥ वैसे ही कभी अकस्मात । होता है एक दो घटित । मानता है वह निश्चित । नहीं है रोग ॥ ६५ ॥ देखकर जो शत्रू सोया । मानता वैर मिट गया । उसने सर्वस्व ही खोया । अपना जैसे ॥ ६६ ॥ वैसे आहार निद्राका व्यवस्थित । चलते हैं व्यवहार नियमित । तब तक है व्याधिसे निश्चित । रहता जो ॥ ६७ ॥ ४९३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग