भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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तन त्यागके बिन । अमूर्तके जो गुण । दीखते हैं संपूर्ण । योग-युक्तमें ॥ ३९ ॥ वैसे उसका भी होता शरीर । अन्योंकी भाँति करता व्यापार । एक जैसा सबका व्यवहार । उसका भी ॥ ४० ॥ वह भी आंखोंसे देखता । वैसे ही कानसे सुनता । किंतु वह लिप्त न होता । उसमें कभी ॥ ४१ ॥ यदि वह सबको स्पर्शता । घ्राणसे परिमल भी लेता । समयोचित वह बोलता । सबके भाँति ॥ ४२ ॥ आहारको स्वीकारता । तजना जो तजता । निद्रा समयमें सोता । सुखसे वह ॥ ४३ ॥ अपनी ही इच्छासे । वह चलता जैसे । सकल कर्म वैसे । चलते हैं ॥ ४४ ॥ यह कहना क्या एकेक । देखें श्वासोच्छ्वासादिक । वैसे ही निमिषोन्निमिष । आदि सब ॥ ४५ ॥ पार्थ वह सब करता । कोई कर्म नहीं छोड़ता । किया ऐसा बोध न होता । प्रतीतिसे ॥ ४६ ॥ भ्रांतिकी सेज पर जो सोया था । स्वप्न रंजनमें जो उलझा था । ज्ञानोदयसे वह 'है, जगा था । इसीलिये ॥ ४७ ॥ ब्रह्मण्याधाय कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवांभसा ॥ १० ॥ चैतन्यके आश्रयसे अब । इंद्रियोंकी वृत्तियां सब । बरतती हैं अपने तब । स्वभावसे ॥ ४८ ॥ जैसे दीपकके प्रकाशसे । व्यापार होते घरके जैसे । चलते शरीर कर्म वैसे । योगयुक्तके ॥ ४९ ॥ ब्रह्मार्पित करे कर्म करता संग छोड़के । न होता पापसे लिप्त जलमें पद्म-पत्रसा ॥ १० ॥ (18) १३७ कर्म-संन्यासयोग