भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 204

जो यह योग स्थिति है तजता । व्यर्थ ही उलझनमें पड़ता । उससे प्राप्त कभी नहीं होता । संन्यास साध्य ॥ ३३ ॥ योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः । सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥ संकल्पशून्य मन चैतन्यमय हो, सर्वव्यापी बनता है— जिसने भ्रांतिसे है छुड़ा लिया । गुरुवाक्यसे मनको धो दिया । आत्म रूपमें फिर ढाल दिया । धुलकर ॥ ३४ ॥ सागरमें जब नून गिरता । तब तक वह अल्प रहता । फिर वह समुद्रसा बनता । विलीन होकर ॥ ३५ ॥ वैसे तो संकल्पसे हुआ भिन्न । चैतन्य रूप हुआ उसका मन । सीमित होकर भी तनसे मन । व्यापता लोकत्रय ॥ ३६ ॥ कर्ता कर्म फिर काज । कटा जिसका सहज । अनुभवता वह सहज । अकर्तापन ॥ ३७ ॥ नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित् । पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् ॥ ८ ॥ प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९ ॥ जिसका मन अर्जुन । मैं देह हूं यह भान । भूला उसे न रहा जान । कर्तापन कछु ॥ ३८ ॥ चित्तसे शुद्ध जो योगी जीतके मन इंद्रिय । बना है जीव भूतोंका करके भी अलेप जो ॥ ७ ॥ मानके अकर्ता आप योगी तत्वज्ञ जो नित । देखें सुने छुये सूंघे खाये सुवे चले करे ॥ ८ ॥ बोले छोडे पकडे या हिलावे बरुनी यदि । इंद्रिया करतीं आप अपना कर्म जानता ॥ ९ ॥ ज्ञानेश्वरी १३६