भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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ज्ञान है जो थिर वांछित । मिले वह उसे निश्चित । जिसमें होती अचुंबित । शांति-सुख ॥ ८९ ॥ हृदयमें जब ज्ञान होता । तब शांति-अंकुर फूटता । उससे विस्तार प्रकटता । आत्मबोधका ॥ ९० ॥ फिर जहां देखे वहां । सर्वत्र ही जहां तहां । न दीखे तीर है कहां । शांति सिंधुका ॥ ९१ ॥ ऐसा यह उत्तरोत्तर । ज्ञान बीजका है विस्तार । कहा है उसको अपार । धनंजय ॥ ९२ ॥ अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति । नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ ४० ॥ संदेह विनाशका घर है— जिन प्राणियोंमें ज्ञानकी । चाह नहीं वह पानेकी । क्या कहें ऐसे जीवनकी । उससे भली मौत ॥ ९३ ॥ शून्य है जैसे गृह । या प्राण बिनु देह । है जीवित सम्मोह । ज्ञानके बिन ॥ ९४ ॥ हुआ नहीं प्राप्त वह ज्ञान । चाह करता पानेका मन । तब है आशा यह तू जान । पानेकी वह ॥ ९५ ॥ किंतु बात है कैसे ज्ञानकी । आस्था नहीं मनमें उसकी । तो पड़ा है संदेह रूपकी । अग्निमें वह ॥ ९६ ॥ जब अमृत भी नहीं भाता । ऐसा आस्वाद-स्वभाव होता । तभी जानना मरण आता । निकट सत्वर ॥ ९७ ॥ विषय सुखमें जो है रंगता । ज्ञानसे नित विमुख रहता । निश्चय ही संशयमें पड़ता । जानना वह ॥ ९८ ॥ न है ज्ञान न है श्रद्धा संशयीका विनाश है । दोनों ही लोकमें पार्थ न पाता सुख संशयी ॥ ४० ॥ ज्ञानेश्वरी १२८