भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 195

असंभव है ऐसा होना । अशक्य है ऐसा सोचना । जगतमें ज्ञान समान । पवित्र नहीं कछु ॥ ७८ ॥ ज्ञान यहां अति उत्तम है । ऐसा क्या अन्य समान है । ज्ञान जो महा चैतन्य है । विश्वमें ॥ ७९ ॥ इस महातेज पे कसनेसे । निर्मल है यह सूर्य बिंबसे । समेटलें यह समेटनेसे । आकाशको भी ॥ १८० ॥ या तौलकर देखनेमें । इस पृथ्वीकी तुलनामें । यदि कुछ है तो विश्वमें । ज्ञान ही है ॥ ८१ ॥ बहुविध विचारनेसे । पुनः पुनः सोचनेसे । पवित्र यहां ज्ञानसे । ज्ञान ही है ॥ ८२ ॥ खोजनेसे अमृतका रस जैसा । अमृतमें ही मिलता है वैसा । ज्ञानके समान ज्ञान ही वैसा । जानना पार्थ ॥ ८३ ॥ इस पर है अब बोलना । व्यर्थका है समय बिताना । सच कहता सुन अर्जुन । जो कहा तूने ॥ ८४ ॥ उस ज्ञानको तब कैसे जानना । अर्जुनके मनमें यह पूछना । जानकर उसकी मनो कामना । कहा अच्युतने ॥ ८५ ॥ फिर कहता है किरीटी । चित दे सुन यह गोष्ठी । कहता हूँ ज्ञानकी भेटी । होगी कैसी ॥ ८६ ॥ श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ३९ ॥ आत्म-सुखकी माधुरीसे । उकताता है विषयोंसे । इंद्रियोंका कभी उनसे । न होता भाव ॥ ८७ ॥ मनमें जो चाह नहीं धरता । प्रकृति कर्मको न स्वीकारता । सुख रूप होकरके रहता । श्रद्धा भोगमें ॥ ८८ ॥ श्रद्धालु ज्ञान पाता है संयमी नित्य सावध । ज्ञानसे शीघ्र पाता है शांति अंतिम पावन ॥ ३९ ॥ १२७ ज्ञान-कर्म-संन्यास योग