भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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डूबा यदि संशय सागरमें । नष्ट हुआ निश्चित जीवनमें । वंचित हुआ इह औ' परमें । सुखसे वह ॥ ९९ ॥ किसीको जब कालज्वर आता । वह जैसे शीतोष्ण न जानता । जैसे वह चांदनी औ' उष्णता । मानता एक-सा ॥ २०० ॥ वैसे वह जो सत औ' असत । अनुकूल औ' प्रतिकूल बात । नहीं जानता हित औ' अहित । संशयग्रस्त जो ॥ १ ॥ यह है दिवस औ' यह रात । जन्मांध न जानता यह बात । वैसे ही होता है संशयग्रस्त । मनमें सदा ॥ २ ॥ तभी संशयसे भयंकर । अन्य नहीं पाप कोई घोर । वह है विनाशका भंवर । प्राणियोंका ॥ ३ ॥ इस कारणसे तुझे तजना । पहले इस बातको जानना । ज्ञानाभावमें इसका रहना । जान निश्चित ॥ ४ ॥ पड़ता अज्ञानका गहरा अंधार । बढ़ता यह चितमें अपरंपार । जिससे है पथावरोध धनुर्धर । श्रद्धाका सदा ॥ ५ ॥ योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् । आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ॥ ४१ ॥ ज्ञान खड्ग— हियमें ही यह नहीं समाता । बुद्धि पर भी पर्दा डालता । जिससे संशयात्मक हो जाता । भुवन-त्रय ॥ ६ ॥ इतना है इसका बडप्पन । उसे जीवनका एक साधन । यदि करमें होता है महान । ज्ञान खड्ग ॥ ७ ॥ उस तीखे ज्ञान खड्गसे । मिटता यह मूल रूपसे । मल होता मनका जिससे । सदा निर्मूल ॥ ८ ॥ योगसे छांटके कर्म ज्ञानसे छिन्न संशय । जो सावधान आत्मामें उसे कर्म न बांधते ॥ ४१ ॥ (17) १२९ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग