ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजी ! मनमें ही जो नहीं । अहिंसाका नाम भी कहीं । बाहर प्रगटे भी वही । कहो कैसे ॥ ९७ ॥ होती है जिसकी चाह पार्थ । वृत्ति वह मनमें उदित । होती वह फिर प्रकाशित । वाचादि इंद्रियोंसे ॥ ९८ ॥ मनमें जो है ही नहीं । वाचादिसे क्या कभी कहीं । बीज बिन अंकुर कहीं । उगता है क्या ॥ ९९ ॥ उगम ही जहां सूख जाता । प्रवाह कहो कैसे बहता । जीव आने पर भी क्या होता । कहीं उद्योग ॥ ३०० ॥ मनका जब ममत्व टूटता । इंद्रियोंका व्यापार ही मिटता । सूत्रधार बिना नहीं चलता । गुड़ियाका खेल ॥ १ ॥ मन है वैसे पांडव । उसका मूल इंद्रिय भाव । व्यापार करता यही सर्व । इंद्रियों द्वारा ॥ २ ॥ किंतु जो समयके अनुसार । वासना रूप बनके अंदर । कार्य था वह रूपसे बाहर । आता इंद्रियोंसे ॥ ३ ॥ इसीलिये मनमें यथार्थ । होती है अहिंसा विकसित । पक्व सुगंध हो उल्लसित । फैलता वैसे ॥ ४ ॥ इन्द्रियां ही मनकी 'संपदा । बेचती हैं सर्वत्र सर्वदा । और है जो अहिंसाका धंदा । करती रहती हैं ॥ ५ ॥ जब आता समुद्रमें उभार । भरते हैं आखात चहूं ओर । स्व-संपत्तिसे चित्त बार बार । भरता इन्द्रियोंको ॥ ६ ॥ अजी ! जैसे सदा पंडित । बालकका पकड हाथ । अक्षर करता है व्यक्त । अपने आप ॥ ७ ॥ वैसे अपना दयालूपन । हाथ पैरमें लाता है मन । करता फिर वहां उत्पन्न । अहिंसाके ॥ ८ ॥ इससे किया मैंने अर्जुन । इन्द्रियोंका अहिंसा-वर्णन । इससे है मनका दर्शन । होता स्पष्ट ॥ ९ ॥ ४५५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग