ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस भांति तन मन वचन । करता है दंड-त्याग अर्जुन । इसका ही होगा वहां दर्शन । सदा सर्वत्र ॥ ३१० ॥ ऐसा पुरुष है चर । ज्ञानका ही है मंदिर । यह है वह धनुर्धर । स्वयं ज्ञान-मूर्ति ॥ ११ ॥ करते जो अहिंसाका श्रवण । या ग्रंथोंमें होता है निरूपण । करना हो तो उसका दर्शन । इसीमें होगा ॥ १२ ॥ अहिंसा विवेचनमें वाग्विस्तारकी क्षमायाचना कहना था देवका एक वचन । किया मैंने सुविस्तृत विवेचन । इसलिये करता क्षमा-याचन । आपसे मैं ॥ १३ ॥ हराभरा चारा देख जानवर । भूल जाता है लौट आना जो घर । पवन-गतिमें उड़ता अंबर । इससे दूर जाता पंछी ॥ १४ ॥ वैसे है प्रेमकी स्फूर्ति । खिलाती है रस-वृत्ति । बहते जाती है मति । स्वैर भावसे ॥ १५ ॥ वैसे भी नहीं अवधार । स-कारण किया विस्तार । वैसे शब्दके हैं अक्षर । केवल तीन ॥ १६ ॥ अजी ! शब्द है अहिंसा साधारण । उसपे पडा मतोंका आवरण । करनेसे उन मतोंका खंडन । स्पष्ट होता भाव ॥ १७ ॥ वैसे प्राप्त जो मत-मतांतर । उसका निरसन नहीं कर । अपनी भी बात कही दो-चार । न चलेगा वहां ॥ १८ ॥ अजी ! रत्न-पारखियोंके गांवमें । गांठसे गंडकी खोले बेचनेमें । अधुरा भान स्तवन करनेमें । न करें क्या स्तुति शारदाकी ॥ १९ ॥ सुगंध मंद है कर्पूरमें । कहते हैं जिस समाजमें । आटेको कपूर कहनेमें । धैर्य हो कसे ॥ ३२० ॥ इसीलिए सभामें ऐसे । मात्र बातूनी बननेसे । मिले आपका प्रेम कैसे । तभी बोला प्रभु ॥ २१ ॥ ज्ञानेश्वरी ४५६