भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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फिर कहता यह सुन । उस भक्तके ये लक्षण । उसको मैं अंतःकरण । आसनार्थ देता हूं ॥ ६४ ॥ यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः । हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५ ॥ भक्त भय-उद्वेग रहित— जैसे सागरके भीतर । भीत न होता जलचर । या जलचरोंसे सागर । उकताता नहीं ॥ ६५ ॥ वैसे ही उन्मत्त जगत । न करता उसे दुखित । तथा न ऊबता जगत । उससे कभी ॥ ६६ ॥ अथवा मान तू पांडव । जैसे तनको अवयव । नहीं ऊबते वैसे जीव । औ' जीवोंसे वह ॥ ६७ ॥ विश्व ही जैसे देह हो गया । इसलिए प्रिया-प्रिय गया । हर्ष शोकादि द्वन्द्व भी गया । द्वैत मिटनेसे ॥ ६८ ॥ ऐसा द्वन्द्वसे जो मुक्त । भय उद्वेग रहित । फिर भी अनन्य भक्त । वह मेरा ॥ ६९ ॥ तभी है वह मेरा प्रिय । दिखाऊँ कैसा मेरा हिय । वह है मुझमें तन्मय । इससे जीता हूं ॥ १७० ॥ जो है निजानन्दमें तृप्त । मानो ब्रह्मको जन्म प्राप्त । पूर्णताका वह है आप्त । वल्लभ जैसा ॥ ७१ ॥ अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः । सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १६ ॥ ऊबता जो न लोगोंसे न ऊबे उससे जन । हर्ष-शोक भय क्रोध न जाने जो मुझे प्रिय ॥ १५ ॥ नहीं व्यथा उदासीन दक्ष निर्मल निस्पृह । तजे आरंभ जो सारे भक्त है मुझको प्रिय ॥ १६ ॥ ४२१ भक्तियोग