ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवर्षा-ऋतुके बिना सागर । पूर्ण रहता आत्म-निर्भर । वैसा ही वह निरुपचार । सदा-संतुष्ट ॥ ५१ ॥ देकर अपनी सौगंध । देता है हृदयको बोध । इससे निश्चयमें बाध । न आता कभी ॥ ५२ ॥ हृदय-भुवनमें जिसके । एक ही आसन पे बैठके । शासन करते विराजके । जीव-परमात्मा ॥ ५३ ॥ ऐसी योग समृद्धि । पाकर निरवधि । चढाके मन-बुद्धि । मुझपे ही ॥ ५४ ॥ बाहर भीतर योग । शुद्धतामें भी सुबग । फिर भी ममानुराग । जिसे सप्रेम ॥ ५५ ॥ अर्जुन ऐसे जो भक्त । वही योगी तथा मुक्त । वह वल्लभा मैं कांत । ऐसे जान ॥ ५६ ॥ उससे मुझे जो प्रेम है । जीवनसे भी अधिक है । यह बात भी अपूर्ण है । कहूं कैसे ॥ ५७ ॥ अजी ! भक्तोंकी जो कहानी । मुझपे मोहके मोहिनी । अकथनीय है कथनी । कहलाती श्रद्धा ॥ ५८ ॥ इसीलिए जी हम । कह गये उपमा । वैसे तो वह प्रेम । रहता मौन ॥ ५९ ॥ रहने दो यह किरीटी । प्रिय जनोंकी यह जो गोष्टि । प्रेमसे जो पुलक उठी । अति वेगसे ॥ १६० ॥ उसपर भी हे पार्था । सकल संवाद-कर्ता । उसको यहां यथार्थ । उपमा भला ॥ ६१ ॥ इसीलिए पांडुसुता । प्रिय तू औ' तू ही श्रोता । फिर प्रियकी ही वार्ता । प्रसंग आया है ॥ ६२ ॥ तभी मैं अब बोलता । बोलका सुख भोगता । कहके हरि डुलता । आनंद मगन ॥ ६३ ॥ ज्ञानेश्वरी ४२०