ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह है ऐसा पथ । इस पथसे पार्थ । शांतिका ही मध्यस्थ । प्राप्त करता है ॥ ४३ ॥ अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुणा एव च । निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १३ ॥ भक्तकी स्थिति-गुण-विकास— अजी प्राणि मात्रमें कहीं । द्वेषका जो नाम भी नहीं । आप-पर-भाव भी नहीं । चैतन्यका-सा ॥ ४४ ॥ उत्तमका करना स्वीकार । अधमका करें अस्वीकार । नहीं जानती ऐसा प्रकार । जैसे धरणी ॥ ४५ ॥ राजाके तनको चलाना । रंक-शरीरको हनना । न सोचता कृपालु प्राण । वैसा ही वह ॥ ४६ ॥ करें गायका तृषा-निवारण । विष बन व्याघ्रको दे मरण । न जानता ऐसा एक भी क्षण । नदी-नीर ॥ ४७ ॥ वैसे हैं सभी भूत-मात्र । उसके समान जो मित्र । जैसे धात्रीको है सर्वत्र । सम-भाव ॥ ४८ ॥ मैं तूकी भाषा बोलना । सुख-दुःखको जानना । “मेरा” ऐसा भी कहना । नहीं है उसे ॥ ४९ ॥ क्षमामें वैसी ही क्षमता । धरित्री समान योग्यता । संतोष नित है बढ़ता । उसकी गोदमें ॥ १५० ॥ संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १४ ॥ किसीका न करे द्वेष दया मैत्री बना क्षमा । मैं मेरा सब भूला जो सहके सुख दुःखको ॥ १३ ॥ सदा संतुष्ट जो योगी संयमी दृढ निश्चयी । मन-बुद्धि मुझे देता भक्त है मुझको प्रिय ॥ १४ ॥ ४१९ भक्तियोग