ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजैसे उठती अग्नि-ज्वाल । आकाशमें व्यर्थ सकल । वैसे लय हो कर्म-फल । शून्यमें ही ॥ ३३ ॥ अर्जुन यह जो फल त्याग । दीखता है अति असंग । योगमें है यह महायोग । सर्वोत्कृष्ट ॥ ३४ ॥ फल-त्याग यह अविकार । जिससे न हो कर्म विस्तार । अंकुरता वेणु एक बार । उसी भांति ॥ ३५ ॥ इस शरीरसे ही शरीर । पाना है रुकता बार बार । पुनरागमनपे पत्थर । पड़ता मानो ॥ ३६ ॥ अभ्यासकी महत्ता— फिर अभ्यासका सोपान । सौंपता है ज्ञानका स्थान । ज्ञानसे ध्यानका मिलन । सहज होगा ॥ ३७ ॥ ध्यानका तब आलिंगन । करते हैं भाव संपूर्ण । रहते तब दूर जान । कर्म-जात ॥ ३८ ॥ जहां कर्म ही दूर है । फल-त्याग सरल है । त्यागका जो सहज है । शांति-सुख ॥ ३९ ॥ शांतिके लिये है तब । अभ्यास करना अब । क्रमागत ही है सब । सुभद्रापति ॥ १४० ॥ श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते । ध्यानात् कर्मफलत्यागः त्यागाच्छान्तिरनंतरम् ॥ १२ ॥ अभ्याससे भी गहन । अर्जुन फिर है ज्ञान । ज्ञानसे भी है जो ध्यान । महत्वका ॥ ४१ ॥ फिर है कर्म-फल-त्याग । जो है ध्यानसे भी सुभग । उससे श्रेष्ठ है जो भोग । शांति सुखका ॥ ४२ ॥ मिलता यज्ञसे ज्ञान होती तन्मयता फिर । तब पूर्ण फल-त्याग देता है शांति सत्वर ॥ १२ ॥ ज्ञानेश्वरी ४१८