भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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कर्म जो होता है तुझे प्राप्त । न मान तू अल्प या बहुत । चुपचाप कर तू अर्पित । मुझको सदा ॥ २३ ॥ ऐसी ही मद्भावना । तन त्यागमें अर्जुना । तू सायुज्य सदन । पायेगा मेरा ॥ २४ ॥ कर्म-रत रहकर कर्म फल समर्पण— अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः । सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥ ११ ॥ न तो यह भी तुझे । न दे सके कर्म मुझे । तब तू सतत मुझे । भजते जा ॥ २५ ॥ बुध्दिके पेट पीठमें । कर्मके आदि अंतमें । मुझको जोड़ देनेमें । यदि है दुस्तर ॥ २६ ॥ तो यह भी रहने दो । मदर्पणकी जाने दो । किंतु निग्रही होने दो । बुध्दि तेरी ॥ २७ ॥ और जैसे जिस काल । कर्म होते हैं सकल । उसके वे सब फल । तजते जा ॥ २८ ॥ जैसे वृक्ष अथवा वेल । गिरा देते हैं पक फल । वैसे त्यज दे फल सकल । कर्म सिद्धिके ॥ २९ ॥ मनमें मेरा करना स्मरण । अथवा मुझे करना अर्पण । यदि है तुझे यह अग्रहण । जाने दे शून्यमें ॥ ३० ॥ जैसे पत्थर पे पड़ी वर्षा व्यर्थ । तथा आगमें हुई बुवाई व्यर्थ । अथवा देखा हुआ स्वप्न है व्यर्थ । वैसा कर्म-फळ ॥ ३१ ॥ अजी ! जैसे आत्मजामें । जीव निष्काम मनमें । वैसे सकल कर्ममें । अकाम होना ॥ ३२ ॥ ऐसा कर्म न होता तो मुझमें योग साधके । यत्नसे छोड़ तू सारे कर्मके फल अर्जुन ॥ ११ ॥ (53) ४१७ भक्तियोग

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