भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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संतका पावन चरित— न है उसमें अपेक्षा । वैसी ही नहीं उपेक्षा । जीवन बिन आकांक्षा । केवल आत्मोत्कर्ष ॥ ७२ ॥ मोक्ष देनेमें उदार । काशी नामका आदर । किंतु उसमें शरीर । त्यजना होगा ॥ ७३ ॥ पाप हरता हिमवंत । भयभीत कर जीवित । संतका पावन चरित । वैसा नहीं ॥ ७४ ॥ पावन है गंगोदक । पाप तापका शामक । किंतु उसमें है एक । डूबनेका भय ॥ ७५ ॥ गहराई जिसकी अपार । किंतु डूबनेका है डर । रोकड़ मोक्षका है घर । जीवनमें ही ॥ ७६ ॥ संतोंके चरण स्पर्शसे । मुक्त है गंगा भी पापसे । ऐसे संत-संगके कैसे । कहना शुचित्व ॥ ७७ ॥ अजी ! यह रहने दो अब । बना तीर्थोंका आश्रय सब । धोकर मनका मल शुभ- । शुचित्वसे ॥ ७८ ॥ होता तन मनसे निर्मल । सूर्यके समान है उज्ज्वल । तत्त्वार्थिथोंमें है पायल । ब्रह्म-धनका ॥ ७९ ॥ व्यापक तथा उदास । रहता जैसे आकाश । वैसे उसका मानस । सदा-सर्वत्र ॥ १८० ॥ जो है संसार-व्यथासे मुक्त । निरपेक्षाळंकार-भूषित । मानो व्याध-बाणसे विमुक्त । विहंगमसा ॥ ८१ ॥ सुखमें जो है लीन सतत । न होती कभी टीस प्रतीत । न जाने जैसे लज्जाको प्रेत । उसी भांति ॥ ८२ ॥ तथा कार्यारंभका है नहीं । अहंकार तनिक भी कहीं । जैसा निर्इंधन होके वह्नि । बुझ जाता है ॥ ८३ ॥ ज्ञानेश्वरी ४२२