ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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ऐसा हुआ जब उपशम । मोक्ष-सत्रमें लिखाया नाम । हुआ है वह निष्काम-काम । धनंजय ॥ ८४ ॥ अर्जुन वह यहीं पर । सोऽहं भावसे भरकर । पहुंच चुका उस पार । द्वैत-भावके ॥ ८५ ॥ किंतु भक्ति-सुखके कारण । कर अपना दो विभाजन । सेवा धर्मका अंगीकरण । करता आप ॥ ८६ ॥ अन्यको है मैं कहता । फिर स्तोत्र नहीं होता । भक्तिका मार्ग दिखाता । योगी वह ॥ ८७ ॥ हमें है उसका व्यसन । उसका ही निज-ध्यान । या उसमें ही समाधान । मिलता हमको ॥ ८८ ॥ उसके लिये रूप-धारण । इस विश्वमें अवतरण । न्योछावर है उसपे प्राण । सर्व-भावसे ॥ ८९ ॥ यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न कांक्षति । शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यः स मे प्रियः ॥ १७ ॥ जो आत्म लाभके समान । सुन्दर कछु नहीं आन । तभी भोगमें न दें मन । न हो आनंदित ॥ ९० ॥ आप ही है विश्व बन गया । भेद भाव सहज धो गया । तब द्वेश भी है मिट गया । उस पुरुषका ॥ ९१ ॥ जो है अपना संतत्व । कल्पांतमें है अस्तित्व । तभी भूतका है स्वत्व । कभी न सोचता ॥ ९२ ॥ तथा उसके परे कुछ भी नहीं । अपना जो है अपने पास यहीं । तभी उसकी आकांक्षा है ही नहीं । कुछ भी कभी ॥ ९३ ॥
न उल्लास न संताप न चाह सोच भो नहीं । भला बुरा सभी छोडा भजता जो मुझे प्रिय ॥ १७ ॥ ४२३ भक्तियोग