भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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बीभत्स है या सुंदर । न जाने वह अंतर । जैसे जाने ना भास्कर । दिन औ' रात ॥ ९४ ॥ ऐसे बोधसे केवल । रहता है जो निष्कल । फिर भी भजनशील । मुझमें वह ॥ ९५ ॥ उसके समान और । नहीं हमें प्रियकर । कहता हूं धनुर्धर । सौगंध तेरी ॥ ९६ ॥ समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः । शीतोष्णसुखदुःखेषु समः संगविवर्जितः ॥ १८ ॥ भक्तकी सम-भावना— जिसके मनमें पार्था । नहीं वैषम्यकी वार्ता । रिपु-मित्रकी समता । रहे सदा ॥ ९७ ॥ अपनोंको प्रकाश देना । परायोंको अंधेरा देना । जैसा दीप यह सोचना । जानता नहीं ॥ ९८ ॥ करता जो वृक्ष-छेदन । या करता गाछ-पालन । दोनोंको दे छाया समान । जैसा वृक्ष ॥ ९९ ॥ मालीको देता मीठा रस । पेरकको न खट्टा रस । सबको है मधुर रस । देता ईख-सा ॥ २०० ॥ शत्रु-मित्रमें तैसा । उसका भाव ऐसा । रहता है एकसा । मानापमानमें ॥ १ ॥ तीनों ऋतुओंमें समान । रहता है जैसा गगन । वैसा ही एक समान । शीतोष्ण जिसे ॥ २ ॥ दक्षिण उत्तर मारुत । जैसा है मेरु पांडुसुत । तैसा सुख दुःख हो प्राप्त । मध्यस्थ है जो ॥ ३ ॥ सम जो शत्रु-मित्रोंमें मानापमानमें सम । शीतोष्ण सुख दुःखोंमें क्लिप्त सम-भावसे ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी ४२४