भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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चंद्रिकाकी शीतलता । राजा रंककी समता । वैसे जो सकळ भूत । है सामान ॥ ४ ॥ संपूर्ण जगत एक । जैसे सेवन उदक । वैसे उसकी त्रिलोक । करते चाह ॥ ५ ॥ अंतर बाह्य संग । करके सब अंग । शून्य हो अन्तरंग । वस्तुलीन ॥ ६ ॥ तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी संतुष्टो येन केनचित् । अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ १९ ॥ विश्व ही मेरा घर ऐसी जिसकी मति-- निंदासे जो न खिन्न । स्तुतिसे न प्रसन्न । रहे जैसा गगन । निर्लेप ॥ ७ ॥ जो निंदा और स्तुति । रखके एक पांति । रमता प्राण-वृत्ति । सदा-सर्वत्र ॥ ८ ॥ सत्यासत्यको जो समान । बोलकर रहता मौन । भोगता है सदा उन्मन । अतृप्त भावसे ॥ ९ ॥ लाभसे जो न हरषाता । न अलाभसे कुम्हलाता । वर्षाके बिन ना सूखता । समुद्र जैसा ॥ २१० ॥ जैसा वायुका इक ठौर । रहता नहीं है आधार । वैसा ही न उसका घर । कहीं रहता ॥ ११ ॥ संपूर्ण आकाश स्थिति । वायुकी नित्य-वसति । वैसे है विश्व विश्रांति- । स्थान उसका ॥ १२ ॥ विश्व ही यह मेरा घर । ऐसी मति जिसकी स्थिर । या हुआ जो सचराचर । अपनेमें आप ॥ १३ ॥ स्तुति-निंदा तजे मौनी संतुष्ट प्राप्त-भोगमें । स्थिर-बुद्धि निराधार भक्त जो है मुझे प्रिय ॥ १९ ॥ ४२५ भक्तियोग (54)