ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 503, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंअजी ! इसी स्थलके कारण । श्रुतिका चलता है भाषण । तर्ककी वाद वैखरी तीक्ष्ण । इसके लिये है ॥ १४ ॥ छाननेमें यह स्थान । थक गये हैं दर्शन । मिटे नहीं जो घर्षण । उनके कभी ॥ १५ ॥ अजी ! शास्त्रोंका भी नाता । इससे ही है टूटता । तथा इसीसे जुड़ता । झगडा जगतका ॥ १६ ॥ बातसे बात न मिलती । एक-वाक्यता नहीं होती । बनके वाचालता युक्ति । हुई समर्थ ॥ १७ ॥ न जाने किसका है यह स्थल । किंतु कैसी अभिलाषाका बल । घर घरमें है यह कपाल- । मोक्ष गाथा ॥ १८ ॥ नास्तिकोंसे करने मुठभेड़ । वेदोंने किया विद्रोह प्रचंड । उसको देख कर हैं पाखंड । बकवाद करते ॥ १९ ॥ कहते तुम निर्मूल । झूठा तुम्हारा वाग्जाल । प्रण हमारा है सबल । बीडा उठाकर ॥ २० ॥ पक्ष है जो पाखंड । नग्न लुंचित-मुंड । नियोजित वितंड । आते भानपे ॥ २१ ॥ मृत्यूके कसे हुए पाशमें । जायेगा यह इस भयमें । चले योगी-जन निर्णयमें । इस क्षेत्रके ॥ २२ ॥ मृत्यूसे हैं जो भयग्रस्त । करते वनमें एकांत । यम-दम-अभ्यास-रत । हो पाते पूर्ण ॥ २३ ॥ इस क्षेत्राभिमान मगन । कैलास तजता है ईशान । बसता है जाकर स्मशान । उलझन भयसे ॥ २४ ॥ इस प्रतिज्ञासे शंकर । सिकुडकर सभी ओर । करता राख घूस-खोर । मन्मथकी भी ॥ २५ ॥ तथा सत्य-लोक-नाथ । वदन चार वादार्थ । किंतु वे नहीं सर्वथा । जानते कुछ ॥ २६ ॥ ३३१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग