ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् । ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वर द्वारा क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विषयमें भिन्न भिन्न मतोंका विवेचन— आत्मानात्म विवेक जीववादी दृष्टिसे- एक कहता यह स्थल । जीवका ही है सहमूल । फिर प्राण है यह कुल । उसका यहां ॥ २७ ॥ घरमें उस प्राण के । चार भाई जो उसके । तथा मन-सा जिसके । प्रबंधक है ॥ २८ ॥ इन्द्रिय-बैलोंका जो समूह । नहीं देखता काल प्रवाह । करता है श्रम बिना आह । विषय-खेतमें ॥ २९ ॥ खोकर विहित-कर्म अवसर । अन्याय-बीजकी बुवाई कर । कुकर्मार्थ सब परिश्रम कर । फसल काटता ॥ ३० ॥ तभी उसीके समान । पाता है पाप जो मन । भोगता दुःख महान । जन्म-कोटि ॥ ३१ ॥ या विधिवत कर उद्यान । किया सत्कर्म-बीजारोपण । शत शत है जन्मानुदिन । सुख-भोग ॥ ३२ ॥ प्रकृतिवादियोंकी दृष्टिसे— कहते हैं तब कुछ औ । जीवका न कहो यह ठौर । हमसे जानो इसका विचार । पूर्ण रूपसे ॥ ३३ ॥ अजी ! है यहां जीव पथिक । चलती राहमें रहा रुक । प्राण है जो यहां मालिक । जग रहा है ॥ ३४ ॥ यहां जो अनादि प्रकृति है । सांख्य जिसके गीत गाते हैं । खेत यह उसकी वृत्ति है । जान तू यह ॥ ३५ ॥ गाया विविध मंत्रोंमें ऋषियोंने इसे पृथक् । कहा है ब्रह्म-सूत्रोंमें सप्रमाण सुनिश्चित ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वरी ४३२