भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 505, कुल 1172 में से

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इसके पास है साधन । घरका ही है बारदान । तब बनती है किसान । अपने आप ॥ ३६ ॥ झमेलेमें नित चतुर । इसके हैं तीन कुमार । करते सब कारोबार । गुण हैं जो ॥ ३७ ॥ रजो-गुण बुवाई करता । सत्व जो उसको संभालता । तमोगुण फसल काटता । अकेला ही ॥ ३८ ॥ महत्तत्वका रच खलिहान । काल-सांडसे कराके मांडन । अव्यक्तका वहां ढेर महान । होता रहता है ॥ ३९ ॥ संकल्प वादियोंकी दृष्टिसे- तब कहते कुछ बुद्धिमान । प्रकृति वादियोंसे बुरा मान । यह है अति आर्वाचीन । आप लोगोंका ॥ ४० ॥ अजी ! चित देकरके हो स्वस्थ । सुनो तुम यह क्षेत्र-वृत्तांत । तत्वमें कहां प्रकृतिकी बात । कहते हैं यह ॥ ४१ ॥ वह शून्य शय्यागृहमें । पूर्णावस्थाकी लीनतामें । शक्त-संकल्पने शय्यामें । निद्रा की थी ॥ ४२ ॥ जगा जो वह अकस्मात । उद्योगमें था भाग्यवंत । मिली है पूंजी अमानत । इच्छ-मात्रसे ॥ ४३ ॥ निराकारके उद्यानमें । त्रिभुवनकी समतामें । आया जो है व्यक्त रूपमें । उससे यह ॥ ४४ ॥ महा-भूतोंकी जो ऊसर । कसके उसे उर्वर । भूतग्रामके बांधे चार । सीमा-मेड़ें ॥ ४५ ॥ अजी ! प्रारंभ किया फिर । पंच तत्वात्मक शरीर । समुचित मिश्रण कर । पंच-भूतका ॥ ४६ ॥ कर्माकर्मके पत्थर । रख बांधे दोनों ओर । किया है अति उर्वर । ऊसर था जो ॥ ४७ ॥ आवागमनार्थ यहां फिर । जन्म मृत्युके बांधे गन्हर । रक्षाका ऐसा प्रबंध कर । संकल्पने तब ॥ ४८ ॥ ४३३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग (55)

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