भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 506

अहंकारसे हो एक । वह भी पूर्णायुतक । बुद्धिसे कार्य कृषक । कराया चराचर ॥ ४९ ॥ इस भांति है निराली । बडी संकल्पकी डाली । इसीलिये है वह मूली । यहां प्रपंचकी ॥ ५० ॥ ऐसे हैं यह मत-मुक्तक । व्यक्त हुए हैं जब शाब्दिक । जी ! आप हैं बडे विचारक । कहते हैं और ॥ ५१ ॥ स्वभाव-वादियोंकी दृष्टिसे-- अजी ! गांवमें पर-तत्वके । पर्यंकको देखें संकल्पके । तो क्यों प्रकृति-वादियोंके । तर्क नहीं माने ॥ ५२ ॥ किंतु ऐसा नहीं कहना । इसमें तुम्हें न पडना । कहा जायेगा यह पूर्ण । हमसे अब ॥ ५३ ॥ आकाश कहो है कौन । भरता मेघोंसे पूर्ण । अधरमें तारा-गण । कौन रखता ॥ ५४ ॥ गगनका यह वितान । किसने ताना महान । होता वायुका संचालन । किसकी आज्ञासे ॥ ५५ ॥ रोमोंकी बुवाई करता कौन । समुद्रको सदा भरता कौन । पर्जन्य धाराको गिराता कौन । कहो यहां ॥ ५६ ॥ यह क्षेत्र है ऐसा स्वाभाविक । न है कोई इसका मालक । पाता है जो करता देखरेख । अन्य नहीं कोई ॥ ५७ ॥ कालवादिकी दृष्टिसे-- कहता है तब और एक । तुम कहते हो बडा नेक । कहो कैसे भोगता है एक । केवल काल ॥ ५८ ॥ यह क्रोधी मृत्यु-सिंहका । गह्वर अपना उसका । नहीं क्या व्यर्थ प्रलापका । सही उत्तर ॥ ५९ ॥ सभी हैं इसकी मार । देखते हैं अनिवार । किंतु स्व-मतपे भार- । वे बोलते हैं ॥ ६० ॥ ज्ञा.- नेश्वरी ४३४