भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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आत्मानात्म विचार- सुन तू अब यह पार्था । देह है क्षेत्र कहलाता । इसको जो सही जानता । वह है क्षेत्रज्ञ ॥ ७ ॥ क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥ २ ॥ यहां है जो क्षेत्रका पालक । मुझको जान क्षेत्रज्ञ एक । बन सभी क्षेत्रका रक्षक । रहता हूं मैं ॥ ८ ॥ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञको मान । जानना है यहां ज्ञान । समझें हम अर्जुन । इस समय ॥ ९ ॥ तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् । स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥ ३ ॥ तभी हमने है क्षेत्र कहा । किस भावसे देहको यहां । कहता हूं प्रयोजन सह । सुन तू पार्थ ॥ १० ॥ इसको क्षेत्र क्यों कहना । इसका पैदा कैसा होना । किन विकारोंसे बढ़ना । कहता हूं यही ॥ ११ ॥ यह क्या तीन अर्ध हाथका है । या इससे भी अधिक बड़ा है । यह बंजर है या उर्वरा है । तथा है किसका ॥ १२ ॥ इत्यादि इसके सर्व । जो जो हैं वे सभी भाव । कहूंगा यह अपूर्व । सुन तू सावधान हो ॥ १३ ॥ शरीरके विषयमें भिन्न भिन्न विचार- क्षेत्रज्ञ मुझको जान बसा मैं सब क्षेत्रमें । क्षेत्र क्षेत्रज्ञका ज्ञान उसे मैं ज्ञान मानता ॥ २ ॥ क्षेत्र क्या उसमें कैसे विकार रहते कहो । कैसा क्षेत्रज्ञ कौन कहवा सुन तू यह ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी ४३०