ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग आत्म-रूपी गणेश वंदन— आत्म-रूप गणेश स्मरण । जो सकल विद्याधिकरण । नमन करें वे श्रीचरण । श्रीगुरुके ॥ १ ॥ करनेसे जिसका स्मरण । शब्द-सृष्टि होती स्वाधीन । चढ़ता सारस्वत संपूर्ण । जिह्वा पर ॥ २ ॥ तब है वक्तृत्वकी मधुरता । हठाती अमृतकी मधुरता । नव-रस है चूता ही रहता । अक्षरोंसे ॥ ३ ॥ भावोंका अवतरण । स्पष्ट करता है चित्र । हस्तामलकसा पूर्ण । होता तत्व-भेद ॥ ४ ॥ श्रीगुरुके जब पाय । पकडता है हृदय । महा-भाग्यका समय । उन्मेषका वह ॥ ५ ॥ उनको करके मैं वंदन । पितामहका पिता महान । कहता जो श्रीलक्ष्मीरमण । कहूंगा वह ॥ ६ ॥ भगवान उवाच इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते । एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ १ ॥ श्रीभगवानने कहा इस शरीरको पार्थ कहते क्षेत्र जान तू । जानता यह जो क्षेत्र क्षेत्रज्ञ कहते उसे ॥ १ ॥