ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरता म उनका ध्यान । मेरा यह देवतार्चन । उस बिना माने ना मन । दूसरा भला ॥ ३६ ॥ उसका है मुझे व्यसन । मेरा वह निधि निधान । अथवा मेरा समाधान । उनके मिलनमें ही ॥ ३७ ॥ ऐसी प्रेमकी वार्ता । जो है अनुवादता । है परम देवता । हमारी वह ॥ ३८ ॥ ज्ञानदेवका सगुण कृष्ण— जो है निज-जनानंद । तथा जगदादिकंद । कहता है श्री मुकुन्द । बोला संजय ॥ ३९ ॥ होता है जो निर्मल । निष्कल लोक कृपाल । शरणागत प्रतिपाल । शरण्य वह ॥ ४० ॥ वह है धर्म-कीर्ति धवल । अगाध-दातृत्वमें सरल । तथा अतुल बल प्रबल । बलि बंधन ॥ ४१ ॥ सुर-सहायशील । लोक-लालन-लील । प्रणत-प्रतिपाल । खेल जिसका ॥ ४२ ॥ भक्त-जन-वत्सल । प्रेमी-जन-प्रांजल । सत्य-केतू सरल । कला निधि ॥ ४३ ॥ वह कृष्ण वैकुंठका । चक्रवर्ति अपनोंका । कहता बोल प्रेमका । सुनता पार्थ ॥ ४४ ॥ संजय कहता श्रीकृष्ण । अब करेंगे निरूपण । कीजिये आप श्रवण । धृतराष्ट्रसे ॥ ४५ ॥ ज्ञानदेव कहता तुम । संत सेवा करना हम । सिखाया है महा-महिम । निवृत्तिनाथने ॥ ४६ ॥ गीता श्लोक ५५ ज्ञानेश्वरी ओवी ७०८.