भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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उसका मैं हूं मित्र । उसमें क्या विचित्र । सुनता जो चरित्र । उसका वह ॥ २६ ॥ करता है गुणगान । उससे भी मैं प्रसन्न । वह है प्राण समान । मुझको प्रिय ॥ २७ ॥ अजी ! यह सांगत । कहा है जो प्रस्तुत । भक्तियोग समस्त । योग-रूप ॥ २८ ॥ करता उसका आदर । धरता उसे सिरपर । उस स्थितिकी है अपार । श्रेष्ठता सुन ॥ २९ ॥ ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते । श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥ २० ॥ भक्त क्या ? मुझे अत्यधिक मधुर है— गोष्ठि है यह रम्य । अमृत धारा धर्म्य । करें प्रतीति-गम्य । सुनकर ॥ २३० ॥ श्रद्धाका जिसमें आदर । उरमें इसका विस्तार । होता है चितमें सत्वर । अनुष्ठान सुलभ ॥ ३१ ॥ जैसे किया है निरूपण । वैसे ही मनका धारण । तभी सुक्षेत्रमें रोपणं । हुआ मानो ॥ ३२ ॥ मुझे मानकर परम । इसीलिये करके प्रेम । यही सर्वस्व सर्वोपम । मान लेते जो ॥ ३३ ॥ विश्वमें अजी पार्थ । वही योगी औ' भक्त । उत्कंठा है तदर्थ । मुझको सदा ॥ ३४ ॥ वही तीर्थ वही क्षेत्र । विश्वमें हैं वे पवित्र । भक्ति कथाका हैं मित्र । सदैव ही ॥ ३५ ॥ —————— जो धर्म-सार है नित्य मुझमें लीन होकर । सेते श्रद्धालु जो भक्त अत्यंत प्रिय है मुझे ॥ २० ॥ ४२७ भक्तियोग