ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
उसका मैं हूं मित्र । उसमें क्या विचित्र । सुनता जो चरित्र । उसका वह ॥ २६ ॥ करता है गुणगान । उससे भी मैं प्रसन्न । वह है प्राण समान । मुझको प्रिय ॥ २७ ॥ अजी ! यह सांगत । कहा है जो प्रस्तुत । भक्तियोग समस्त । योग-रूप ॥ २८ ॥ करता उसका आदर । धरता उसे सिरपर । उस स्थितिकी है अपार । श्रेष्ठता सुन ॥ २९ ॥ ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते । श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥ २० ॥ भक्त क्या ? मुझे अत्यधिक मधुर है— गोष्ठि है यह रम्य । अमृत धारा धर्म्य । करें प्रतीति-गम्य । सुनकर ॥ २३० ॥ श्रद्धाका जिसमें आदर । उरमें इसका विस्तार । होता है चितमें सत्वर । अनुष्ठान सुलभ ॥ ३१ ॥ जैसे किया है निरूपण । वैसे ही मनका धारण । तभी सुक्षेत्रमें रोपणं । हुआ मानो ॥ ३२ ॥ मुझे मानकर परम । इसीलिये करके प्रेम । यही सर्वस्व सर्वोपम । मान लेते जो ॥ ३३ ॥ विश्वमें अजी पार्थ । वही योगी औ' भक्त । उत्कंठा है तदर्थ । मुझको सदा ॥ ३४ ॥ वही तीर्थ वही क्षेत्र । विश्वमें हैं वे पवित्र । भक्ति कथाका हैं मित्र । सदैव ही ॥ ३५ ॥ —————— जो धर्म-सार है नित्य मुझमें लीन होकर । सेते श्रद्धालु जो भक्त अत्यंत प्रिय है मुझे ॥ २० ॥ ४२७ भक्तियोग
करता म उनका ध्यान । मेरा यह देवतार्चन । उस बिना माने ना मन । दूसरा भला ॥ ३६ ॥ उसका है मुझे व्यसन । मेरा वह निधि निधान । अथवा मेरा समाधान । उनके मिलनमें ही ॥ ३७ ॥ ऐसी प्रेमकी वार्ता । जो है अनुवादता । है परम देवता । हमारी वह ॥ ३८ ॥ ज्ञानदेवका सगुण कृष्ण— जो है निज-जनानंद । तथा जगदादिकंद । कहता है श्री मुकुन्द । बोला संजय ॥ ३९ ॥ होता है जो निर्मल । निष्कल लोक कृपाल । शरणागत प्रतिपाल । शरण्य वह ॥ ४० ॥ वह है धर्म-कीर्ति धवल । अगाध-दातृत्वमें सरल । तथा अतुल बल प्रबल । बलि बंधन ॥ ४१ ॥ सुर-सहायशील । लोक-लालन-लील । प्रणत-प्रतिपाल । खेल जिसका ॥ ४२ ॥ भक्त-जन-वत्सल । प्रेमी-जन-प्रांजल । सत्य-केतू सरल । कला निधि ॥ ४३ ॥ वह कृष्ण वैकुंठका । चक्रवर्ति अपनोंका । कहता बोल प्रेमका । सुनता पार्थ ॥ ४४ ॥ संजय कहता श्रीकृष्ण । अब करेंगे निरूपण । कीजिये आप श्रवण । धृतराष्ट्रसे ॥ ४५ ॥ ज्ञानदेव कहता तुम । संत सेवा करना हम । सिखाया है महा-महिम । निवृत्तिनाथने ॥ ४६ ॥ गीता श्लोक ५५ ज्ञानेश्वरी ओवी ७०८.
१३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग आत्म-रूपी गणेश वंदन— आत्म-रूप गणेश स्मरण । जो सकल विद्याधिकरण । नमन करें वे श्रीचरण । श्रीगुरुके ॥ १ ॥ करनेसे जिसका स्मरण । शब्द-सृष्टि होती स्वाधीन । चढ़ता सारस्वत संपूर्ण । जिह्वा पर ॥ २ ॥ तब है वक्तृत्वकी मधुरता । हठाती अमृतकी मधुरता । नव-रस है चूता ही रहता । अक्षरोंसे ॥ ३ ॥ भावोंका अवतरण । स्पष्ट करता है चित्र । हस्तामलकसा पूर्ण । होता तत्व-भेद ॥ ४ ॥ श्रीगुरुके जब पाय । पकडता है हृदय । महा-भाग्यका समय । उन्मेषका वह ॥ ५ ॥ उनको करके मैं वंदन । पितामहका पिता महान । कहता जो श्रीलक्ष्मीरमण । कहूंगा वह ॥ ६ ॥ भगवान उवाच इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते । एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ १ ॥ श्रीभगवानने कहा इस शरीरको पार्थ कहते क्षेत्र जान तू । जानता यह जो क्षेत्र क्षेत्रज्ञ कहते उसे ॥ १ ॥
आत्मानात्म विचार- सुन तू अब यह पार्था । देह है क्षेत्र कहलाता । इसको जो सही जानता । वह है क्षेत्रज्ञ ॥ ७ ॥ क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥ २ ॥ यहां है जो क्षेत्रका पालक । मुझको जान क्षेत्रज्ञ एक । बन सभी क्षेत्रका रक्षक । रहता हूं मैं ॥ ८ ॥ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञको मान । जानना है यहां ज्ञान । समझें हम अर्जुन । इस समय ॥ ९ ॥ तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् । स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥ ३ ॥ तभी हमने है क्षेत्र कहा । किस भावसे देहको यहां । कहता हूं प्रयोजन सह । सुन तू पार्थ ॥ १० ॥ इसको क्षेत्र क्यों कहना । इसका पैदा कैसा होना । किन विकारोंसे बढ़ना । कहता हूं यही ॥ ११ ॥ यह क्या तीन अर्ध हाथका है । या इससे भी अधिक बड़ा है । यह बंजर है या उर्वरा है । तथा है किसका ॥ १२ ॥ इत्यादि इसके सर्व । जो जो हैं वे सभी भाव । कहूंगा यह अपूर्व । सुन तू सावधान हो ॥ १३ ॥ शरीरके विषयमें भिन्न भिन्न विचार- क्षेत्रज्ञ मुझको जान बसा मैं सब क्षेत्रमें । क्षेत्र क्षेत्रज्ञका ज्ञान उसे मैं ज्ञान मानता ॥ २ ॥ क्षेत्र क्या उसमें कैसे विकार रहते कहो । कैसा क्षेत्रज्ञ कौन कहवा सुन तू यह ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी ४३०
अजी ! इसी स्थलके कारण । श्रुतिका चलता है भाषण । तर्ककी वाद वैखरी तीक्ष्ण । इसके लिये है ॥ १४ ॥ छाननेमें यह स्थान । थक गये हैं दर्शन । मिटे नहीं जो घर्षण । उनके कभी ॥ १५ ॥ अजी ! शास्त्रोंका भी नाता । इससे ही है टूटता । तथा इसीसे जुड़ता । झगडा जगतका ॥ १६ ॥ बातसे बात न मिलती । एक-वाक्यता नहीं होती । बनके वाचालता युक्ति । हुई समर्थ ॥ १७ ॥ न जाने किसका है यह स्थल । किंतु कैसी अभिलाषाका बल । घर घरमें है यह कपाल- । मोक्ष गाथा ॥ १८ ॥ नास्तिकोंसे करने मुठभेड़ । वेदोंने किया विद्रोह प्रचंड । उसको देख कर हैं पाखंड । बकवाद करते ॥ १९ ॥ कहते तुम निर्मूल । झूठा तुम्हारा वाग्जाल । प्रण हमारा है सबल । बीडा उठाकर ॥ २० ॥ पक्ष है जो पाखंड । नग्न लुंचित-मुंड । नियोजित वितंड । आते भानपे ॥ २१ ॥ मृत्यूके कसे हुए पाशमें । जायेगा यह इस भयमें । चले योगी-जन निर्णयमें । इस क्षेत्रके ॥ २२ ॥ मृत्यूसे हैं जो भयग्रस्त । करते वनमें एकांत । यम-दम-अभ्यास-रत । हो पाते पूर्ण ॥ २३ ॥ इस क्षेत्राभिमान मगन । कैलास तजता है ईशान । बसता है जाकर स्मशान । उलझन भयसे ॥ २४ ॥ इस प्रतिज्ञासे शंकर । सिकुडकर सभी ओर । करता राख घूस-खोर । मन्मथकी भी ॥ २५ ॥ तथा सत्य-लोक-नाथ । वदन चार वादार्थ । किंतु वे नहीं सर्वथा । जानते कुछ ॥ २६ ॥ ३३१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् । ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वर द्वारा क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विषयमें भिन्न भिन्न मतोंका विवेचन— आत्मानात्म विवेक जीववादी दृष्टिसे- एक कहता यह स्थल । जीवका ही है सहमूल । फिर प्राण है यह कुल । उसका यहां ॥ २७ ॥ घरमें उस प्राण के । चार भाई जो उसके । तथा मन-सा जिसके । प्रबंधक है ॥ २८ ॥ इन्द्रिय-बैलोंका जो समूह । नहीं देखता काल प्रवाह । करता है श्रम बिना आह । विषय-खेतमें ॥ २९ ॥ खोकर विहित-कर्म अवसर । अन्याय-बीजकी बुवाई कर । कुकर्मार्थ सब परिश्रम कर । फसल काटता ॥ ३० ॥ तभी उसीके समान । पाता है पाप जो मन । भोगता दुःख महान । जन्म-कोटि ॥ ३१ ॥ या विधिवत कर उद्यान । किया सत्कर्म-बीजारोपण । शत शत है जन्मानुदिन । सुख-भोग ॥ ३२ ॥ प्रकृतिवादियोंकी दृष्टिसे— कहते हैं तब कुछ औ । जीवका न कहो यह ठौर । हमसे जानो इसका विचार । पूर्ण रूपसे ॥ ३३ ॥ अजी ! है यहां जीव पथिक । चलती राहमें रहा रुक । प्राण है जो यहां मालिक । जग रहा है ॥ ३४ ॥ यहां जो अनादि प्रकृति है । सांख्य जिसके गीत गाते हैं । खेत यह उसकी वृत्ति है । जान तू यह ॥ ३५ ॥ गाया विविध मंत्रोंमें ऋषियोंने इसे पृथक् । कहा है ब्रह्म-सूत्रोंमें सप्रमाण सुनिश्चित ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वरी ४३२
इसके पास है साधन । घरका ही है बारदान । तब बनती है किसान । अपने आप ॥ ३६ ॥ झमेलेमें नित चतुर । इसके हैं तीन कुमार । करते सब कारोबार । गुण हैं जो ॥ ३७ ॥ रजो-गुण बुवाई करता । सत्व जो उसको संभालता । तमोगुण फसल काटता । अकेला ही ॥ ३८ ॥ महत्तत्वका रच खलिहान । काल-सांडसे कराके मांडन । अव्यक्तका वहां ढेर महान । होता रहता है ॥ ३९ ॥ संकल्प वादियोंकी दृष्टिसे- तब कहते कुछ बुद्धिमान । प्रकृति वादियोंसे बुरा मान । यह है अति आर्वाचीन । आप लोगोंका ॥ ४० ॥ अजी ! चित देकरके हो स्वस्थ । सुनो तुम यह क्षेत्र-वृत्तांत । तत्वमें कहां प्रकृतिकी बात । कहते हैं यह ॥ ४१ ॥ वह शून्य शय्यागृहमें । पूर्णावस्थाकी लीनतामें । शक्त-संकल्पने शय्यामें । निद्रा की थी ॥ ४२ ॥ जगा जो वह अकस्मात । उद्योगमें था भाग्यवंत । मिली है पूंजी अमानत । इच्छ-मात्रसे ॥ ४३ ॥ निराकारके उद्यानमें । त्रिभुवनकी समतामें । आया जो है व्यक्त रूपमें । उससे यह ॥ ४४ ॥ महा-भूतोंकी जो ऊसर । कसके उसे उर्वर । भूतग्रामके बांधे चार । सीमा-मेड़ें ॥ ४५ ॥ अजी ! प्रारंभ किया फिर । पंच तत्वात्मक शरीर । समुचित मिश्रण कर । पंच-भूतका ॥ ४६ ॥ कर्माकर्मके पत्थर । रख बांधे दोनों ओर । किया है अति उर्वर । ऊसर था जो ॥ ४७ ॥ आवागमनार्थ यहां फिर । जन्म मृत्युके बांधे गन्हर । रक्षाका ऐसा प्रबंध कर । संकल्पने तब ॥ ४८ ॥ ४३३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग (55)
अहंकारसे हो एक । वह भी पूर्णायुतक । बुद्धिसे कार्य कृषक । कराया चराचर ॥ ४९ ॥ इस भांति है निराली । बडी संकल्पकी डाली । इसीलिये है वह मूली । यहां प्रपंचकी ॥ ५० ॥ ऐसे हैं यह मत-मुक्तक । व्यक्त हुए हैं जब शाब्दिक । जी ! आप हैं बडे विचारक । कहते हैं और ॥ ५१ ॥ स्वभाव-वादियोंकी दृष्टिसे-- अजी ! गांवमें पर-तत्वके । पर्यंकको देखें संकल्पके । तो क्यों प्रकृति-वादियोंके । तर्क नहीं माने ॥ ५२ ॥ किंतु ऐसा नहीं कहना । इसमें तुम्हें न पडना । कहा जायेगा यह पूर्ण । हमसे अब ॥ ५३ ॥ आकाश कहो है कौन । भरता मेघोंसे पूर्ण । अधरमें तारा-गण । कौन रखता ॥ ५४ ॥ गगनका यह वितान । किसने ताना महान । होता वायुका संचालन । किसकी आज्ञासे ॥ ५५ ॥ रोमोंकी बुवाई करता कौन । समुद्रको सदा भरता कौन । पर्जन्य धाराको गिराता कौन । कहो यहां ॥ ५६ ॥ यह क्षेत्र है ऐसा स्वाभाविक । न है कोई इसका मालक । पाता है जो करता देखरेख । अन्य नहीं कोई ॥ ५७ ॥ कालवादिकी दृष्टिसे-- कहता है तब और एक । तुम कहते हो बडा नेक । कहो कैसे भोगता है एक । केवल काल ॥ ५८ ॥ यह क्रोधी मृत्यु-सिंहका । गह्वर अपना उसका । नहीं क्या व्यर्थ प्रलापका । सही उत्तर ॥ ५९ ॥ सभी हैं इसकी मार । देखते हैं अनिवार । किंतु स्व-मतपे भार- । वे बोलते हैं ॥ ६० ॥ ज्ञा.- नेश्वरी ४३४
महा कल्पके उस ओर । यकायक झपट्टा मार । प्रहार भद्र जाती पर । किया सत्य लोकके ॥ ६१ ॥ नित-नव नव लोकपाल । तथा दिग्गजोंको यह काल । स्वर्ग-काननमें जा विपुल । तोड़ता रहता ॥ ६२ ॥ शरीर-समीरसे इसके । गर्तमें जनम-मरणके । भूमिष्ठ पडे निर्जीव होके । जीव-मृग हैं ॥ ६३ ॥ फैला है इसका पंजा । मानो यह है शिंकजा । बनाके आकर गज- । करता है ग्रास ॥ ६४ ॥ इसीलिये कालकी सत्ता । कहते हैं हम निश्चित । ऐसा वाद है पांडुसुत । इस क्षेत्रका ॥ ६५ ॥ इस क्षेत्रके विषयमें सभी अज्ञानमें हैं— कर चुका है वाद विपुल । नैमिशारण्यमें ऋषि-कुल । पुराण इसके अनुकूल । आधार रूप हैं ॥ ६६ ॥ हैं अनुष्टुप आदि छंद । इस विषयमें विविध । होते हैं आधार स-श्रध्द । आज भी लोगोंके ॥ ६७ ॥ वेदोंके बृहत्साम-सूत्र । जो हैं अतिशय पवित्र । उसको भी है यह क्षेत्र । अज्ञात-रूप ॥ ६८ ॥ अन्य और अगणित । महा-कवि बुद्धिमंत । इसपे अपना मत । देते रहते हैं ॥ ६९ ॥ किंतु यह किसका है । किसके स्वामित्वमें है । समझमें न आता है । किसीक भी ॥ ७० ॥ अजी ! यह है जैसे । अब क्षेत्र है कैसे । कहता मैं तुझसे । सुन सायन्त ॥ ७१ ॥ महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च । इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥ ५ ॥ पंच भूत अहंकार बुद्धि अव्यक्त मूल जो । एकादश इंद्रियोंको खींचे विषय पंचक ॥ ५ ॥ ४३५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः । एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ ६ ॥ इस शरीरके मूल-भूत छत्तीस तत्व— है महा-भूत पंचक । तथा अहंकार एक । बुद्धि अव्यक्त दशक । इंद्रियोंका ॥ ७२ ॥ और भी है एक । विषय-दशक । द्वेष सुख दुःख । संघात इच्छा ॥ ७३ ॥ तथा चेतना धृति । एवं है क्षेत्र वृत्ति । कही तुझसे अति । अल्प-रूपसे ॥ ७४ ॥ कौन है महा भूत । विषय क्या है पार्थ । औ' इंद्रिय महित । कहता हूं सब ॥ ७५ ॥ पृथ्वी जल अगिन । वायु तथा गगन । ये हैं पांच अर्जुन । महा-भूत ॥ ७६ ॥ अहंकारका रूप— जागृतिमें जैसे स्वप्न । आंखोंमें रहता लीन । या अमावासके दिन । चंद्र होता गुप्त ॥ ७७ ॥ बालकोंमें जैसे अर्जुन । छिपा रहता है यौवन । या कलिमें होता प्रसन्न । सुगंध गुप्त ॥ ७८ ॥ अथवा जैसे इन्धनमें । अग्नि होता सुप्तावस्थामें । वैसे होता है प्रकृतिमें । गुप्त-रूपसे ॥ ७९ ॥ अथवा धातु गत ज्वर । कुपध्यामिष देखकर । होता है अंदर बाहर । व्याप्त अर्जुन ॥ ८० ॥ ऐसे पांचोंसे मिल कर । देहका आकार लेकर । नचाता तब अहंकार । दश-दिशामें ॥ ८१ ॥ इच्छा द्वेष सुख-दुःख धृति संघात चेतना । विकार-युक्त है क्षेत्र अल्पमें तुझसे कहा ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ४३६
अहंकारका इक अचरज है । अज्ञानियोंको जो नहीं सताता है । ज्ञानियोंको ही नचाता रहता है । सिर पर चढ़के ॥ ८२ ॥ बुद्धिका लक्षण— बुद्धिके जो लक्षण । जान ले तू अर्जुन । कहता है श्रीकृष्ण । यदुराज ॥ ८३ ॥ कंदर्पका ले सहाय । वृत्ति-सह जो इन्द्रिय । जीत लाते हैं विषय । धनुर्धर ॥ ८४ ॥ सुख दुःखके लूटका माल । जीवको अंतरंग सकल । दिखाता तब देता फैसला । चुनावमें योग्य ॥ ८५ ॥ यह है क्लेष या तोष । है यह गुण या दोष । मैला है या यह चोख । दिखाता सब ॥ ८६ ॥ अधमोत्तम जिसे सूझता । छोटा बड़ा है जो देख पाता । अपनी दृष्टिसे परखता । विषयोंको जो ॥ ८७ ॥ तेज तत्वका आदि । सत्व-गुणकी वृद्धि । आत्म-जीवकी संधि । जागृत रखता ॥ ८८ ॥ अव्यक्त प्रकृतिका रूप जान तू यह अर्जुन । बुद्धि-तत्त्व है संपूर्ण । अब सुन पहचान । अव्यक्तकी ॥ ८९ ॥ जिसको है सांख्य सिद्धांत । करता प्रकृति घोषित । यहांपे है यही प्रस्तुत । अव्यक्त जो ॥ ९० ॥ तथा है सांख्य-योगके मतसे । प्रकृति-विचार कहा तुझसे । जहां प्रकृतिके दोनों रूपसे । तू है परिचित ॥ ९१ ॥ दूजी जो वहां जीव दशा । जिसका नाम है वीरेशा । उसे यहां अव्यक्त ऐसा । कहा गया है ॥ ९२ ॥ रजनीका होते ही अस्त । नभमें होते तारा लुप्त । रुकती होनेपे सूर्यास्त । भूतमात्रकी क्रिया ॥ ९३ ॥ ४३७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
देह-पात पर अर्जुन । देह होती उपाधि-लीन । कृत-कर्ममें अनुदिन । डुबी रहती ॥ ९४ ॥ बीज-रूपमें यह सतत । रहता है वृक्ष समस्त । अथवा पटत्व बन सूत । रहता जैसे ॥ ९५ ॥ वैसे छोड़के स्थूल-धर्म । महा भूतोंके भूत-ग्राम । लय हो रहते हैं सूक्ष्म । जिस स्थानपे ॥ ९६ ॥ उसका नाम अर्जुना । अव्यक्त यह जानना । अब संपूर्ण सुनना । इंद्रिय-भेद ॥ ९७ ॥ इंद्रिय विवेचन --- यहां श्रवण नयन । त्वचा औ' रसना घ्राण । इसको ज्ञानके जान । पांच इंद्रिय ॥ ९८ ॥ मेलेमें इन तत्वोंके । विचार सुख-दुःखके । करती है इंद्रियोंके- । द्वारा बुध्दि ॥ ९९ ॥ फिर वाचा और कर । पाय तथा अधोद्वार । तथा है जनन द्वार । पांच पार्थ ॥ १०० ॥ ये हैं कर्मेंद्रियां जान । कैवल्य-पति श्रीकृष्ण । कहता है तू अर्जुन । सुन ले यह ॥ १ ॥ प्राणोंको जो प्रिया होती । क्रिया-शक्ति कहलाती । तनमें है आती जाती । इन पांचोंसे ॥ २ ॥ ऐसे ये दश-करण । बताये तुझे अर्जुन । कहता हूं अब मन । रहता कैसा ॥ ३ ॥ मनका विवेचन --- इंद्रिय-बुध्दि मध्य पर । रजोगुणका ले आधार । अतीव तरल होकर । रहता पार्थ ॥ ४ ॥ आकाशकी नीलिमा-सा । मृग-जल-तरंग सा । व्यर्थका मिथ्याभास-सा । रहता है वह ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ४३८
तथा-शुक्रशोणित मिलन । देता है पंच-तत्वको चिह्न । एक वायु-तत्व अर्जुन । बनता दस रूप ॥ ६ ॥ फिर यह दस प्रकार । देहका सामर्थ्य लेकर । अपने निज स्थान पर । हुए प्रतिष्ठित ॥ ७ ॥ वहां चांचल्य चपल । रहा जो एक केवल । इससे रजका बल । लिया उसने ॥ ८ ॥ बुद्धिके वह बाहर । अहंताके डर पर । ऐसे मध्य-स्थान पर । दृढ हो बैठा ॥ ९ ॥ व्यर्थ है उसका नाम मन । जो मात्र कल्पना मूर्तिमान । उसके संगसे मिला जान । वस्तुको जीव भाव ॥ ११० ॥ प्रकृतिका है जो मूल । कामको जिसका बल । चेतता है जो प्रबल । अहंकार ॥ ११ ॥ इच्छाको वह बढ़ाता । आशाको वह चढ़ाता । रक्षण नित करता । भयका जो ॥ १२ ॥ द्वैतका जो उगम-स्थान । अविद्या करे बलवान । इन्द्रियोंका करे पतन । विषयोंमें ॥ १३ ॥ संकल्पोंसे है सृष्टि रचता । विकल्पोंसे उसको तोड़ता । मनोरथोंका ढेर चढा था- । उतराता वह ॥ १४ ॥ भ्रांतिका जो भंडार । वायु तत्व्-अंतर । तथा बुद्धिका द्वार । करता बंद ॥ १५ ॥ यह कहलाता मन । अन्य कछु नहीं जान । अब विषयाभिदान । बताता हूं ॥ १६ ॥ विषयोंका स्पष्टीकरण- स्पर्श तथा शब्द । रूप रस गंध । हैं ये पंच-विध । ज्ञानेंद्रियोंके ॥ १७ ॥ ४३९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
इन द्वारोंसे निरंतर । दौड़ता है ज्ञान बाहर । भ्रांत हो जैसा जानवर । हरा चारा देख ॥ १८ ॥ फिर स्वर वर्ण विसर्ग । अथवा स्वीकार औ' त्याग । तथा संक्रमण उत्सर्ग । विण्मूत्रोंका ॥ १९ ॥ कर्मेंद्रियोंके पांच । विषय हैं ये सच । बांध करके माच । चलती क्रिया ॥ १२० ॥ ऐसे दस बसे हैं । देहमें विषय हैं । इच्छा जो कहाती है । कहते अब ॥ २१ ॥ इच्छाका स्वरूप तथा द्वेष— गत भोग जब है स्मरता । या ऐसा शब्द कानपे आता । तो कानपे हाथ रख जाता । न तो वृत्ति-जगती ॥ २२ ॥ विषयेंद्रिय भेंट होती । तभी वह जाग उठती । कामका हाथ धर वृत्ति । उठती जो ॥ २३ ॥ अजी ! उठनेसे यह वृत्ति । मनकी होती तीव्र-गति । जहां नहीं जाना वहां जाती । ललचाकर इन्द्रियां ॥ २४ ॥ जिस प्रवृत्तिके लोभसे । बुद्धि हो पगलाई जैसे । इन्द्रियां लुब्ध हो उससे । वह है इच्छा ॥ २५ ॥ इन्द्रियोंका जो इच्छित विषय । नहीं पाती वे जब धनंजय तब अनुभवती जो इन्द्रिय । वह है द्वेष ॥ २६ ॥ सुख दुःखका स्वरूप— कहता हूं अब सुख । वह ऐसा है तू देख । जिस एकसे अशेष । भूले सब जीव ॥ २७ ॥ अजी ! तन मन वचन । अपनी सौगंधसे जान । देह-स्तुतिको बल-हीन । करते आता ॥ २८ ॥ ज्ञानेश्वरी ४४०
पानेसे जिसे अर्जुन । शिथिल होता है प्राण । दूना होता है सत्व-गुण । पहलेसे भी ॥ २९ ॥ इन्द्रिय-वृत्तियोंको संपूर्ण । हृदयमें ला एकांत स्थान । करता है शांत निद्राधीन । पुचकारकर ॥ १३० ॥ कहूं क्या इससे अधिक । जीव होता आत्मासे एक । उस स्थितिका नाम सुख । पांडुकुमार ॥ ३१ ॥ तथा ऐसी अवस्था । न पाके जीना पार्थ । तुम जानो सर्वथा । नाम दुःखका ॥ ३२ ॥ मनोरथ जो संगसे नहीं । वैसे वह स्वयं-सिद्ध है ही । इन दोनोंके कारणसे ही । सुख है औ' दुःख ॥ ३३ ॥ चेतनाका विवेचन— अब है असंग औ' साक्षी-भूत । जिसकी सत्ता देहमें सतत । नाम उसका यहां पांडुसुत । चेतना है ॥ ३४ ॥ नखसे जो शिख पर्यंत । तन पे सर्वत्र जागृत । नहीं होता परिवर्तित । अवस्थात्रयमें ॥ ३५ ॥ मन-बुद्धि आदि प्रफुल्लित । औ' प्रवृत्ति-वनमें वसंत । खिला रहता जिससे पार्थ । सदैव ही ॥ ३६ ॥ जडाजड़से समान । करता है जो वर्तन । कहता हूं मैं चेतन । यह नहीं मिथ्या ॥ ३७ ॥ राजा परिवार नहीं जानता । आज्ञासे पर-चक्र दूर होता । पूर्ण-चंद्र देख उमड़ आता । महा-सागर ॥ ३८ ॥ या चुंबकका सन्निधान । करता लोहेको चेतन । सूर्य-संगसे होते जन । कार्य-प्रवृत्त ॥ ३९ ॥ मुख लगाये बिन । पिल्लोंका है पोषण । करती है अर्जुन । कूर्मी जैसे ॥ १४० ॥ (56) ४४१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
उसी भांतिसे अर्जुन । आत्म-संगसे है तन । प्राप्त करता जीवन । जड़ है जो ॥ ४१ ॥ इसको है चेतन । कहते हैं अर्जुन । धृतिका विवेचन । सुन तू अब ॥ ४२ ॥ धृतिका विवेचन— पंच तत्वमें परस्पर । जाति-स्वभावसे है वैर । डुबोता है पृथ्विको नीर । प्रकट रूपसे ॥ ४३ ॥ पानीको तेज सोखता । वायु तेजसे लड़ता । वायुका नाश करता । गगन सहज ॥ ४४ ॥ कभी किसीमें न मिलकर । किसीसे मिलन न होकर । पैठकर भी भिन्न भीतर । रहता आकाश ॥ ४५ ॥ पंच-भूत ऐसे परस्पर । करते रहते सदा वैर । किंतु एक बनके शरीर । रूप होता प्रकट ॥ ४६ ॥ शत्रुता छोड भीषण । रहते कर संघटन । परस्पर कर पोषण । अपने गुणसे ॥ ४७ ॥ जिनमें स्वभावसे शत्रुता । रहती है वे कर मित्रता । जिस गुणसे है यह होता । धृति उसका नाम ॥ ४८ ॥ संघात और क्षेत्र-विवेचन— तथा जीव सह साथ । छत्तीस है यहां साथ । वह है यहां संघात । तत्व जान ॥ ४९ ॥ ऐसे छत्तीस ही भेद । किये तुझसे विशद । इसको जान प्रसिध्द । क्षेत्र है यह ॥ १५० ॥ जैसे रथांगोंका समुदाय । रथ कहलाता धनंजय । या शरीरावयव इंद्रिय । कहलाता शरीर ॥ ५१ ॥ करि तुरंगादिका समाज । कहलाता है सैन्य सहज । वाक्य कहलाते हैं जो पुंज । शब्दोंके ॥ ५२ ॥ ज्ञानेश्वरी ४४२
जल-धरोंके मंडल । कहलाते हैं बादल । अनेक लोक सकल । कहलाता जगत ॥ ५३ ॥ या तेल बात अगिन । आते जब एक स्थान । दीप कहते हैं जान । धनंजय ॥ ५४ ॥ ये जो छत्तीस ही तत्व । मिलते हैं हो एकत्र । वह समूह-परत्व । कहलाता क्षेत्र ॥ ५५ ॥ बोआईके व्यवहारसे । पाप-पुण्य पक जानेसे । हमने कहा कौतुकसे । क्षेत्र है यह ॥ ५६ ॥ अनेकोंका है मत । देह है यह पार्थ । इसके हैं अनंत । यहां नाम ॥ ५७ ॥ इस ओर परतत्वके । औ' उस ओर स्थावरके । होता जाता है जो उसके । नाम क्षेत्र है ॥ ५८ ॥ किंतु सुर-नर-उरग । आदि होते योनि-विभाग । सब गुण-कर्मके संग । भिन्न हैं पार्थ ॥ ५९ ॥ यह गुण-विवेचन । आगे आता है अर्जुन । प्रस्तुत है यहां ज्ञान- । रूप दिखाऊं ॥ १६० ॥ ज्ञानकी महानता, ध्यानकी विविधता— तुझे क्षेत्र सविस्तर । मैंने कहा स-विकार । सुन अब तू उदार । ज्ञानका रूप ॥ ६१ ॥ जिस ज्ञानार्थ योगी-जन । स्वर्गका कर उल्लंघन । निगलते सदा गगन । धनंजय ॥ ६२ ॥ सिधिकी आस न करते । ऋद्धिका ध्यान न धरते । योगके कष्ट हैं सहते । तुच्छ मानके ॥ ६३ ॥ तप-दुर्गोंको पार करते । यज्ञादि अनुष्ठान करते । तथा उलटाकर छोड़ते । कर्म-वल्ली ॥ ६४ ॥ ४४३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
कुछ जो भजन मगन । दौडते हैं खुले बदन । कुछ सुरंगमें अर्जुन । घुसते सुषुम्नाके ॥ ६५ ॥ ऐसे हैं इस ज्ञानार्थ । मुनीश्वर जो इच्छित । फिरते हैं पात पात । वेद-तरुके ॥ ६६ ॥ देगी यह गुरु-सेवा । इस बुध्दिसे पांडव । करते जन्मका ठेवा । न्योच्छावर ॥ ६७ ॥ अजी ! प्रवेश उस ज्ञानका । नाश करता है अविद्याका । ऐक्य साधता जीव-आत्मका । पांडुकुमार ॥ ६८ ॥ इंद्रियोंका द्वार रोकता । प्रवृत्तिका पैर तोड़ता । दारिद्य्रको नष्ट करता । मन-बुध्दिका ॥ ६९ ॥ हरता द्वैतका अकाल । करता साम्यका सुकाल । प्राप्त होती ऐसी उज्ज्वल । स्थिति ज्ञानसे ॥ १७० ॥ मदको करता नाम शेष । न रखता भ्रांति-अवशेष । तथा आप-परका है भास । नष्ट करता ॥ ७१ ॥ करता संसार उन्मूल । धोता संकल्प-महामल । घेरता ज्ञेयको सकल । जो है अनावर ॥ ७२ ॥ जिसका है उज्ज्वलपन । खोलता बुध्दिके नयन । बने जीवका क्रीडांगन । आनंद धाम ॥ ७३ ॥ ऐसे है यह ज्ञान । पवित्र्यक्य निधान । जहां भृष्ट हो मन । होता निर्मल ॥ ७४ ॥ आत्माको जो जीव-बुद्धि । लगी जैसी क्षय-व्याधि । वह उसकी सन्निधि । करती दूर ॥ ७५ ॥ उस अनिरूपका निरूपण । सुनकर होगा बुद्धिको ज्ञान । किंतु देख न सकेंगे नयन । उसको कभी ॥ ७६ ॥ अजी ! शरीरमें वह जब । शक्ति प्रकट करता तब । इंद्रियोंके व्यापारसे सब । देखेंगे नयन ॥ ७७ ॥ ज्ञानेश्वरी ४४४
वसंतका शुभागमन । दिखाता खिला हुवा वन । वैसे दिखाते हैं करण । अस्तित्व ज्ञानका ॥ ७८ ॥ वृक्षके जड़में नीर । पातालमें धनुर्धर । दिखाते वह अंकुर । लहरा कर जैसे ॥ ७९ ॥ अथवा भूमिकी है मृदुता । कहे अंकुरोंकी कोमलता । आचार गौरव विविधता । सत्कुलिनोंकी ॥ १८० ॥ आदरातिथ्यका समारोह । प्रकट करता जैसे स्नेह । या दर्शनसे होता उत्साह । पुण्य-पुरुषके ॥ ८१ ॥ कदली-वृक्षमें उत्पन्न कपूर । जाना जाता है सुगंधसे सुन्दर । जैसे प्रकाश फैलाता है बाहर । स्फटिक घटका दीप ॥ ८२ ॥ अजी ! वैसे हृदय स्थित-ज्ञान । प्रकटता बन देह-लक्षण । उसे कहता हूं तुझे अर्जुन । सुन ध्यान देकर ॥ ८३ ॥ अमानित्वमदंभित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् । आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ ७ ॥ ज्ञानके लक्षण–१ अमानित्व— नहीं रुचता है उसे । होड करना किसीसे । सजनता भी है उसे । लगता बोझ ॥ ८४ ॥ करनेसे गुण-वर्णन । मान्यताका भी दिया मान । प्रकट होनेसे अर्जुन । योग्यताका ॥ ८५ ॥ घबडाता है वह कैसा । व्याधसे घिरा मृग जैसा । अथवा भंवरमें फसा । तैराक मानो ॥ ८६ ॥ सम्मानको यह सुभट । पास आया मान संकट । आने न देता है निकट । गरिमा अपने ॥ ८७ ॥ नम्रता दंभ-शून्यत्व अहिंसा ऋजुता क्षमा । पवित्रय गुरु-शुश्रूषा स्थिरता आत्म-संयम ॥ ७ ॥ ४४५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
न देखना आंखोंसे पूजना । स्वकीर्ति कानोंसे न सुनना । लोगोंको स्मरण नहीं होना । अपना कभी ॥ ८८ ॥ वहां सत्कारकी गोष्ठि । न आदर न है भेटी । मनमें होता है कष्टी । नमस्कारसे ॥ ८९ ॥ वाचस्पतिकी भांति । सर्वज्ञताकी प्राप्ति । होके भी है छिपाती । भीति कीर्तिकी ॥ १९० ॥ चातुर्यको छिपाता । महत्त्वको भुलाता । बावला हो रहता । प्रेमसे जो ॥ ९१ ॥ लौकिकका उसे उद्वेग । शास्त्रार्थका भी है उबग । मनमें है नाम सुभग । रहता स्वस्थ ॥ ९२ ॥ लोगोंसे हो अनादर । आप्तोंसे न अंगीकार । ऐसी लालसा अपार । रहती उसकी ॥ ९३ ॥ नम्रताका व्यवहार । अल्पत्व हो अलंकार । करना ऐसे आचार । उसका स्वभाव ॥ ९४ ॥ रहता है या नहीं । ऐसा रहना कहीं । मनमें आशा यही । जीवनमें सदा ॥ ९५ ॥ चलता है या नहीं वहां । हवासे उडता है कहां । ऐसा भ्रम हो जहां तहां । सहज रहे ऐसा ॥ ९६ ॥ मेरा अस्तित्व हो लोप । मिट जाये नाम-रूप । जिससे भय हो लोप । प्राणि-मात्रका ॥ ९७ ॥ उसकी ऐसी मनौति । एकांतमें होती प्रीति । एकांतसे नित्य-रति । उसको सर्वत्र ॥ ९८ ॥ हवासे उसका पटता । गगनसे बोलना भाता । वृक्षोंसे मैत्री है करता । जीव-भावसे ॥ ९९ ॥ अथवा है इस भांतिके । लक्षण दीखते जिसके । सह-शय्यामें ही उसके । रहता ज्ञान ॥ २०० ॥ ज्ञानेश्वरी ४४६