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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1037

पाण्ड्य देशका राजा इंद्रद्युम्न । जब वह तप कर रहा था तब अगस्त्य ऋषि वहां आये । ध्यानस्थ इंद्रद्युम्नने अगस्तिको न देखा न प्रणाम किया । वह वैसे ही बैठा रहा । "इतना मदोन्मत्त यह कौन है ?" अगस्तिके मनमें आया । वृद्ध गुरुजनोंके आनेके बाद उनको उत्थान न देकर बैठा रहनेका यह अपराध देख कर अगस्तिने कहा "तू मदोन्मत्त हाथी बन जा !" और शापवाणी सुनकर सावध हुए राजाने सामने अगस्तिको देखतेही श्रद्धा भक्तिपूर्वक प्रणाम करके स्तवन किया । तब अगस्तिने कहा "हाथी बननेके बाद तुझे एक मगर पकडेगा और आदि पुरुष तेरी रक्षा करके मोक्ष देगा !" इंद्रद्युम्न हाथी बन कर मदमें झूमता हुवा वनमें भटकने लगा । और जब पानी पीने गया तब वहीं पर पडे मगरने इस गजराजको पकडा । गजराजने उस मगरसे अपनेको छुडा लेनेका खूब प्रयास किया । किंतु व्यर्थ । आखिर गजराजने सूंडसे वहीं पर उगे एक कमलको तोड ऊपर उठाते हुए आदिपुरुषका स्मरण किया तो विष्णुने मगरको मारकर गजराजका उद्धार किया । मेरा नरसिंहका भूषण । उसकी महिमा ॥ ज्ञा० ९-४४९ ॥ प्रल्हादका परिचय तीसरे परिशिष्टमें आया है। यहां प्रल्हादके लिये मैं नारसिंह बन कर आया यह कहा है । वैसे ही भयके कारण । निशिदिन कर चिंतन । अखंड वैर धर मन । कंस चैद्यादि ॥ ज्ञा० ९-९६५ ॥ भगवत्स्मरणका कारण कोई भी हो, किंतु उसीका स्मरण हो और वह सतत हो; इसीसे मुक्ति मिलती है। यह कहते समय ऊपरका उदाहरण दिया है। कंस कृष्णका महान शत्रु । कृष्णके भयसे वह सदैव कृष्णको कैसे मार डालें इसीका चिंतन करता था । इससे उसको सदैव सर्वत्र कृष्ण ही कृष्ण हो गया था । कृष्ण जन्मसे पहले ही अशरीरी वाणीसे उसको ज्ञात हो गया था कि देवकीके आठवे पुत्र कृष्णसे तुम्हारी मृत्यु होगी । इससे वह वसुदेव-देवकीको बंदीगृहमें रखकर जनमते ही वसुदेव देवकीके बच्चोंको मारने लगा। कृष्ण-जन्मके पहलेसे ही कृष्ण-चिंतन । जन्मके बाद वह बच निकला । अब बाल्यावस्थामें ही उसको मार डालनेका विचार करने लगा । जैसे जैसे कंस अपने प्रयत्नमें असफल होता गया और कृष्ण बढ़ता गया "मुझे मारनेवाला वैरी !" के रूपमें उसका चिंतन गहरा होता गया । परिणाम स्वरूप सर्वत्र उसको कृष्ण-दर्शन होने लगा । इसी स्थितिमें कृष्णने उसको मार डाला । तब भला बिना कृष्णके और कौन उसका आसरा होगा ? कंस भी कृष्णरूप हो गया ! वही चेदि राजा शिशुपाल । दमघोषका पुत्र । कृष्णकी बुआका लड़का । जब इसका जन्म हुवा तब इस शिशुका रूप विचित्र था । तीन आँखें थीं । इसके माता-पिता इसको मार डालनेको तैयार हो गये थे । इतनेमें अशरीरी वाणी हुई "यह बालक आगे चलकर अत्यंत पराक्रमी होगा । जिसकी गोदमें बिठानेसे इसकी तीसरी आंख जायेगी उसीके हाथों यह मरेगा !" "आगे चलकर कृष्ण अपनी बुआका बच्चा देखने आया । कृष्णने स्वाभाविक ही बच्चेको गोदमें लिया और तीसरी आंख गायब हुई । बुआ कृष्णके सामने रोईं । कृष्णने कहा "मैं इसके सौ अपराध भी सहन करूंगा !" माँने सोचा हो गया ! "यह सौ अपराधसे भी अधिक क्या करेगा !" शिशुपालने कृष्णको अपना शत्रु मानकर उससे वैर करना प्रारंभ किया । कंसकी भांति उसके नाशका विचार करने ९१ परिशिष्ट ४