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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1036

एक दिन खेलनेके लिये दोनों किसी दूसरे आश्रममें गये । वहां अन्य बच्चोंके साथ इनको भी गायका असली और ताजा दूध मिला । अब तक इसने असली दूध चखा भी नहीं था । एक बार दूध चखनेके बाद या दूधका स्वाद लेनेके बाद दूधके नामसे भका आटेका घोल वह क्यों लेने लगा । वह असली दूधके लिये मांके पास हठ करने लगा । तब मांने उद्विग्न होकर कहा “तुमने पूर्वजन्ममें ऐसी ईश्वर-भक्ति कहां की थी कि तुमको इस जन्ममें असली दूध मिले !” यह सुनकर उपमन्युने तुरंत शिवजीकी उपासना प्रारंभ की । बालककी इस आराधनाने घोर तपका रूप ले लिया और शिवजीने प्रसन्न होकर उसको क्षीरसागर ही दे डाला । सुदामाके चिउडके हित । खोली गांठ ॥ ज्ञा० ९-३९४ ॥ ऊपरकी दो ओवियोंमें भगवान अपनी महान संपदाका वर्णन करके मुझे किसी भी बातकी कमी नहीं किंतु— भक्तोंकी ओरसे प्रेमसे दी हुई कोई वस्तु मैं कितने आनंदसे स्वीकार करता हूँ यह कहते हुए श्री सुदामाका स्मरण कर रहे हैं। सुदामा अत्यंत दरिद्री ब्राह्मण । कृष्णका बचपनका मित्र । साथी, गुरु बंधु, आचार्य सांदीपनीके यहां विद्याभ्यास करते समय दोनों साथ थे । साथ साथ गुरुसेवा करते थे । आगे श्रीकृष्ण द्वारकामें वैभवके शिखर पर पहुंच गये और सुदामा दारिद्र्यमें पिसते रहे । कृष्णसे कुछ मांग सकते हैं, मांगना चाहिए यह बात भी कभी उसके मनमें नहीं उठी । किंतु बार बार वह पत्नीसे अपनी बचपनकी बात कहता, कृष्णका प्रेम, प्रेमपूर्ण बर्ताव करता, और अपने आप गद्गद होता । यह सुनकर पत्नी उससे कृष्णसे कुछ याचना करनेको कहती । पत्नीके बार बार कहने पर आखर सुदामा तैयार हुवा । किंतु इतने सालके बाद मित्रके पास जाते समय कुछ भेंट ले जानी चाहिए और कृष्णको भेंट ले जाने जैसा घरमें कुछ है नहीं । कृष्णके पास जाते समय भेंटकी सबसे बडी समस्या हो गयी । अंतमें सुदामाकी पत्नी कहींसे थोडा चिउडा मांग लायी । उसको फटी हुई धोतीमें बांध दिया और सुदामाजी कृष्णके प्रेमका स्मरण करते करते, उनके साथ क्या क्या और कैसे बोलना चाहिए इसका विचार करते करते द्वारका आये । श्रीकृष्णने सुदामाकी बहुत आव भगत की । स्वयं उसके पैर धोये । यह सब देखकर सुदाम दंग रह गया । बेचारा सुदामा, कृष्णको अपने चिउडेकी भेंट क्या बताता ? उसके पास प्रेम था । प्रेमसे वह पुरानी बातोंका ही स्मरण करके कहने लगा और उसी बचपनके आनंदमें हंसने खेलने लगा । तब कृष्णने पूछा “अरे भाई ! वह सब रहने दे ! अब भाभीने मेरे लिये खानेको क्या दिया है ?” सुदामाका संकोच देखकर स्वयं श्रीकृष्णने ही चिउडेकी पोटली की गांठ खोल कर उसको प्रेमसे खाया । सुदामाको भी कृतार्थताका अनुभव हुवा । कृतार्थताके अनुभवके बाद भला मांगना क्या रहा ? अपना दारिद्र्य मिटानेके लिये कृष्णके पास कुछ मांगनेके विचारसे द्वारका गया हुवा सुदामा कृष्णने मेरा लाया हुवा चिउडा खाया इसी आनंदमें झूमता हुवा घर जा गया । देनेका आनंद अनुभवनेके बाद भला मांगनेका दुःख रहता कहां ? किंतु सुदामा अपने घरके पास आ कर देखता है “जहां भिक्ष-दारिद्र्य बसा हुवा था वहां सर्व संपदाका विलास था ! प्रेमसे लाये चिउडेका मंगलमय प्रसाद-प्रासाद प्राप्त हो चुका था ! पकडा मगरने गजेंद्रको । उसने स्मरण किया मुझको । व्यर्थ किया अपनी पशुताको । पाकर मद्रूप ॥ ज्ञा० ९-४४१ ॥ ज्ञानेश्वरी ९०