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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

धर्मराज युधिष्ठिर और उसका एक कुत्ता छोड़कर और सबका पतन मेरुशिखर चढ़ते समय ही हुवा । मेरुशिखर चढ़नेपर स्वर्ग आया । इस वर्णनसे भी मेरुशिखरके विषयमें-उसकी भौगोलिक स्थितिके विषयमें कहने जैसी कोई जानकारी नहीं हुई । गीता अ० १०. श्लो० २४-बृहस्पति मुझे जान पुरोहित प्रधान जो— पुरोहित—प्राचीन कालमें राजाके राजकाज और धर्मकार्यमें आवश्यक सहायता और पथप्रदर्शन करनेवाले प्रमुख ब्राह्मणको पुरोहित कहा जाता था । यह पुरोहित राजाका शिक्षक, अंतरंग-मित्र, तथा पथप्रदर्शक होता था । ऋग्वेदमें ऐसे अनेक पुरोहितोंका उल्लेख मिलता है । दिवोदास भरत-वंशका प्रसिद्ध राजा । ग्रीकके इतिहासमें फिलिप और अलेक्झांडरका जो स्थान है वही स्थान भारतके प्राचीन इतिहासमें दिवोदास और सुदासका है । भरद्वाज दिवोदासका महान और कुशल राजपुरोहित था । शंबर दिवोदासका शत्रु । भरद्वाजने शंबरके विरुद्ध इंद्रकी शक्ति दिवोदासके पीछे खड़ी की । वैसे ही वरशिखाभोंसे पराजित, साधन हीन अभ्यवर्तिन् और प्रस्तोक भरद्वाजको पुरोहित बननेकी प्रार्थना करते हैं। भरद्वाज पुरोहित बन कर पथ-प्रदर्शन करता है। दोनो शक्तिसंपन्न होकर वरशिखाभोंको पराजित करते हैं। ऋग्वेदमें भरद्वाजकी भांति, श्रुतबंधु, कवष, प्रियमैध, वामदेव, कक्षीवान आदि पुरोहितोंके कर्तृत्वका उल्लेख है । वैसे ही विश्वामित्र और वसिष्ठ । दोनों सुदासके पुरोहित । सुदास दिवोदासका पुत्र । विश्वामित्रके पथ-प्रदर्शकत्वमें अश्वमेध यज्ञ करता है। इसमें अनेक राजा पराजित हो जाते हैं। पराजित राजा सब एक होकर सुदास पर आक्रमण करते हैं । तब पुरोहित वसिष्ठ ! वसिष्ठके पथप्रदर्शकत्वमें नौ राजाओंसे - जो एक साथ संगठित होकर आक्रमण करते हैं-लड़कार जीतता है । दोनों ओरकी सैन्य शक्ति देख कर आश्चर्य होता है । वेदमें “मेढने सिंहकी शिकार किया" इन शब्दोंसे इस युद्धका वर्णन किया है । आगे, न्यायदानमें भी पुरोहित सहायता देता था । कौटिलीय अर्थशास्त्रमें भी राज-पुरोहितके कर्तव्य, योग्यता, अधिकार आदिका उल्लेख है। कौटिलीय स्वयं एक प्रकारसे पुरोहित था । शुक्र जैसे दैत्योंका पुरोहित था वैसे बृहस्पति देवोंका पुरोहित था। राजा, मान्य, विद्वान, व नीतिसंपन्न ब्राह्मणोंको सम्मानपूर्वक बुलाकर अथवा उनके पास जा कर पौरोहित्य स्वीकार करनेकी प्रार्थना करते थे । बृहस्पति- बृहस्पति इस पुरोहित-वर्गका श्रेष्ठतम पुरोहित थे। बृहस्पति शब्दका अर्थ वाचस्पति-वाचाका पति अथवा महान तपोघन । बृहस्पति सूक्त द्रष्टा ऋषि हैं । बृहस्पति युद्ध विशारद भी हैं। धनुष्य, बाण, स्वर्ण, परशु इसके हत्यार हैं । ये अत्यंत पराक्रमी थे। इनके रथके घोडे लाल होते थे । ये अत्यंत चरित्रवान् सुद्याचरणी तथा परोपकारी थे। बृहस्पतिने इंद्रको ज्ञानेश्वरी ५४

राज-धर्म सिखाया था। प्राचीन धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र तथा अर्थशास्त्र पर इनके ग्रंथ हैं। अन्य अनेक शास्त्र ग्रंथोंमें इनके नाम देखनेको मिलते हैं। गीता अ० १०, श्लो० २४—स्कंद सेनाधियोंमें मैं— स्कंद—देवोंका सेनापति । शंकर-पार्वतीका पुत्र । स्कंदके जन्मके विषयमें अनेक प्रकारकी जनश्रुतियां हैं। इसकी स्त्री देवसेना। महादेवके वरप्रसादसे डम्पत्त बने हुए तारकासुरका इसने वध किया। तारकासुरने देवोंको अत्यंत कष्ट दिये थे। केवल तारकासुरके नाशके लिये इसका जन्म था। तारकासुरसे युद्ध करनेसे पूर्व देवोंने क्रौंच पर्वत पर इसका सेनापत्याभिषेक किया था। इसने विश्वकी स्त्री अपनी माताके समान मान कर व्रत लिया। विश्वामित्रने इसका उपनयन संस्कार किया। विष्णूने इसको वाहन दिया। वायुने ध्वज दिया। सरस्वतीने वीणा दी। गीता अ० १०, श्लो० २५—भृगु मैं ऋषिवृंदमें— ऋषि—इस शब्दकी उत्पत्तिका विचार किया जाय तो “उत्तमतापूर्वक गतिमान होना” ही ऋषि शब्दका अर्थ है। “दैवी स्फुरणसे स्फूर्त” अर्थात् ऋषि। यह अत्यंत प्राचीन शब्द है। वैदिक युगका शब्द है। ऋग्वेदमें सौसे अधिक बार इस शब्दका उल्लेख आया है। किंतु ऋग्वेदके सभी भाष्यकारोंने ऋषिका अर्थ “मंत्रदृष्टा” ऐसा किया है। ऋग्वेदमें एक जगह “ज्ञानघन अग्नि अत्युत्तम नियामक ऋषि” होनेकी बात कही है। ऋग्वेदमें जिन्हे ऋषि कहा गया है उनकी ओर देखनेसे ज्ञानी, प्रतिभा संपन्न, कवि, तथा तप-सामर्थ्य भी इनका लक्षण दीखता है। किंतु कोई भी ऋषि संन्यासी नहीं दीखता। सभी संसारी हैं। उद्देश्य पूर्वक-विश्वहितार्थे राजनीतिमें भी वे उतरते हैं। वे योद्धा भी होते हैं। इनमें कई धनुर्वेदके अर्थात् धनुर्विद्याके अच्छे जानकार हैं। सर्वत्र सामाजिक तथा राजनैतिक उथल पुथलमें ऋषि-प्रेरणा और कर्तृत्व दीखता है। वे सभी प्रकारके कौटुंबिक सुखकी अपेक्षा भी करते हैं। वेदकाल, ब्राह्मणकाल, उपनिषदकालमें ऋषि-जीवनका जो दर्शन होता है, जो स्वभाव धर्म दीखता है उसमें भिन्नता है। वेदकालसे लेकर जनमेजयके कालतक ऋषि दीखते हैं। किंतु नंद, गुप्त, शृंग आदि कालमें ऋषि नहीं दीखते। संभवतः जनमेजयके कालमें ही ऋषि परंपरा समाप्त हुई। इन प्राचीन ऋषियोंमें (१) भृगु (२) मरीचि (३) अत्रि (४) अंगिरा (५) पुलहः (६) क्रतु (७) मनु (८) दक्ष (९) वसिष्ठ (१०) पुलस्ति इनको महर्षि कहा गया है। कुरुयुद्धके कालमें व्यास महर्षि थे। भृगु—सर्व प्रथम भृगुको अग्नि मिला। प्रजापतिके रेतसे आदित्य, भृगु और अंगिरस उत्पन्न हुए। दक्ष-यज्ञमें भृगु था। यज्ञ-विध्वंसमें भृगुकी दाढी जली! दक्षकन्या-ख्याती भृगुकी पत्नी। शंकर इसका साडू। धातृ, विधातृ इसके दो लडके और लक्ष्मी लडकी। भृगु दैत्य गुरु। भृगु-पत्नीने देवोंसे युद्ध किया था। विष्णुने सुदर्शनसे भृगु-पत्नीका वध किया और भृगुने विष्णुको “गर्भजन्म दुःख भोग” का शाप दिया। नहुषने जब सप्त-ऋषियोंको अपने रथको जोडा तब भृगुने ही उसको शाप देकर इंद्र पदसे पदभ्रष्ट किया था। ५५ परिशिष्ट ३

दिव्या भृगुकी दूसरी पत्नी । दिव्यासे १२ देव बने । इनके नाम पर भृगुस्मृति, भृगुगीता, भृगुसंहिता, भृगुसिद्धांत, भृगुसूत्र आदि ग्रंथोंका उल्लेख है। यह गोत्रकार ऋषि है ! भृगुकुलोत्पन्न सब भार्गव कहलाते हैं । गीता अ० १०, श्लो० २५-मै एकाक्षर वाणीमें— उपनिषदोंमें ब्रह्मको प्रणव अर्थात् ओं अथवा ॐ कहा है । गीता अ० १०, श्लो० २५-जप हूं सब यज्ञोंमें— यज्ञ—अपनी इच्छानुसार अग्नि-प्रज्वलित करनेका शोध मानवी इतिहासमें अत्यंत महत्त्वका शोध है । संभव है कि यही मानवी-बुद्धिका सर्व-प्रथम सफल प्रयोग हो । इसलिये विश्व- संस्कृतिके इतिहासमें, विश्वकी प्रत्येक संस्कृतिके साहित्यमें अग्निकी उत्पत्तिकी कहानियां देखनेको मिलती हैं । अग्निके विषयमें कृतज्ञता प्रकाशन है । अग्नि-स्तवनसे ही भारतीय साहित्यका उगम है “ अग्निमीळे पुरोहितं ” भारतीय साहित्यका आद्य-चरण है। ऋग्वेदमें अग्निके करीब २०० सूक्त हैं। इन सूक्तोंको देखनेसे लगता है “ देवोंमें अग्नि मृदुहृदय ” है । वह अन्य सभी देवोंका प्रतिनिधि है । वह देवोंके पास मानवोंका प्रतिनिधि है । ऋषि अग्निद्वारा अन्य देवोंको आवाहन करते हैं । अग्निद्वारा अन्य देवोंका यजन करते हैं । वहां “ अग्निर्वै सर्वे देवताः ” है । इसलिये “ सभी देवताओंके संतोषके लिये अग्निमें आहुति देना यज्ञ ” माना जाने लगा । ऋग्वेदमें अनेक जगह पर ऐसे विचार मिलते हैं । “ अग्निकी सहायताके बिना मनुष्यको किसी भी प्रकारका सुख नहीं मिल सकता !” इसलिये “ यज्ञ-मानव- कुलके सभी सुखका साधन ” बन गया । यज्ञ जब मानव-कुलके सभी सुखका साधन बन गया तब यज्ञ-संस्थाका विकास और विस्तार होना स्वाभाविक था । पुराने ग्रंथोंको देखनेसे ऐसे लगता है कि “ यज्ञको केंद्र बनाकरही वैदिक संस्कृतिका विकास और विस्तार किया गया !” इन यज्ञोंमें नित्य, दिनमें दो बार करनेके अग्नि-कार्यसे लेकर साल साल चलनेवाले यज्ञ-सत्र तक अनेक कारणोंसे, अनेक प्रकारके यज्ञ कहे गये हैं । जैसे—प्रजाकी वृद्धिके लिये, प्रजाके सुखके लिये, युद्धमें जीतनेके लिये, एकछत्र सम्राट होनेके लिये, सामर्थ्य-वृद्धिके लिये, आयुष्य-वृद्धिके लिये, शक्ति-प्राप्तिके लिये, समाजमें प्रतिष्ठा प्राप्त करनेके लिये, किसी भी महान्-सिद्धांतकी प्रतिष्ठाके लिये, प्रायश्चित्तके लिये, शत्रु-नाशके लिये, शांतिके लिये, रोगोंसे बचनेके लिये, दीर्घायुष्यके लिये, सभी इच्छाओंकी पूर्तिके लिये, संतान प्राप्तिके लिये, ऐश्वर्य प्राप्तिके लिये, ग्रह- शांत्यर्थ, वर्षाके लिये, अन्न प्राप्तिके लिये, षोडश संस्कारों में, ऐसे अनेकानेक कारणोंसे अग्निष्टोम, सोमयाग, पंचमहायज्ञ, अश्वमेध, राजसूय, साकं प्रस्थाइयज्ञ, दाक्षायणयज्ञ, अनेक प्रकारके कामेष्टि- काम्ययज्ञ-पुत्र कामेष्टि-धन कामेष्टि, यश कामेष्टि, आदि-वाजपेययज्ञ, आप्तोर्याम यज्ञ, पंचशारदेय यज्ञ, विद्यापराधयज्ञ, ऐसे कुछ ४०-४१ प्रकारके यज्ञ हैं । यह यज्ञ-प्रक्रिया वेद-कालसे लेकर अर्थात् ई. पू० चार छ हजार वर्ष से लेकर आज तक अखंड चली आ रही है। इन यज्ञोंमें, विधि विधानोंमें की जानेवाली व्यवस्थामें, यज्ञ-संस्थाके “ अनुशासनका परमोच्च आदर्श ” का दर्शन होता है । यज्ञके कर्म-कांडके विधि-विधानोंमें पाये जानेवाले छोटी ज्ञानेश्वरी ५६

छोटी बातोंका ब्यौरा उनकी सूक्ष्म-दृष्टिका तथा स्पष्ट विचारोंका परिचायक है। वहां दर्भोके टुकडे, हवन सामग्री, आहुति देनेवाले चम्मच, आचमनादिके उपकरण, कहां, कैसे, किस ओर, किस वस्तुके, कितनी दूर रखना चाहिए आदिका भी स्पष्ट संकेत है। वैसे ही किस यज्ञकी आहुतिके लिये कौनसा हवि चाहिए, ? वह, कहां, कैसे, किसके, किस आकार प्रकारके बर्तनमें, किस प्रकारकी अग्नि पर, किन मंत्रोंको कहते हुए पकाना चाहिए इसका भी विवेचन है। किस प्रकारके यज्ञमें कैसी समिधायें होनी चाहिए ? यज्ञमें घीकी आहुति देनेवाले चम्मच कैसे होने चाहिए ? वह किस धातुके अथवा किस लकडीके होने चाहिए ? आदि सविस्तर जानकारी वेदोत्तर कालमें लिखे गये ब्राह्मण-ग्रंथोंमें देखनेको मिलती है। आजकलके कुछ विद्वान विचारक ब्राह्मण ग्रंथोंके विषयमें "अलग अलग यज्ञोंके विधिविधानोंका विस्तार पूर्वक वर्णन करनेमें ब्राह्मण- कालीन बुद्धिमत्ताका दुरुपयोग" मानकर "उनके विषयमें जुगुप्सा भरी दया" दिखाकर भी इंग्लंडके राजा अथवा रानीके सिंहासनारोहणके निःसार विधि-विधान देखकर "वंडरफुल डिसिप्लीन" कहनेमें अपनेको धन्य मानते हैं। वस्तुतः यज्ञ संस्कृति निर्माणका साधन थे। वैदिक संस्कृति यजन-संस्कृति थी। बिना अनुशासनके कोई समाज, संस्था, सभ्यता या संस्कृति अधिक समय तक टिक नहीं सकती। अनुशासन ही सातत्य और स्थायित्वका प्राण है। जिस समाज अथवा सभ्यतामें, संस्था अथवा संगठनमें अनुशासन जितना सुव्यवस्थित है वह उतने ही अधिक काल टिकेगा। भारतीय जीवनमें अनुशासनका अत्यंत महत्व रहा है। यहां अनेक प्रकारका अनुशासन चला है। धर्म के विषयमें कहते समय 'अथातो धर्म-जिज्ञासा' कहते ही धर्मानुशासनम् आया। राजनीतिकी बात आते ही दंडानुशासन आया। केवल अध्यात्म ज्ञान कहनेवाली गीता भी "आज्ञा मानके शास्त्रकी आज्ञा कर तू सब कर्मको"-कहती है। अर्थात् संस्कृतिके प्राणभूत प्रथाको अनुशासन बद्ध रखना अत्यंत स्वाभाविक था। साथ साथ यज्ञ वैदिक आर्योंकी अर्थ-वितरण व्यवस्था भी थी। ब्राह्मण नित्य-यज्ञ करते थे। उनके यज्ञ व्यक्तिगत थे। किंतु राजाओंके, वैश्योंके जो यज्ञ थे वे सामूहिक थे। उनके कोशमें इतना धनसंचय होते ही यह यज्ञ करना ऐसी अलिखित परंपरा-सी थी। इस यज्ञके द्वारा वह संचित-धन समाजके अनेक प्रकारके लोगोंके पास पहुंच जाता था। महाभारतमें राजसूय-यज्ञका वर्णन पढ़ते समय, तथा यज्ञ-व्यवस्थाको पढ़ते समय लगता है कि कथाकथनकला-पुराण अर्थात् आख्यान कहना, नृत्यकला, नाटककला, संगीतकला, वाद्यकला, चित्रकला, शिल्पकला, बढ़यी, कुम्हार, बर्तन बनानेकी कला, आदि अनेक कलायें यज्ञ द्वारा विकसित हुई हैं। साथ साथ कोई भी एक बड़ा यज्ञ करनेका अर्थ संचित धन अनेक प्रकारके कार्य करके उदर निर्वाह करनेवालोंमें बंट जाना था। धन वितरणकी इस व्यवस्थाकी दृष्टिसे भी कई प्रकारकी व्यवस्थाएँ-अनुशासन-आवश्यक था। साथ साथ केवल अग्नि-मुखमें आहुति देना ही यज्ञ नहीं रहा। आगे चल कर यज्ञके रूप बदले। अग्निके तीन रूप हैं। उसमें शरीरस्थ अग्नि वैश्वानर है। वाक् शक्ति भी अग्नितत्त्वसे संबंधित है। हम कोई भी श्रमका कार्य करते समय श्वास निरोध करते हैं। ऐसी स्थितिको उपनिषदोंमें आंतर-अग्निहोत्र कहा है। उपनिषदमें कहा है "मनुष्य जब बोलता है तब वह श्वासोच्छ्वास नहीं करता, "अपना प्राण-वायु वाचामें हवन" करता है। जब वह श्वासोच्छ्वास करता तब बोल नहीं सकता अर्थात् "वाणीका प्राणमें हवन" करता है। प्रातर्दन ऋषि इसको ५७ परिशिष्ट ३ (5)

“मानवको अमर अग्निहोत्र” कहता है “वाणीमें प्राण और प्राणमें वाणीका यह यज्ञ मानवका महान यज्ञ है। अन्य हवन कर्ममय है इसलिये वह नाशवंत है। अपने अंतर्याममें चलनेवाले इस अग्निहोत्रकी जानकारी रखनेवालेके लिये बाह्य अग्निहोत्रकी आवश्यकता नहीं।” यह इस ऋषिका मंतव्य है। तैत्तरीय उपनिषदमें वाग्यज्ञका विवेचन है। विकार रहित मन वाग्यज्ञका चम्मच है। साकार अंतःकरण घी है। वाणी यज्ञ-वेदिका है। शब्द दर्भ है। केवल ज्ञान हवनीय अग्नि है। उद्देश्य मिश्रित ज्ञान गार्हपत्य अग्नि है। वाक्-शक्ति प्राप्त वक्ता होतृ है। मन उपवक्ता है। प्राण ही आहुति है। और गान पुरोहित। गीतामें भी (१) ब्रह्मयज्ञ, (२) द्रव्ययज्ञ (३) देवयज्ञ (४) ज्ञानेंद्रिययज्ञ (५) विषययज्ञ (६) स्वाध्याययज्ञ (७) प्राणयज्ञ (८) अपानयज्ञ (९) प्राणापानयज्ञ (१०) आंतरपानयज्ञ (११) योगयज्ञ (१२) तपोयज्ञ (१३) जपयज्ञ (१४) इंद्रियप्राणयज्ञ ऐसे चौदह प्रकारके यज्ञ कहे हैं। धर्मकी भांति यज्ञका विचार भी अनेक शाखा प्रशाखाओंसे फैला है। वेदकालसे लेकर वर्तमान तक अनेक मनीषियोंने यज्ञकी अनेक व्याख्यायें करके यज्ञके अनेक प्रकार बताये हैं और अंतमें कहा है तप, भोग और यज्ञ ये तीन विश्वव्यवस्थाके आधार हैं। किसी उद्देश्यकी पूर्तिके लिये “सतत” परिश्रम करना तप है। तपसे प्राप्त फलको भोगना, उसको ग्रहण करके उससे आनंद लेना भोग है और तप और भोगसे जो घिसाई होती है क्षति होती है उसकी पूर्ति करना यज्ञ है। व्यक्तिगत तथा सामूहिक जीवनके जिन जिन क्षेत्रोंमें तप और भोगके कारण जो जो क्षति होती है, “जिन जिन तत्त्वोंकी घिसाई होती है उनकी पूर्ति करना” यज्ञ है। इसी बातको लेकर महात्मा गांधीजीने “नियमित सूत कातनेकी क्रियाको सूत्र-यज्ञ” कहा था। तथा जब किसी देशकी प्रजा पराक्रम शून्य हो जाती है उस समय प्रजामें पराक्रम वृत्ति जगानेके लिये प्रेरणाप्रद सामूहिक रचनात्मक कार्य चलता है वह राष्ट्रीय यज्ञ है। जीवनके विविध अंगोंकी क्षति-पूर्तिके इस विविध प्रकारके यज्ञोंमें जपयज्ञ सर्व श्रेष्ठ माना गया है। जप— जप तीन प्रकारका होता है। (१) वाचिक जप, (२) उपांशु जप, (३) मानसिक जप। जप करनेवाला जो उच्चार करता है वह जब सब सुन सकते हैं तब वह वाचिक जप कहता है। यह उच्चार केवल जप करनेवाला ही सुन सकता है तब उपांशु जप। और जो मन ही मन किया जाता है वह मानसिक जप। वाणी के-वाक्शक्तिके-चार प्रकार हैं। वैखरी, मध्यमा, पश्यंती, परा। ये वाक्शक्तिके स्थूलसे सूक्ष्म-रूप हैं। वाणीका रूप जैसे जैसे सूक्ष्म होता जाता है वैसे वैसे शब्द भाव-रूप बनता जाता है। शब्द-जब भाव-रूप बन जाता है तब शब्द शक्ति प्रकट होती है। जो गुप्त रूपसे जीवनको उजला देती है। मंत्रका कितना जप किया इसका उतना महत्व नहीं किंतु वह कैसा किया इसका महत्व है। शब्द भावमें परिणत नहीं हुआ शब्द ही रहा तो उसका करोडों जप होने पर भी विशेष कुछ लाभ नहीं है। जप भले ही नामजप हो अथवा सबीज मंत्र जप, वह, वाणीसे कंठ, कंठसे हृदय, हृदयसे नाभीमें जा कर मूलाधारसे सहस्रार तक सारे शरीरमें गूंजना चाहिए। शब्द आकाशतत्त्वका गुण है। आकाश तत्व अत्यंत सूक्ष्म और अविनाशी तत्व है। जप शब्दका कौर निगल कर धीरे धीरे सूक्ष्मतम भाव तत्वसे परे अव्यक्त आकाशतत्त्वसे समरस होनेकी प्रक्रिया है। शब्दका कौर निगलनेका अर्थ शरीरके जिस स्थानसे अव्यक्त आकाश तत्व उदित होकर जहां जहां आघात करते करते शब्दका रूप धारण करता है वह जानकर व्यक्त शब्दको लेकर उसको वहां वहां आघात करते करते सूक्ष्मसे ज्ञानेश्वरी ५८

सूक्ष्मतममें प्रवेश करते करते अव्यक्त आकाश तत्त्वमें विलीन होना है। जिह्वा स्थानकी वैखरी वाणीको पकड़कर, शब्दको कंठकी मध्यमामें सूक्ष्मकर वाचिक जपको उपांशु कर-हृत्कमलमें मानस जप सतत स्मरण रूपमें-अभ्यस्त होने पर वह उसीमें सूक्ष्म होकर स्थूलसे सूक्ष्म होते होते मौनमें लीन हो कर "सूक्ष्मसे सूक्ष्म अचिंत्य रूप" बन जाता है। "जो इंद्रिय बिन भोगना है।" शब्दका यह सूक्ष्मसे सूक्ष्म जो अचिंत्य रूप है वह जिस शक्तिसे श्वास प्रश्वास चलते हैं, जिस शक्तिसे हृदयका स्पंदन चलता है, जिस शक्तिसे शरीरकी हजारो नाड़ियोंसे रक्त संचार होता है, जिस शक्तिसे मन और बुद्धि कार्य करती है, जिस पर श्रद्धा आश्रित है उससे समरस होकर शरीरमें गूंजने लगता है। यह वाणीका अंतिम रूप है जो अनिर्वचनीय है। शब्दके इस सूक्ष्मातिसूक्ष्म अचिंत्य रूपके गूंजनकी जो तरंगें उठती हैं उन तरंगोंके सतत स्पंदनसे जीवके संस्कार गत सारे मल जल जाते हैं अर्थात् शरीरके अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय तथा आनंदमय कोश, स्थूलशरीर, सूक्ष्मशरीर, लिंगशरीर, कारणशरीरके सभी मल जलकर वह निर्मल होते होते देह-सिद्धि भी हो जाती है और जीवनमें सतत गूंजनेवाले वह तरंग विश्वाकाशमें भी प्रविष्ट कर विश्वके आकाश तत्त्वमें लीन हो जाते हैं। वहाँ तरंगित होने लगते हैं। उन तरंगोंका वायुमंडल बनता है। इससे न केवल जप करनेवाले-यह शब्द प्रयोग भी गलत है, जहाँ मैं जप करता हूं इस भावके बिना सहजभावसे अभ्यासके कारण जप होने लगता है-शरीरका ही नहीं किंतु सामूहिक जन जीवनमें होनेवाली क्षति भी भरने लगती है। जप अथवा जप-योग स्थूलमेंसे सूक्ष्म और सूक्ष्मसे अति सूक्ष्मकी ओर जानेकी प्रक्रिया है। शब्द-जन्य विशिष्ट प्रकारका स्पंदन सूक्ष्म और अति-सूक्ष्म हो कर शरी- रमें प्रवेश करते जाता है। तब उन स्पंदनोंसे शरीरके अणु अणु (पेशियां) हिलकर साफ होते जाते हैं। जपके सातत्यसे, प्राणको सतत विशिष्ट दिशामें गति मिलती है इससे प्राण विशिष्ट गति और विशिष्ट दिशामें शरीरके अणु अणुमेंसे-सूक्ष्म और गति शील होनेसे-प्रवेश करते जाता है। वस्तुतः शरीर १०००००००००००००००००००० सजीव और स्वतंत्र पेशियोंका अखंड संघटन है। इनमेंसे बहुत ही कम पेशियां काम करती हैं। इन पेशियोंके बीच अनेक प्रकारके सूक्ष्मातिसूक्ष्म मल होते हैं। इसलिये ये सब चिपककर, कार्य रात न होकर, आलसी निर्जीवसी पड़ी रहती हैं। यह मल भी मन, वचन, विचार, भावादिके किये गये असत्कर्मोंसे, अनृत चिंतनसे, द्वेषादिसे, कुटिल विचारोंसे, अनेक विध वासनाओंके चिंतनसे, आचारसे, तथा भाषणसे भी,-अनृत आचार, अनृत विचार, अनृत भाषण, अनृत चिंतनसे-मानवी शरीरकी सूक्ष्म नाड़ियां, सैकड़ोंकी संख्यामें, सिकुड़ जाती हैं, टूट जाती हैं, नष्ट हो जाती हैं, व्यक्ति और समाजकी इस सूक्ष्म घिसाईको क्षतिको भरना है। जब ऐसे सूक्ष्म तरंगोंसे, जप कर्ताके शरीरस्थ सभी आकाश-क्षेत्र भरकर वे विश्वाकाशमें प्रसारित होती हैं तो मनुष्य विश्वतरंगोंके प्रभावसे विश्व-शक्तिसे समरसैक्यका अनुभव करने लगता है। तब मानो उसका प्रत्येक श्वास एक नया काव्य ही बनता है। यह संत-जीवनका सार है जिससे वे अनजाने ही अपने समयमें ही नहीं युगों तक जन मन पर अपना स्वामित्व रखते रहे हैं क्यों कि उनकी वे तरंगे युगों तक विश्वाकाशमें रहती हैं। इसीलिये जप योग सभी योगमें श्रेष्ठ मान कर जप-यज्ञ-सतत क्षति पूर्तिकी साधना-सतत अपने सर्वस्वका हवन-सब यज्ञमें श्रेष्ठ मान कर परमात्म रूप माना है। ५९ परिशिष्ट ३

गीता अ० १०. श्लो० २५-स्थावरोंमें हिमालय- पीछे नदियोंके परिचय देते समय भारतकी पर्वतश्रेणियोंका सामान्य परिचय तो हुआ है उसमें हिमालय पर्वत परमात्माका रूप है। एक विभूति है। हिमालय-पर्वत भारतके उत्तरमें है। यह भारतवर्षके उत्तरी प्रहरी माना जाता है। इसी पर्वतके शिखर आज पृथ्वी पर सर्वोच्च पर्वतशिखर हैं। प्राचीन कालके लोग इन शिखरोंको हिमास अथवा हिमोवास कहा करते थे। इसके वायव्यमें सिंधुनदी इसकी वायव्यसीमा तो पूर्वमें यह ब्रह्मदेशको छूता है। कालिदासने इसको "पृथ्वीका मान-दंड" कहा है। जम्मू काश्मीरका अधिकांश भाग इस पर्वत श्रेणीमें खो गया है वैसे ही नेपाल, भूटान और सिक्कम आदि राज्य तथा पंजाबका कांग्राजिला हिमाचल प्रदेश इसी पर्वतश्रेणियोंमें बसा है। उत्तर प्रदेशका कुमायूं और टिहिरी गढवाल विभाग हिमालयमें बसे हैं। कुमायूं विभागमें तीन और टिहिरी गढवालमें तीन ऐसे छ जिले हैं। यह पर्वत भारत और तिब्बतका विभाजन करता है। इनके पर्वत-शिखर ८०००-९००० फूटसे २८-२९ हजार फूट तक ऊंचे हैं। यह पर्वत श्रेणी इतने विशाल भूभागमें फैली है कि अब तक इसके एक तिहाई भागका पत्ता भी नहीं मिल सका। १५००० फूट ऊंचाईके बाद चिरकाल हिमरेखा दिखाई देती है। इसमेंसे जो नदियां बहती हैं उसी पर पंजाब, उत्तर भारत तथा बिहारका जीवन निर्भर है। पेशावरसे आसाम तक करीब १६०० मील फैले हुए इस महा पर्वत पर (१) नंगापर्वत (२६१८२ फूट) (२) नंदादेवी (२५६६१ फूट) (३) त्रिशूल (२३२८२ फूट) (४) पंचचुल्ली (२२६७३ फूट) (५) नंदाकोट (२२५६८ फूट) (६) गौरीशंकर (२९००२ फूट) (७) धवलगिरि (२६८२६ फूट) (८) गोसईस्थान (२६३०५ फूट) (९) कांचनगंगा (२८१४६ फूट) आदि महत्त्वपूर्ण शिखर हैं। इसमेंसे कई शिखर अब तक चढना बाकी है। हिमालयके ऊंचे प्रदेशमें बौद्ध धर्मका विशेष प्रचार दिखाई देता है। १४ वीं सदीमें सिकंदर नामके राजाने काश्मीर पर आक्रमण करके वहांके लोगोंको मुसलमान बनाया, इससे वहां मुस्लीम धर्मका प्रभाव सबसे अधिक है। हिमालयके अनेक भागमें विशाल वनश्री है। इन अरण्योंमें अनेक प्रकारकी वनस्पति और घर बांधने लायक लकडी मिलती है। यहां आने जानेका कोई विशेष साधन नहीं है। यद्यपि स्वातंत्र्यके बाद और विशेषतया चीनके आक्रमणके बाद अनेक रास्ते बनाये गये हैं।

गीता अ० १०. श्लो० २६-अश्वत्थ सब वृक्षोंमें- अश्वत्थ- [जिसकी] जड़ोंको सींचनेसे दूसरे दिन पानी नहीं रहता यह अश्वत्थ शब्दकी व्याख्या है। एक इसका नाम अश्वत्थ पड़नेके लिये यहभी एक कारण बताया जाता है कि एक बार अग्नि देवोंसे अलग होकर अश्वरूपसे एक वर्ष तक इस वृक्ष पर रहा इसलिये यह अश्वत्थ कहलाया। अश्वत्थके विषयमें और भी कई जनश्रुतियां हैं किंतु अश्वत्थ वेद कालमें भी पूज्य था। ब्राह्मणमें भी इसका उल्लेख है। यज्ञ कार्यके लिये अग्नि प्रज्वलित करनेवाली उत्तरारणि अश्वत्थकी होती है। ऋग्वेदमें अश्वत्थको देव-सदन कहा गया है। सिंधु संस्कृतिमें भी अश्वत्थको पूज्य माना गया है ऐसे विद्वानोंका मत है। सिंधुसंस्कृतिके उत्खनन प्राप्त एक मुद्रामें अश्वत्थके दो डालियोंके बीच एक देवता खडी है। दूसरी एक मुद्रामें

ज्ञानेश्वरी ६०

एक सींगवाले दो देवता अश्वत्थके छोटेसे गाछकी रक्षा करते हैं। कहते हैं कि सिंधुजनकी श्रेष्ठ देवता महिष-मुंड अश्वत्थवासिनी है। अर्थात् वेद-पूर्वकालसे ही भारतमें अश्वत्थ श्रेष्ठ वृक्ष माना जाता था। ऋग्वेदमें अश्वत्थको देव-सदनके साथ पितरोंका भी निवासस्थान माना है। बुद्धोंने भी अश्वत्थको बुद्धत्वका प्रतीक माना है। प्राचीन भारतीय समाजमें अश्वत्थ पूजन, अश्वत्थ प्रदक्षिणा, अश्वत्थोपनयन आदि प्रघात प्रचलित हैं। गीता अ० १०, श्लो० २६-देवर्षि मध्य नारद— ऋषियोंमें ब्रह्मऋषि, महर्षि, राजऋषि, देवऋषीं ऐसे प्रकार हैं। नारद देवर्षी हैं। देवर्षी भी दस हैं जैसे महर्षि दस हैं। इनके नाम हैं (१) नारद (२) अत्रि (३) मरीचि (४) भारद्वाज (५) पुलस्य (६) पुलह (७) ऋतु (८) वसिष्ठ (९) प्रचेता (१०) शिव। शिव देव और असुरोंको वर देनेवाला देवर्षी है। नारद—ब्रह्माका मानस-पुत्र। सर्वविद्यासंपन्न। प्रतिभासंपन्न राजनीतिज्ञ। उसके कुटिल तंत्रके कारण उसको कई बार "तू नाश होकर पुनर्ज़न्म प्राप्त कर" ऐसा शाप मिला। नारदने नाश होकर पुनर्ज़न्म लिया। कहीं इसको बृहस्पति का शिष्य कहा गया है। यह सोम-विद्यामें सोमफका गुरु था। सदैव इसने देव और ऋषियोंकी सेवा की। इसने सावर्ण मन्‌को पांचरात्रनामक उपदेश दिया। नारायणको आत्मतत्त्वका उपदेश दिया। शुक्राचार्यको इसीने ज्ञानोपदेश दिया। देवलको सृष्टि उत्पत्तिके विषयमें इसीने उपदेश दिया था। इसने व्यासको भी कई ज्ञानकी बातें कहीं हैं। वसुदेवको भागवत-धर्म इसीने कहा था। इसीने श्रीकृष्णको पूज्य कौन होता है इसका बोध दिया था। धर्मराजाको इसने राजनीतिका उपदेश दिया। प्रह्लादको इसीने भक्तिका उपदेश दिया था। याज्ञवल्क्य और पाराशरने प्राचीन धर्मशास्त्रज्ञ कहकर इसका उल्लेख किया है। कई प्राचीन पोथियोंमें अनेक विषयों पर इसके विचार श्लोक-रूपमें देखनेको मिलते हैं। महाभारतमें अनेक स्थानों पर अनेक विषयों पर नारदके मत देखनेको मिलते हैं। देव, दानव, मानव, ऋषि, सबमें इसका समान प्रवेश और समान सम्मान था। कोई भी, देव हो, दानव हो, ऋषि हो, कोई हो, किसी समय हो इसकी भेंट अस्वीकार करनेका साहस नहीं कर सकता था। नारदने कई बार अपने पूर्व-जन्मकी कथा कही है। इससे एक विचार आता है कि नारद एक व्यक्ति था या पीठ ? पुराणोंमें नारदकी जो कथाएँ आती हैं, उसके जो विचार आते हैं, उन सबका संग्रह किया जाय तो कई ग्रंथ हो सकते हैं नारद इतना सर्वव्यापक है ! गीता अ० १०, श्लो० २६-चित्ररथ गंधवोंमें— गंधर्व—'संगीत और वाद्यविद्याका आनंद जिसके पास है वह' यह गंधर्व शब्दका अर्थ । इसके अलावा भी अन्य अनेक अर्थ पुरानी पोथियोंमें है। गंधर्व मनुष्योंसे उच्च और देवोंसे निम्न ६१ परिशिष्ट ३

समाज है। इनको अतिमानव माना गया है। पुरानी पोथियोंमें गंधर्वोकी उत्पत्तिके विषयमें अनेक प्रकारकी जनश्रुतियां हैं। ऋग्वेदमें भी गंधर्वोंका उल्लेख है। गंधर्व सौंदर्य-प्रिय, अलंकार-प्रिय, तथा स्त्री-लंपट जाति है। वे फूलके पागल हैं। इनकी स्त्रियोंको अप्सरा कहते हैं। इनमें नृत्य संगीत वाद्य-कला निपुण सुंदर-कन्याओंका विवाह न करनेकी प्रथा थी। ये सामाजिक संपत्ति थी। कलोपासना ही इनका ध्येय। संभवतः इसीलिये संगीत शास्त्रको गंधर्व-वेद कहा जाता है। गंधर्वोंके आठ गण कहे गये हैं (१) हाहा, (२) हूहू (३) चित्ररथ (४) हंस (५) विश्वावसु (६) गोमायू (७) तुंबुरु (८) नंदी। अग्नि-पुराणमें ११ गण कहे गये हैं। (१) भन्नास (२) अंगारी (३) बंभारी (४) सूर्यवच (५) कृधू (६) हस्त (७) सुहस्त (८) मूर्द्धन्वान् (९) महामना (१०) विश्वावसू (११) कृशानु । चित्ररथ—कश्यप और मुनिका गंधर्वपुत्र । इसका नाम अंगारपर्ण। फिर यह चित्ररथ कहा जाने लगा। लाक्षाग्रहसे छूटकर जाते समय अर्जुनकी इससे लडाई हुई थी। अर्जुनका पराक्रम देखकर प्रसन्न होकर अंगारपर्णने अर्जुनको कई विद्याएं सिखाईं। अर्जुनसे भी कुछ सीखा। युधिष्ठिरके राज-सूय यज्ञमें इसने उन्हे १०० घोडे दिये थे। इसीने युधिष्ठिरको किसीको देखकर किस वर्णाश्रमका है यह जाननेकी विद्या सिखाई। तथा तपस्यासंपर्णाख्यान सुनाया। गीता १०. श्लो० २६-सिद्धोंमें कपिल मुनि— सिद्ध—विश्वमें जो अनेक गूढ रहस्य हैं उनमें शरीर रहित चैतन्यका संचार भी एक गूढ तम रहस्य है। यह भी एक योनि है। ये केवल मानवोंमें ही नहीं अतिमानवोंमें भी हैं जो विश्वके प्रभावी देवता या शक्तियोंके हस्तक बन कर लोकहितके कार्यमें निमग्न होते हैं। साथ साथ भक्त, ज्ञानी, योगी आदि जीवनमें कृतकृत्य होकर देहपातके बाद उपास्य देवताकी आज्ञासे उनके हस्तक बन कर काम करते हैं। इन्हे देवताके समान मान दिया जाता है। योगसाधनमें ऐसे सिद्ध अत्यंत सहायक होते हैं। पतंजल-योगके विभूति-पादमें सिद्धदर्शन भी एक विभूति है। सिद्धोंके विषयमें इनकी परंपराओंके विषयमें अध्ययन पूर्वक अनेक पुस्तकें लिखी गयी हैं। ये सिद्ध ईश्वरके समान नित्य माने गये हैं। “विश्वमें होनेवाले लोककल्याणकारी महान घटना- ओंमें सिद्धोंका हाथ रहता है” ऐसे अनेक विद्वानोंने मुक्त-कंठसे कहा है। अर्थात् देह रहित लोक हितकारी नित्य-चैतन्य शक्तिको सिद्ध कह सकते हैं और इन सिद्धोंमें— कपिल मुनि—कर्दम और देवहूतीका पुत्र । इसका स्थान सिद्धपुर या और (?) बिंदुसर । इसने अपनी माताको ब्रह्मज्ञान कहा। जब यह समाधिस्थ था पिताके अश्वमेधके घोडोंके अश्व रक्षक सगर पुत्रोंने-इसीने अश्व चुराया इस भ्रमसे-इस पर शस्त्र प्रहार किया और इसकी आंखोंसे निकली क्रोध ज्वालासे जल कर राख हो गये। इसको आदि सिद्ध माना गया है। आसुरी इसका शिष्य, यह प्रत्यक्ष शिष्य नहीं है। कपिलप्रतिपादित सिद्धांतका स्फुरण मुझमें हुवा ऐसे यह कहता है। कपिलको सांख्यशास्त्रका आदि प्रवर्तक माना जाता है। तत्त्वज्ञानके सहारे मोक्ष प्राप्त करना इस शास्त्रका उद्देश है। सांख्य शास्त्र कर्मकांडसे ज्ञानको अधिक महत्व देता है। उपनिषद् भी ज्ञानको कर्मसे श्रेष्ठ मानते हैं। ज्ञानेश्वरी ६२

कुछ विद्वानोंका कहना है कि ध्यान और चिंतनका आदि प्रर्वतक भी कपील है । इसके प्रथम, कर्म ही महत्वपूर्ण साधना अथवा उपासना थी। कपिलको निरीश्वरवादि माना गया है । इसको विष्णुका पांचवा अवतार भी कहा गया है । कपिलके नाम पर (१) सांख्यसूत्र (२) तत्वसमास (३) कपिलगीता (४) (५) कपिलपांचरात्र (६) कपिलसंहिता (७) कपिलस्मृति (८) कपिलस्तोत्र (९) व्यासप्रभाकर ऐसी कुछ पुस्तकें प्रचलित हैं । गीता अ० १०. श्लो० २७-उच्चैश्रवा अश्वोंमें मैं— देवासुरोंने जो समुद्रमंथन किया तब (१) लक्ष्मी (२) कौस्तुभ (३) पारिजातक (४) सुरा (५) धन्वंतरी (६) चंद्रमा (७) कामधेनु (८) ऐरावत (९) रंभा (१०) उच्चैश्रवा (११) कालकूट विष (१२) शाङ्गधनुष्य (१३) पांचजन्य (१४) अमृत ये चौदा वस्तु मिले। इनमें उच्चैश्रवा सात मुखोंका घोडा भी है। इसका रंग शुभ्र । इसका खाद्य अमृत । यह इंद्रका वाहन है । दशहरेके दिन जो अश्व-पूजा होती है वह वास्तवमें उच्चैश्रवाकी पूजा है । गीता अ० १०. श्लो० २७-ऐरावत गजेंद्रोंमें- भारतीय साहित्य और संस्कृतिमें हाथीको वैभव और संपन्नताका प्रतीक माना गया है । ऋग्वेदमें लक्ष्मीका वर्णन करते समय "हाथीके गर्जनसे जगनेवाली" ऐसे कहा गया है । हाथीको लक्ष्मीका भी प्रतीक माना गया है। प्राचीन शिल्पमें भी लक्ष्मीके साथ गज-अर्थात् हाथीके चित्र होते हैं। लक्ष्मीके साथ ऐरावत भी समुद्र मंथनसे प्राप्त रत्न हैं । ऐरावत-यह सफेद हाथी है। समुद्रमंथनमेंसे उत्पन्न हुवा। ब्रह्मांडके आधारभूत (१) ऐरावत (२) पुंडरीक (३) वामन (४) कुमुद (५) अंजन (६) पुष्पदंत (७) सार्वभौम (८) सुप्रतीक इन आठ दिग्गजोंमें इंद्रने इसको पूर्व दिशामें स्थापित कि। कृष्ण और इंद्रके युद्धमें यह हाथी गरुडसे पराजित हुवा था। कहीं कहीं इसकी सात सुंड होनेका उल्लेख है ! भीम अपनी मातके गजपर्वकी पूजामें इसे पृथ्वि पर लाया था ऐसी जनश्रुति है । गीता अ० १०. श्लो० २७-नरोंमें मैं नराधिप- नर शब्दका अर्थ है नेतृत्व करनेवाला । नेतृत्व करनेवालोंमें नराधिप - राजा - ईश्वरका रूप है । : वेदमें प्रत्येक शब्दके तीन अर्थ किये जाते हैं। उस प्रकार राजा-सामाजिक क्षेत्रमें इंद्र है। राजाको इंद्रका तथा विष्णुका प्रतिनिधि माना गया है। गीता अ० १०. श्लो० २८-शस्त्रोंमें वज्र मैं रहा- शस्त्र-प्रहार करनेके साधनको आयुध शस्त्र कहते हैं। इसमें पत्थर और लोहेके डंडोंसे लेकर अणुबांब तक आ जाते हैं। युद्ध-साहित्य सब आयुध शब्दमें समा जाते हैं। संस्कृतिके विकासके साथ आयुधोंका भी विकास हुवा है। स्वसंरक्षण तथा दूसरोंपर आक्रमण करनेवाले सभी साधन आयुध कहाते हैं। इनमें सतत हाथमें ले लडनेवाले आयुध, जैसे तलवार, गदा, धनुष्य, बंदूक, तमंचा आदि, फेंकके मारनेवाले आयुध, भाले, त्रिशूळ, शक्ति, तोमर, आजकल हाथ-बॉब आदि, अस्त्र, युक्तिसे चलनेवाले-मंत्रपूरित आयुध-आग्नेयास्त्र, ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र आदि, ६३ परिशिष्ट ३

वैसे ही शतघ्नि, तोप आदि। किंतु इससे भी भिन्न प्रकारके कुछ आयुध दीखते हैं जो फेंक कर मारनेके बाद अपना काम करके वे पुनः लौटकर आते हैं। जैसे विष्णुका सुदर्शनचक्र, इंद्रका वज्र। चक्रके विषयमें जो जानकारी मिलती है वह अत्यंत अद्भुत है। वह कई मील तक पीछा करके शत्रु का संहार करता है और अपना काम होते ही वह लौट पडता है! हमारे प्राचीन ग्रंथोंमें, शंकरका त्रिशूल, विष्णुका सुदर्शन, भार्गवरामका परशु, इंद्रका वज्र, वरुणका पाश, गणपतिका अंकुश-मत्रोंको छोडकर-अत्यंत प्रसिद्ध और आश्चर्यजनक आयुध रहे हैं। वज्र—यह इंद्रका अत्यंत भयंकर आयुध है। यह कभी व्यर्थ नहीं जाता। इस आयुधकी निर्मिती दधीचि ऋषिके अस्थियोंसे हुई थी। दधीचि ऋषि महा-तपस्वी सामर्थ्यवान लोकहितव्रती थे वृत्रासुरको मारनेके लिये इंद्रको ऐसे एक महान आयुधकी आवश्यकता थी। दधीचि मृत्युंजय था। इंद्रने दधीचिसे उसकी अस्थियोंकी प्रार्थना की। विश्व-हितके लिये अपनी अस्थियोंकी आवश्यकता है यह सुनते ही दधीचि ऋषिने योग-बलसे शरीर त्याग दिया। इसके बाद उसकी अस्थियां लेकर षट्कोण आयुध बनाया गया जिससे वृत्रका संहार हुवा। गीता अ० १०. श्लो० २८-मैं कामधेनु गायोंमें— कामधेनु—इच्छापूर्ति करनेवाली गाय ! यह भी समुद्रमंथनमेंसे निकली थी। कामधेनुके सभी अवयव सिर, माज, जांघ, स्तन, पुच्छ, तथा गलेका झोल, ये छ अवयव पुष्ट और ऊंचे थे। उसकी आँखें मेंडककी भांति थीं। स्तन पुष्ट थे। वह सर्वांगसुंदर थी। शिवजीका नंदी इसका बछडा। यह गाय वसिष्ठऋषिके आश्रममें थी। सूर्यवंशके दिलीप राजाने इसकी सेवा की और प्रसन्न कामधेनूकी कृपासे रघु राजाका जन्म हुवा। इस परसे सूर्यवंशको रघुकुल कहते हैं। गी. अ० १०. श्लो० २८-उत्पत्ति हेतु मैं काम— काम-ब्रह्माका मानस पुत्र। इसकी स्त्री रति। जन्मता यह अत्यंत रूपवान था। इसके शरीरमें सुवास था। जन्म होते ही इसने ब्रह्मदेवसे पूछा "मेरा जीवित-कार्य क्या है !" "तू स्त्री पुरुषोंको मोहित कर। ब्रह्मा विष्णु शंकर सहित सभी देव तेरे वश होंगे।" परिणाम स्वरूप इसने ब्रह्मा परही अपना प्रथम प्रयोग किया। एक बार शिवने इसको दग्ध किया था। फिर यह कृष्णमें प्रद्युम्नके रूपमें आया। वसंत ऋतु इसका मित्र है। (१) इसके स्पर्शसे स्त्री पुरुषोंमें मद आता है इसलिये मदन (२) ऋषियोंका भी मंथन करता है इसीलिये मन्मथ (३) शिवके उःशापसे बिना शरीरके मानवोंमें रहा इसलिये अनंग ऐसे इसके तीन नाम हैं। भाई बहनोंमें विकार निर्माण करनेसे शंकर इसको जलायेगा। शंकरको पुत्रेच्छा होगी तब कामेच्छा होगी ऐसा शाप और वर मिले हैं। गीता अ० १०. २८-१० श्लो० २९-मैं सर्पोत्तम वासुकी-नागोंमें शेष नाग मैं। नाग और सर्प--फनावाला सांप। भारतीय संस्कृतिमें अत्यंत प्राचीन कालसे नागपूजा प्रचलित है। ये नाग गेहुंआ, हरी आभा लिये पीले, पूरा पीलो, तथा काले होते हैं। इनके मुखमें विषका दांत होता है। प्राचीन भारतीयोंने उनको देवत्व दिया है। भारतके प्रत्येक प्रदेशमें नाग-पूजा प्रचलित है। ज्ञानेश्वरी ६७

पौराणिक जन-श्रुतिके अनुसार कश्यप इनका पिता और कद्रू इनकी माता है । (१) अनंत (२) वासुकी (३) तक्षक (४) कर्कोटक (५) पद्म (६) महापद्म (७) शंख (८) कुलिक नागोंकी ये आठ जातियां हैं । इनके साथ (९) कालिय भी गिनते हैं । पौराणिक जनश्रुतिके अनुसार ये जब प्रजाको बहुत सताने लगे तब ब्रह्माने शाप दिया- “प्रथम तुम्हारा ससौतेला भाई तुम्हारा संहार करेगा फिर जनमेजय राजा ।” पौराणिक जनश्रुतिके अनुसार कुछ नाग, देव और मानवोंके अनुकूल और कुछ प्रतिकूल हैं । इनमें तक्षक, कर्कोटक, कालिया ये सदैव प्रतिकूल ही रहे हैं । विश्वमें सर्वत्र नाग हैं, नागपूजा भी है । किंतु भारतमें वह जिस प्रमाणमें प्रचलित है वैसी अन्यत्र कहीं नहीं है । क्यों कि भारतमें इनकी संख्या और जातियां भी बहुत हैं । ऋग्वेदमें नाग और सर्पका उल्लेख है । किंतु नाग-पूजाका नहीं । यजुर्वेद और अथर्वण वेदमें नागपूजाका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उल्लेख है । पौराणिक कालके शिव और विष्णु दोनों महान देवताओंके साथ सर्प या नाग जुड़ गया है । काली भी नाग-भूषण है । बौद्ध या जैनोंने भी नागका महत्व गाया है । भारतीय लोक साहित्य-सभी भाषाओंका-नाग-कथाओंसे भरा पड़ा है । इन कथाओंमें अनेक प्रकारके श्रद्धा-संकेत हैं । इसमें एक महान संकेत “पूर्वजोंके आत्मा नाग रूपसे अपने परिवारमें आते हैं और गर्भधारण होनेपर उसमें प्रवेश करते हैं !” इसलिये घरमें आया हुआ साप नहीं मारा जाता ! नागोंकी कथाओंसे-भली और बुरी-पुराण साहित्य भरा पड़ा है । इनमें वासुकी और अनंत— वासुकी—सर्पोंका अधिपति । इसकी पत्नी शतशीर्षा । जनमेजयके यज्ञमें इसके पंद्रह पुत्र नष्ट हो गये हैं । यह शंकरके गलेमें भूषण बना रहता है । यह मणिधर है । अनंत—इसको आदि-नाग भी कहते हैं । आदि शेष भी कहते हैं । यह विष्णुकी शैय्या है । विष्णुको अनंतशयन भी कहा गया है जो शेषशायी है । लक्ष्मण, बलराम, तथा संकर्षणको इसका अवतार माना है । गीता अ० १०. श्लो २९-मैं हूं वरुण पानीमें— जलके कारण मनुष्य पर होनेवाले अनुकूल प्रतिकूल परिणामोंके कारण जलदेवताकी कल्पना की गयी है । साथ ही साथ जल पंच महाभूतोंमें पृथ्वी पर रहनेवाला भूत है । मनुष्यके लिये जीवन है । बिना इसके जीना असंभव है । अर्थात् जल-पूजन एक कृतज्ञता है । बृहदारण्यक उपनिषदमें “जल सभी वस्तु मात्रका मूल उत्पत्ति साधन” होनेकी बात कही है । इसलिये जलमें भी देवताओंका वास माना जाना स्वाभाविक है । जल रूपी ये देवता भिन्न भिन्न हैं । इनमें अप्सरा निम्नश्रेणी देवता है । ये सदैव जलक्रीडा करती रहती हैं । ये सात प्रकारकी हैं । इनको सप्त मातृका भी कहा गया है । गुजरातमें ये सप्तमाता मानी जाती हैं तो दक्षिणमें सप्त भगिनी मानी जाती हैं । अर्थात् जलचरमें जलमें रहनेवाले जीव जंतु मत्स्यी कूर्मी कर्कटी दुर्दुरी, जतुपी, मकरी आदि नामोंसे अप्सराओंके नाम बने हैं । अर्थात् इन देवता ओंमें— ६५ परिशिष्ट ३

वरुण—पश्चिम दिशाका, जलका, पाताल, नागलोकका स्वामी । वारुणी और गौरी इसकी पत्नियां। सुनाभ इसका मंत्री । (१) गो, (२) बछ (३) सुरा (४) अधर्म (५) पुष्कर (६) वंदिष्ट ये इसके पुत्र हैं। देवोंने इसको जलाधिपत्यका अभिषेक किया था। अर्जुनको इसने अस्त्र दिया था। गीता अ० १०, श्लो० २९-पितरोंमें अर्यमा हूं— पितर—एक देव सदृश योनि है। पितर दो प्रकारके हैं। जो मनुष्य मरनेके बाद पितृ-लोक जाते हैं वे मृत-पितर, और सृष्टिके प्रारंभसे ही जो पितृलोकमें रहते हैं वे अमृत पितर । वैदिक आर्योने यमको आदि पितर माना है। पिता देवोंसे भी आद्य है। ऋग्वेदमें भी पितरोंके विषयमें पर्याप्त जानकारी है। "सोम-प्रिय पितर, निम्नलोक मध्य लोक, तथा उच्चलोकमें वास करने वाले आत्म-सामर्थ्य प्राप्त होने परभी सौम्य, सात्विक, " ऐसे उनका वर्णन है। साथ ही साथ "हमारे पुकारते ही आकर हमारी रक्षा करते हैं।" ऐसा अनुभव भी कहा गया है। स्थान स्थान पर उनका आवाहन भी है। ब्रह्माने देवोंको उत्पन्न करके उन्हें यज्ञ करनेको कहा। देवोंने यह नहीं माना। ब्रह्मदेवने कहा 'तुम मूढ बनोगे !” देव मूढ बने । लोगोंका नाश होने लगा। देव तब ब्रह्मदेवके पास गये । ब्रह्मदेवने उन्हे अपने पुत्रोंसे प्रायश्चित्त पूछनेको कहा। देवोंने अपने पुत्रोंसे प्रायश्चित्त पूंछा। पुत्रोंने प्रायश्चित्त कहा। देवोंने प्रसन्न होकर कहा "हमें ऐसा बोध करनेवाले आप पितर हैं।" तबसे देव "पितर पुत्र" कहे जाने लगे और देव भी स्वर्गमें पितरोंकी उपासना करने लगे। सभी समाजमें भिन्न भिन्न प्रकारसे पितृ-पूजा विद्यमान है। पितृ-पूजा विश्वके सभी धर्मोंका आवश्यक अंग है। भारतीय समाजमें नित्य-पितृ-तर्पणका भी नियम है। वार्षिक पितृश्राद्ध किया जाता है। पितृपूजाके अनेक प्रकार हैं। क्षेत्रों में जाकर पिंडदान करना भी पितृ-पूजाका एक प्रकार है। यह सब मृत-पितरोंके लिये है। प्रत्येक महिनेकी अमावस्या पितरोंका दिवस माना गया है। चार दिशाओंमें चार पितृगण हैं। (१) पूर्व-अग्निष्वात्त (२) दक्षिणबर्हिषद (३) पश्चिम-आज्यप (४) उत्तर सोमप। कहीं कहीं सात गण कहे गये हैं जिनका अपना लोक है। “मानव पिता अपनी तपस्यासे देव पितरोंका स्थान प्राप्त कर सकते हैं। देव-पिता अपनी योग-साधनासे सनकादिक बनते हैं" ऐसे कहा गया है। इन पितरोंमें— अर्यमा—ऋग्वेदमें अर्यमा एक देवता है। बारह आदित्योंमें वैशाख मासका आदित्य है। इसीको पितृगणका एक कहा गया है। इसके ३०० किरण हैं। केवल महाभारतमें अत्रि-पुत्र होनेकी बात कही गयी है। घर बांधते समय इसकी पूजा करनेका प्रथान था। इसके दक्षिणमें पितृयान मार्ग होनेकी बात भी देखनेको मिलती है। भागवत पुराणमें कहा गया है कि जब पृथुने पृथ्‍वीका दोहन किया तब पितरोंने इसे वत्स बनाया था। गीता अ० १०, श्लो० २९-शासकोंमें यम हूं मैं— शासन करनेवाले शासक। राज्यकर्ताको शासक कहा जाता है। न्यायान्यायका विचार करके समाजको अनुशासनमें रखना जिससे समाज अभ्युदय और निःश्रेयसकी साधना कर ६६ ज्ञानेश्वरी

सके प्रत्येक शासकका कर्तव्य है । साथ ही साथ "सबल दुर्बल पर अन्याय नहीं कर सके" तथा "समाजका दुर्बलतम मनुष्य भी अन्याय करनेवाले सबलसे सबल व्यक्तिका 'हाथ पकड़ कर' अन्यायका कारण पूछ सके" ऐसी व्यवस्था कायम करना शासनका एकमेव पवित्र कर्तव्य है । इसी एक उद्देशसे प्राचीन कालमें अनेक प्रकारके शासन प्रणालियोंकी स्थापना होकर "अपने उद्देशमें असफल होनेसे" ऐसी शासन प्रणालियोंको समाप्त किया गया है । महाभारत और बृहदारण्यकमें "धर्मानुशासन" का इतिहास कहते हुए लिखा गया है- सबसे प्रथम समाजमें ब्रह्म विद्यमान था । विद्वानोंने इसका अर्थ करते समय लिखा है कि तब एकाकार समाज था यहां "राजा या प्रजा," अथवा "शासक या शासित" ऐसा द्वैत नहीं था सब समान थे । श्रेष्ठ कनिष्ठ भाव नहीं था । उस समाजमें स्तवन तथा यशकी महिमा थी । तब ब्रह्मके सामर्थ्यकी कमीके कारण-एकताकी कमीके कारण-समाज विकास रुक गया । तब उच्च स्वरूपके समाज की कल्पना करके "श्रेयोरूप क्षात्र" का निर्माण किया गया । श्रेयोरूप क्षात्रतंत्र राजशासन था जो सेना-प्रधान था । तब ब्राह्मण भी यज्ञमें क्षत्रियोंके नीचे बैठ कर उपासना करते थे । क्षत्रिय ही ब्राह्मणोंका यश स्थापन करते थे । क्षत्रियकी सहायतासे ब्राह्मण अपने कार्य यशस्वी करते थे । किंतु इससे समाज वैभव-संपन्न नहीं हो पाया । इससे वैश्य-शासनतंत्र निर्माण किया गया । यह वैश्यतंत्र संभवतः पूंजीशाही तंत्र रहा हो । इससे भी समाज सुखी और वैभव-संपन्न नहीं हुआ तब सबका पोषक शूद्र निर्माण किया । क्या यह शूद्र-तंत्र श्रमिक-शासन-तंत्र था ? इससे भी समाज वैभवसंपन्न नहीं हो पाया । तब सर्व मंगलकारक धर्मानुशासनका निर्माण किया जिससे "दुर्बलसे दुर्बल व्यक्ति भी अपनेपर होनेवाले अन्यायके विरुद्ध सबलसे सबल व्यक्तिका हाथ पकड़कर पूछ सके ।" इन अनेक प्रकारके शासन तंत्रमें इंद्र, सोम, वरुण, रुद्र, वसु, आदित्य, रुद्र, पूषा, यम आदिका नाम आया है । इनका अर्थ करते समय उपनिषदके चिंतनशील विद्वानोंने क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रादि गणोंका द्योतक होनेकी बात कही है । और धर्म-शासनमें यम सब प्रकारके न्याय अन्यायका विचारक है । यम—विवस्वानका पुत्र । माताका नाम संज्ञा । ऋग्वेदमें अपनी जुड़वी बहन यमीसे इसकी नीति विषयक चर्चा हुई है । इसको पहला मानव कहा गया है । इसको राजा भी कहा गया है । यमको देवता भी कहा गया है । अष्ट दिक्पालोंमें यह दक्षिण दिशाका स्वामी है । इसका स्थान, तीन द्युलोकोंमें सर्वोच्च है । इसको ब्रह्माने पितरोंका स्वामित्व और विश्वके पाप-पुण्य पर देख-भाल रखनेका काम दिया । मांडव्यके शापसे इसने शूद्रयोनीमें-विदुरके रूपमें-जन्म लिया था । युधिष्ठिर यमका मानसपुत्र माना जाता है । इसने नचिकेताको ज्ञान दिया । गौतमको माता पिताके ऋणसे मुक्त होनेका मार्ग बताया । यम और इसके दूतोंमें जो संवाद हुआ उसको यमगीता कहते हैं । यमके नामसे ( १ ) यम संहिता ( २ ) यमस्मृति ये दो ग्रंथ उपलब्ध हैं जो शासन ग्रंथ हैं । यमने अर्जुनको अस्त्र दिया । सावित्रीको उसका पति सत्यवान लौटा दिया । ३७ परिशिष्ट ३

याज्ञवल्क्य ऋषिने जिन धर्मशास्त्रकारोंके नाम लिये हैं उनमें यमका नाम है। वसिष्ठ धर्म- सूत्रमें यमके कुछ श्लोक हैं। प्राचीन पोथियोंमें स्थान स्थान नीति, धर्म, व्यवहार, अध्यात्म आदि विषय पर इसके श्लोक मिलते हैं। यह न्यायका देवता है। गीता अ० १०, श्लो० ३०-मैं हूं प्रल्हाद दैत्योंमें- दैत्य-कश्यपसे जो दितिमें उत्पन्न हुए वे। ये सदैव देवोंके शत्रु रहे हैं। उन्हें दैत्य कहा जाता है। देवोंसे इनका युद्ध होता रहा है। प्राचीन साहित्यमें स्थान स्थान पर दैत्योंका उल्लेख आया है। अमृत प्राप्तिके लिये देव और दैत्योंने समुद्र मंथन किया था। उस समुद्र मंथनमेंसे जो अप्सरा, वारुणी, सुरा उत्पन्न हुईं वह दैत्योंने ले लिया। दैत्य सदैव यज्ञ विध्वंसक रहे हैं। संभवतः दैत्य और दानव भिन्न हैं। आगे चल कर इनमें भेद नहीं रहा होगा। क्यों कि दनुको दानवकी माता कहा गया है। फिर भी विद्वानोंका मत है ये समानार्थी हैं। प्रल्हाद-हिरण्यकश्यपु और कयाधूका पुत्र । देवासुर युद्धके निमित्त वेदमें भी प्रल्हादका नाम आता है। यह महान विष्णुभक्त था और इनका पिता विष्णुद्वेष्टा । बापते पुत्रको बहुतेरा समझाया किंतु यह नहीं माना। इसको कठोर दंड दिया जाने लगा। इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। यह मरनेके लिये भी तैयार हुआ किंतु विष्णु भक्ति छोड़नेके लिये नहीं। एक बार हिरण्य- कश्यपूने पूछा तुम्हारा विष्णु कहां है ? सर्वत्र । इस खंभेमें भी ? हां इसमें भी। गदासे खंभा तोड़ दिया गया। नरसिंह प्रकट हुए। नरसिंहने हिरण्यकश्यपूका वध किया। तब प्रल्हादनेही सभी दैत्योंका सांत्वन किया। नरसिंहने वर मांगनेको कहा तब इसने "विष्णुभक्तिके बिना और कुछ भी नहीं चाहता।" कहते हुए भक्तिका ही वर मांगा। विष्णुने तब "प्रल्हादका यह अंतिम जन्म है। यह मोक्षके लिये तैयार हुआ है!" ऐसा कहा है। स्वयं विष्णुने इसको ज्ञान दिया। गीता अ० १०, श्लो० ३०-काल हूं गणितज्ञमें- गणक-गिननेवाला, शुभाशुभ बनानेवाला, जीवन गिननेवाला, यह गणना, अतीत वर्तमान व भविष्यके रूपमें की गयी है। यही-काल है। यह आयुष्य निगलता जाता है। गिन गिन कर निगलता है। हमारे प्राचीन ऋषियोंने इस गिननेको भी गिना। उन्होंने मनुष्य, पितर, देव, और ब्रह्म ऐसे चार प्रकारके दिन और रातकी कल्पना की और फिर एक सूची तैयार की। १५ स्वेदयान - १ लोमगतं १५ प्राण - १ इदम् : १५ लोमगतं - १ निमिष. १५ इदम् - १ एतर्हि : १५ निमिष - १ अन १५ एतर्हि - १ क्षिप्र : १५ अन - १ प्राण १५ क्षिप्र - १ मुहूर्त्त ३० मुहूर्त्त - १ अहोरात्र इसके बाद वार, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर, युग, कल्प आदि। इसके अलावा और एक गणना है सो सूर्य पर आधारित है। ज्ञानेश्वरी ३६

२ परमाणु - १ अणु १५ काष्ठा - १ लघु ३ ऋतु - १ अयन ३ अणु - १ त्रसरेणु १५ लघु - १ नाडिका २ अयन - १ वर्ष ५ - वर्ष - १ युग. ३ त्रसरेणु - १ त्रुटि २ नाडिका- १ मुहूर्त ब्रह्माका १ दिन - १४ मनुका काल खंड. १०० त्रुटि - १ वेधस् ७ नाडिका- १ प्रहर या याम ब्रह्माकी १ एकरात-प्रलयका कालखंड. ३ वेधस् - १ लव ४ याम - १ दिवस या रात्र. ३ लव - १ निमिष १५ दिवस और रात्र - १ पक्ष ३ निमिष-१ क्षण २ पक्ष - १ मास--या पितरोंका एक दिवस. ५ क्षण - १ काष्ठा २ मास- १ ऋतु. हमारे दर्शन कारोंने इस कालके विषयमें खूब विचार कर भी यह समस्या ही रहा है। विश्वकी अनेक गूढ समस्याओंमें काल एक गूढ तम समस्या है । इसलिये इसको साक्षात् परमेश्वर भी कहा गया है । विश्वके परमाणुसे ब्रह्मांड तक सब कुछ उसी पर आश्रित है। अमूर्त होकर भी वह सर्वव्यापी है। उसके पार किसी वस्तुके अस्तित्त्वकी कल्पना नहीं की जा सकती । प्राणिमात्र पर उसकी जो कृपा होती है वही आयुष्य है । पतंलीने इसको नित्य और विश्वका आधार माना है यद्यपि बौद्धोंने कालका अस्तित्व ही नहीं माना ! इसलिये इस पर लिखते आना कालापहरण है ! गीता अ० १०, श्लो० ३०-मृगोंमें मैं मृगराज- मृगोंको पशु भी कहा जाता है। विशेषतः न जानते हुए या आकलन न करते हुए देखते रहना यह पशु शब्दका अर्थ है । अति प्राचीन कालमें भी इन पशुओंके स्वभाव इनके शुभाशुभ लक्षण, स्वभावानुसार इनका विभाजन, इनका उपयोग, इनके रोग, उसकी चिकित्सा आदि पर अनेक ग्रंथ लिखे गये हैं। उनमेंसे कुछ आज भी उपलब्ध हैं। इनमेंसे कुछ संस्कृत ग्रंथोंका फारसीमें अनुवाद भी हुवा है। ऋग्वेद पूर्वकालसे भारतमें पशुपालन चलता आया है। सिंधुसंस्कृतिमें भी गाय, भैंस, कुत्ता, बकरे, मेड, हाथी, सूवर, गधा, ऊंट ये पालतू जानवर थे ऐसी विद्वानोंकी मान्यता है। इन सबमें गाय पर विशेष भक्ति थी । उसको खूब खिलाते थे, तीन तीन बार दुहते थे, ऐसे विद्वानोंकी मान्यता है । ऋग्वेद कालमें भी खेतीके साथ गोपालन चलता था। गाय, बैल, घोडे, बकरा, मेड, कुत्ता, ये सब आश्रमवासी भी थे । उपनिषत्कालमें आश्रमके शिष्य गायोंको चराने ले जाते थे। इस समय प्रत्येक घरके साथ कुछ पशु होते थे। कौटिल्य कालमें इन सब जानवरोंको अलग अलग पाळा जाता था और उन पर देखभाल करनेवाले प्रमुख अधिकारीको अश्वाध्यक्ष गजाध्यक्ष, गो-अध्यक्ष आदि कहा जाता था । राजकुमार भी इस विभागके अध्यक्ष होते थे। पांचवा पांडव सहदेव गो-विद्याका पंडित था तो नकुल अश्व विद्याका । बिराटके घर इन्हें यही काम मिला था! कौटिल्यके समयमें यह लाभकारी व्यवसाय भी था। इसके चमडा, चरबी, स्नायू, सींग, दांत, हड्डी, आदिका उपयोग होता था । ६९ परिशिष्ट ३

ऐसे समय इस विषयमें अनेक ग्रंथ लिखे जाय तो कोई आश्चर्य नहीं। इन पशुओंम ग्राम्य, आरण्य, तथा व्योम ऐसे तीन विभाग हैं। आकाशमें उड़नेवाले पक्षी। पशुओंमें पालतु और जंगली। अथर्ववेदमें जंगली पशुओंको भयंकर कहा है। पानीके प्राणियोंको शिशुमार कहा है। इस प्रकार वहां पांच विभाग हैं। मृगेंद्र-सिंह-पंडित हंसदेवने मृगपक्षी शास्त्र नामका एक ग्रंथ लिखा है। उसमें उन्होंने सिंहके मृगेंद्र, पंचाक्ष, हर्यक्ष, केसरी, हरी, और सिंह ऐसे छः प्रकार दिये हैं। साथ साथ इनके वैशिष्ट्य दिखाये हैं। इसमें सिंहकी दुम लंबी होती है। शरीर फूर्तिला होता है। भूखके समय ये क्रूर होते हैं। इसका रंग सोनेरी होता है। ये अत्यंत वेगसे चलता है। प्रसन्नतामें रहता है तब दुम हिलता रहता है! गीता अ० १०. श्लो० ३०-पक्षियोंमें खगेंद्र हूं— पक्षी—भारतके प्राचीन ग्रंथोंमें पक्षियोंके विषयमें भी पर्याप्त जानकारी मिलती है। दूर दूर संदेश पहुंचानेके लिये भी पक्षी पाले जाते थे । कोशल राजाके घर संदेश वाहक एक मैना थी । कौटिल्य अर्थशास्त्रमें संदेश वाहक कबूतरोंका उल्लेख है । पुराणोंमें भी ऐसे अनेक उल्लेख हैं कि पक्षियोंसे संदेश भेजनेका काम लिया गया । पालतू पक्षियोंमें शुक, मैना, मोर, चकवा, अधिक तर देखनेको मिलते हैं किंतु राज प्रासादोंमें मुरगा, क्रौंच, कपिंजल, वार्तिक, चकोर, चक्रवाक, हंस, कोयल, कादंब, आदि पक्षी पालते थे। इन पक्षि- योंके विषयमें संस्कृत साहित्यमें अनेक प्रकारके संकेत हैं। इनकी स्वतंत्र भाषा है। इनकी भाषा जाननेवाले विशिष्ट लोग भी हैं। प्राचीन भारतीय साहित्यमें पक्षियोंका संभाषण सुनकर, उनसे आवश्यक जानकारी पाकर किये गये महान कामके उल्लेख पर्याप्त हैं। इनका और देवोंका संपर्क भी है। कौवोंको अन्न डाला तो वह पितरोंको मिलता है। कौये प्राचीन ऋषि हैं। मोर सरस्वतीका वाहन है। हंस और लक्ष्मीका संबंध है। कहीं कहीं उलु लक्ष्मीका वाहन माना जाता है। गरुड—विष्णुका वाहन है। यह कश्यप-विनताका पुत्र, अरुणका छोटा भाई । वालखिल्य ऋषियोंके पुण्यसे गरुड पैदा हुआ था। पैदा होते ही वह उड़ने लगा। इसके उड़नेसे ही इसको पक्षियोंका इंद्र मान कर वालखिल्योंने इसका अभिषेक किया। उड़ते समय इसका इतना प्रखर ताप था कि सारा विश्व अकुला उठा। इससे इसको लोग अग्नि समझने लगे। तब इसने अपने तेजका संकोच किया। इसकी मां विनता सौतकी दासी थी। इससे वह दुःखी थी। इसके सवतेले भाई साप भी इसे दासी-पुत्र मानकर जो चाहे सो फर्माते थे। एक बार यह अपने सवतेले भाई सापोंको लेकर इतना ऊंचा उड़ा कि बेचारे सूर्य तापसे जल भुनकर नीचे पडे ! अपनी माताके दास्यका कारण और उससे मुक्तताका उपाय जानकर यह इंद्रसे लड़कर अमृत जीतकर ले आया और मां को दास मुक्त किया। संपूर्ण अमृतकुंभ पास रह कर भी इसने एक बूंद भी अमृत नहीं पिया। यह देखकर विष्णुने प्रसन्न होकर इससे वर मांगनेको कहा तब इसने "बिना अमृतके ही अमर" बननेका वर मांग कर विष्णुसे कहा "अब तुम भी कोई वर मांग लो !" तो विष्णुने "अपना वाहन बननेका वर मांगा !" ऐसे यह विष्णुका वाहन बना। ज्ञानेश्वरी ७०

गीता अ० १०, श्लो० ३१-वायु मैं वेगवानों में- सारा विश्व गतिशील है। विश्वकी प्रत्येक वस्तु ग्रह नक्षत्रादि सभी गतिशील है। इसकी गति भी तीव्र है। मनुष्य इसकी कल्पना नहीं कर सकता। जैसे शब्दकी गति, प्रकाशकी गति आदि, किंतु इन सबमें वायुकी गति अत्यंत तीव्र मानी गयी है। मरुद्गणोंका विचार करते समय अवकाशमें जो वायुकी गति है उसका उल्लेख होता है। तब कहा जाता है कि इससे विश्व हिलता है। अब तक इस गतिका अंकन नहीं किया गया है। गीता अ० १०, श्लो० ३१-राम मैं शस्त्र वीरोंमें- राम—पिताका नाम दशरथ। माता कौसल्या। भाई लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न। राम सबसे बडा लड़का। यह धनुर्वेदका पंडित था। विश्वामित्र इसका शस्त्र-गुरु। रामने बचपनमें ही ताटकाका वध किया। सुबाहुको मारा और मारीचको अपने बाणाग्रसे उडा दिया। जनक नंदिनी सीता इसकी पत्नी। सीताको रामने स्वयंवरमें जीता। शिवधनुपर प्रत्यंचा चढाना सीता स्वयंवरका दांव था और रामने हजारों राजाओंके सम्मुख प्रत्यंचा चढानेके लिये जब शिव-धनुष्य झुकाया तब धनुष्य टूट गया !! राजा दशरथने अपना बुढापा जानकर रामको युवराज्याभिषेक करना निश्चय किया। किंतु दशरथकी सबसे छोटी रानी कैकयीको यह अच्छा नहीं लगा। उसने दशरथको अपने पूर्व वचनका स्मरण दिलाकर भरतको योवराज्य और रामको चौदह वर्ष वनवास भेजनेकी मांग की। इससे पित्राज्ञासे राम, सीता और बंधु लक्ष्मणके साथ चौदह वर्षके लिये वनवास गया। दशरथ, रामके वनवास जानेका दुःख नहीं सह सका। वह राम राम कहता स्वर्ग सिधास। वनवासके लिये राम दक्षिणकी ओर चला। रामके साथ ही रहनेका लक्ष्मणका दृढ निश्चय था। वह भी रामके साथ रहा, एक आज्ञाधारक सेवककी भांति। किंतु वहां भरतने राज्य लेनेसे अस्वीकार कर दिया। भरत अयोध्याके कुछ प्रमुख लोगोंको साथ लेकर रामको अयोध्या लौटा ले आनेके लिये आया। तब राम चित्रकूटमें था। चित्रकूटमें सब मिले। भरतने अपनी मांग सामने रखी। राम दृढ था। चौदह वर्ष वनवासका उसका निश्चय दृढ था। भरतने रामकी पादुकाएँ लीं। रामके प्रतिनिधिके रूपमें चौदह वर्ष तक अयोध्याका राज्य देखनेका स्वीकार करके भरत अयोध्या आया। राम दक्षिणकी ओर चला। चलते चलते वह ऋषि-मुनियोंसे मिलता। उनसे ज्ञान लेता। उनका सुख दुःख सुनता और आगे बढ़ता। ऐसे चलते चलते दस वर्ष बीते। यह पंचवटी आया। वहां जटायू पक्षी मिला। कुछ दिन राम पंचवटीमें रहा। लक्ष्मणने वहां शूर्पनखाके नाक कान काटे। शूर्पनखासे सब बात सुनकर रावणने मारीचकी सहायतासे सीता हरण किया। बीचमें जटायूने रावणको रोका। जटायूका वध करके रावण सीताको लेकर चला। जटायूसे सीता हरणकी बात जानकर राम लक्ष्मण दक्षिणकी ओर चले। किष्किंधामें हनुमान और सुग्रीवका संपर्क हुआ। अग्नि साक्षीसे राम सुग्रीवकी मित्रता हुई। अपने बडे भाईके डरसे सुग्रीव राज्य छोड़कर ऋष्यमूक पर्वत पर रहता था। रामने वालीवधकी प्रतिज्ञा कर वालीको ७१ परिशिष्ट ३

मारा। उसके बाद सीता शोध हुवा। हनुमानने सीता-शोध किया। यह अशोक-वनमें सीतासे मिलकर उससे चूडामणि ले आया। राम लंका पर चढ़ायी करने आगे बढा। हनुमानके सीतासे मिलकर जानेके बाद रावण-सभामें बडी गडबड हुई। रावणके भाई बिभीषणने “सीताको रामके पास पहुंचा देनेकी मांग की!” यह रावणके विरुद्ध था। रावणने उसका धिःकार किया। इससे बिभीषण अपने चार प्रधान--अनल, पनस, संपाति और प्रमति--के साथ रामकी शरण आया। क्यों कि वालीवधसे बिभीषण समझ चुका था वीरतामें राम रावणसे श्रेष्ठ है और उसके साथ समग्र वानर-सेना है। रामने हनुमान सुग्रीवादिकी सलाहसे बिभीषणको अभय दिया। बिभीषणने भी रावण-वधमें सहायता करनेका आश्वासन दिया। वहां रावण सुग्रीवको रामसे अलग करनेका संधान कर असफल रहा। इसके बाद रामने नीलको समुद्र पर सेतु बांधनेकी आज्ञा दी। नीलने लाखो वानरोंकी सहायतासे चौदह, बीस, इकबीस, बाईस, तेईस इस क्रमसे पांच दिनमें सौ'योजनका सेतु बांधा। रामने अपनी सेनाके साथ लंकामें जा छावनी डाली। रामने सुवेल पर्वतसे लंकाका अवलोकन करके सैन्य रचना की। युद्धकी पूरी व्यूह-रचना होनेके बाद नियमानुसार रामने संघामके लिये अंगदको रावणके पास भेजा। अंगदने रावणको बहुतेरे समझाया। कोई उपयोग नहीं हुवा। रावणने अंगदको पकड़नेकी आज्ञा दी। अंगद राक्षसोंको गिराकर वहांसे चला आया। आते समय यह रावणके प्रासादका शिखर-कलश-गिराकर आया! रामने युद्धकी घोषणा की। माघ-शुद्ध द्वितीयाको इस युद्धका प्रारंभ हुवा और चैत्र शुद्ध १२ (या चै. व. १४) रावण वध हुवा। चै. व. ३० को रावणका प्रेत संस्कार हुवा। इस युद्धमें रावणके साथ उसके भाई कुंभकर्ण, पुत्र मेघनाद, अतिकाय, मामा प्रहस्त भतीजे कुंभ-निकुंभ, आदि सारा परिवार--बिभीषणको छोडकर--नष्ट हुवा। सीता ११ महीने १४ दिन रावणकी बंदी बनकर अशोकवनमें रही। विवाहके समय राम पंद्रह वर्षका था और सीता छ वर्षकी। जब रामका राज्याभिषेक हुवा तब राम ४२ वर्षका था। और सीता ३३ वर्षकी। स्कंदपुराणमें सारी रामकथा तिथि वारके साथ है किंतु विद्वानोंका कहना है यह वाल्मिकी रामायणसे मेल नहीं पाता। राम रावण युद्ध और रामके विषयमें अलग अलग पुराणोंमें अलग अलग बातें कही गयी हैं! गीता अ० १०, श्लो० ३१- मत्स्योंमें मैं बना नक्र— इसके विषयमें कोई कहने जैसी जानकारी नहीं मिली। गीता अ० १०, श्लो० ३१--नदियोंमें गंगा नदी— प्राचीन पोथियोंमें पर्वतसे उगम होकर समुद्रसे मिलनेवाले ऐसे जल-प्रवाहको, -जिसकी लंबाई आठ हजार धनु सामान्यतया १६००० मीटरसे अधिक है-नदी कहा गया है। इससे कम लंबाईवाले जल-प्रवाह "गर्त” कहे गये हैं। भारतीय ग्रंथोंमें नदी-प्रवाहोंको पवित्र माना है। ऋग्वेदमें आपोदेवता-जलदेवता-हमारा कल्याण करें, हमें पवित्र करें ऐसी प्रार्थना है। ऋग्वेदमें नदी सूक्त भी है। इस नदी सूक्तमें गंगा, यमुना, सरस्वती, शुतुद्री, विपाशा, वरुणी, असिकीती, महदूधा, वितस्ता, आर्जोकिया, ज्ञानेश्वरी ७२

सुषोमा, त्रिसामा, सुसर्तु, श्वेती, सिंधु, कुभा, गोमती, क्रमू, मेहरु इन अठारह नदियोंका उल्लेख है। ऋग्वेदकी पवित्रतम नदी गंगा नहीं सरस्वती है। महान माता, महान नदी महान देवी भादि कहकर इस नदीका वर्णन किया गया है। पुराणकालमें सरस्वतीका स्थान गंगाने लेलिया । भारतकी सभी नदियोंकी उत्पत्ति कथा है। उसके स्नानका फल कहा गया है। नदी किनारे पर बसे कई गांव, शहर, घाट, मंदिर आदिका वैशिष्ट्य कहा गया है। महाभारतमें अष्टकुल-पर्वतोंसे उद्गम होकर बहनेवाली निम्न लिखी नदियोंका उल्लेख है । हिमाचल पर्वतसे—(१) गंगा (२) सरस्वती (३) सिंधु (४) चंद्रभागा- चिनाब (५) यमुना (६) शुतुद्री-सतलज (७) वितस्ता-झेलम (८) इरावती-रावी (९) कुहू-काबुल (१०) गोमती (११) विपाशा-वियास (१२) देविका-दीग-(१३) शरयू- गोम्रा-(१४) क्षू-रामगंगा-(१५) गंडकी (१६) कौशिका-कोसी-(१७) निश्रा (१८) लोहित्या-ब्रह्मपुत्रा- । (२) परियात्र पर्वत श्रेणीसे—(१) वेदस्मृति-बनास-(२) वेदनती-बेरछ- (३) वृत्रघ्नी-अंनर्गत-(४) सिंधू-कालीसंध-(५) वेण्या, या वर्णाशा, नंदिनी या चंदना- साबरमती-(६) सदानीरा या सतिरापारा-पार्वती-(७) चर्मण्वती या धन्वती-चंबल-(८) तूपी या रूपा या सूर्या-गंभीर-(९) विदिशा-बेस-(१०) वेत्रवती-बेध्वा-(११) क्षिप्रा । (३) ऋक्ष पर्वत श्रेणीसे—(१) मंदाकिनी-(२) दशार्णा-धसान-(३) चित्रकूटा- (४) तमसा-(५) पिप्पलश्रोणी-पैसुनी-(६) पिशाचिक-(७) करमोदा-कर्मनासा-(८) चित्रोत्पला-(९) विपाशा-नेवास-(१०) मंजुला-(११) बालुवाहिनी-बघैन-(१२) सुमेरुजा- सोनरवीरमा-(१३) शुक्तिमती-(१४) शकुला-सक्री-(१५) विदिवा-(१६) क्रमु । (४) विंध्य पर्वत श्रेणीसे—(१) क्षिप्रा-(२) पयोष्णी-(३) निर्विंध्या-नेबुज-(४) तापी-(५) निबन्धा-सिंध-(६) वेणा-वैणगंगा-(७) वैतरी-(८) शितीबाहू-(९) कुमुद्वती- स्वर्णरेखा-(१०) तोया-ब्राह्मणी-(११) महागौरी-दामोदर-(१२) पूर्णा-(१३) शोणसोन- (१४) महानदी-(१५) नर्मदा । (५) सह्याद्रि पर्वत श्रेणीसे—(१) गोदावरी-(२) भीमा-(३) कृष्णा-(४) वेणा-(५) तुंगभद्रा-(६) सुप्रयोगा-हगरी-(७) वरदा-(८) कावेरी-(९) मंजुला । (६) मलय पर्वत श्रेणीसे—(१) कृतमाला-ऋतुमाला-(२) ताम्रपर्णी-(३) पुष्पजा-(४) सत्पलावती-पेरिय । (७) महेंद्र पर्वत श्रेणीसे—(१) पित्रसोमा-(२) ऋषिकुल्या-(३) इक्षुका-(४) त्रिदिवा या वेगवती-(५) लांगुलिनी-(६) वंशकरा । (८) शुक्तिमत पर्वत श्रेणीसे—(१) ऋषिका-(२) कुमारी-सुकतेल-(३) मंदगा- (४) मंदवाहिनी-महानदी-(५) कृपा-(६) पलाशिती-(७) वामन । प्रत्येक प्रदेशमें इसके अतिरिक्त भी अन्य अनेक नदियां हैं। भारतीय साहित्यमें नदियोंके विषयमें जो आदर और श्रद्धा-भक्तिके साथ पावित्र्यका भाव दीखता है वह अपूर्व ही है। व्यासने नदीको "विश्व-माता" कहा तो रवींद्रनाथ ठाकुर : "ईश्वरकी करुणा" कहते हैं। व्याससे रवींद्र- ७६ परिशिष्ट ३ (6)