भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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अब ही क्या है हुआ ऐसा । आया यह तरस कैसा । अर्जुन यह विचित्र-सा । किया अनुचित ॥ २६ ॥ इस मोहसे ऐसा होगा । नाम जो था वह मिटेगा । परलोक साथ जायेगा । लौकिकके ॥ २७ ॥ शिथिलता ऐसी हृदयकी । कारण होगी जो अहितकी । जानो संग्राममें पतनकी । क्षत्रियोंके ॥ २८ ॥ ऐसा वह कृपावंत । सिखाता है जो सतत । सुन यह पांडुसुत । बोले ऐसा ॥ २९ ॥ अर्जुन उवाच कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन । इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हा वरिसूदन ॥ ४ ॥ अर्जुनका प्रत्युत्तर— देव सुनोजी इतना । कारण नहीं बोलना । अपनेमें ही सोचना । यह युद्ध है क्या ॥ ३० ॥ युद्ध नहीं यह अपराध । करना है कुलका उच्छेद । करना पडा यह प्रमाद । हमको यहां ॥ ३१ ॥ माता पिताका वंदन । देना उन्हे समाधान । छोड़ करना हनंन । उचित है क्या ॥ ३२ ॥ सन्त-वृंदका करे वंदन । हो सके तो करना पूजन । छोड़ सुनाना निंदा वचन । उचित है क्या ? ॥ ३३ ॥ हमारे कुल-गुरु ये ऐसे । वंदनीय हमें नियमसे । हमें पूज्य भीष्म द्रोण वैसे । सदा सर्वत्र ॥ ३४ ॥ जिनका वैर न करता है मन । स्वप्नमें भी यह असंभव जान । उनका करना प्रत्यक्ष हनन । कैसे देव ॥ ३५ ॥ रणमें मैं लडूं कैसे विरुद्ध भीष्म-द्रोणके कैसे मारूं इन्हे बाण हमें ये पूजनीय हैं ॥४॥ ३५ सांख्ययोग