ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसोचकर देख तू अर्जुन । किस करुणासे उदासीन । कहो अंधेरेमें कैसे भानु । ढका आज ॥ १३ ॥ डरता क्या मेघसे पवन । है क्या अमृतको भी मरण । निगलता आगको ईंधन । सोचले तू ॥ १४ ॥ या नमकसे क्या पानी पिघलेगा । अन्य स्पर्शसे कालकूट मरेगा । अथवा महाशेषको निगलेगा । मंडूक अल्प ॥ १५ ॥ सिंहसे भिडे क्या जंबूक । ऐसा हुवा क्या अलौकिक । दिखाया है सच कौतुक । तूने आज ॥ १६ ॥ इसलिये सुन अर्जुन । न होने दो चितको दीन । धैर्य दो मनको तत्क्षण । सावध होके ॥ १७ ॥ छोड़ दो यह अज्ञान । उठालो तीर कमान । रणमें किसका कौन । कारुण्य कैसे ॥ १८ ॥ तू है बड़ा जानकार । रणमें दया विचार । करना ऐसा अपार । उचित है क्या ॥ १९ ॥ इससे कीर्तिका नाश । परलोक अप भ्रंश । कहता जगन्निवास । अर्जुनसे ॥ २० ॥ इसीलिये शोक न कर । मनमें तू धीरज धर । तज दे तू पांडुकुमार । इस शोकको ॥ २१ ॥ तुझे नहीं यह उचित । इसमें अकीर्ति बहुत । अब भी तू अपना हित । सोचले ठीक ॥ २२ ॥ संग्राम समयमें ऐसे । करुणासे हित हो कैसे । आप्त हुये क्या ये अभीसे । कहो मुझे ॥ २३ ॥ पहलेसे क्या जानता नहीं । संग्राम है कुल-जनसे ही । करता है यह अ-कारण ही । शोक तू पार्थ ॥ २४ ॥ यह संघर्ष नहीं आजका । यह चला है जन्म कालका । आज ही क्यों ऐसा करुणाका । पुलक उठा ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी ३४