ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभगवान उवाच कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यम् अकीर्तिकरमर्जुन ॥ २ ॥ क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते । क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप ॥ ३ ॥ कृष्णका उपदेश— कहे हरि सोचलो तुम अर्जुन । शोक करने योग्य क्या यह स्थान । तूं कौन है क्यों आया है यह जान । औ' करता क्या है ? ॥ ६ ॥ तुझे हुआ क्या है ? । क्या न्यून आया है ? । औ' करना क्या है ? । खेद क्यों ? ॥ ७ ॥ कभी न सोचना तू असंगत । न छोड़ना कभी धैर्य उदात्त । भागे तुझसे अ-यशकी बात । कोसों दूर ॥ ८ ॥ तू है शौर्य-वृत्तिका स्थान । क्षत्रियोंमें अति महान । तेरी कीर्ति-कथाका गान । त्रिभुवनमें ॥ ९ ॥ तूने जीता रणमें शिवको । मिटाया निवात कवचोंको । तथा हराया है गंधर्वोंको । पराक्रमसे ॥ १० ॥ देखनेसे यह तेरे सम्मुख । दीखते हैं बौने ये तीनों लोक । ऐसा है पौरुषका लौकिक । अर्जुन तेरे ॥ ११ ॥ ऐसा तू इस स्थान पर । वीर-वृत्तिको छोड़कर । दीन-सा अधोमुख होकर । रोता रहा है ॥ १२ ॥ कैसे विषम वेलामें सूझा पाप यह तुझे । न सोहता बड़ोंको जो देता दुष्कीर्ति दुर्गति ॥ २ ॥ न हो निर्वीर्य तू पार्थ तुझे न शोभता यह । अपनी दुबली वृत्ति छोडके उठ तू अब ॥ ३ ॥ (3) ३३ सांख्ययोग