ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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२ सांख्य योग संजय उवाच तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । विषीदन्तमिदं वाक्यम् उवाच मधुसूदनः ॥ १ ॥ अर्जुनकी मनोदशा संजयने कहा राजासे । पार्थने साश्रु नयनसे । अति शोकाकुल होनेसे । किया रुदन ॥ १ ॥ स्वकुल देखकर समस्त । स्नेह उपजा अत्यद्भुत । उससे द्रवित हुवा चित्त । इस प्रकार ॥ २ ॥ जलमें घुलता जैसे नून । अथवा हिलता वातसे घन । ऐसे वह दृढ अन्तःकरण । हुवा द्रवित ॥ ३ ॥ मोहाधीन होनेसे वह ऐसा । दिखाया जैसा मुरझाया-सा । कीचमें फंसा हुआ-सा जैसा । राजहंस ॥ ४ ॥ इस भांति वह पांडुकुमार । महामोहमें हो अति जर्जर । खड़ा देख उसे श्रीशार्ंगधर । बोले ऐसा ॥ ५ ॥ संजयने कहा ऐसा जो करुणाग्रस्त अधीर अश्रु-पूरित । करता था जभी शोक उससे कृष्णने कहा ॥ १ ॥