भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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परिशिष्ट पांचवा अंतःकरण—करणका अर्थ है इंद्रिय । अर्थात् अंतःकरणका अर्थ अंदरका इंद्रिय ऐसा होता है । इंद्रियोंके दो प्रकार होते हैं । जैसे बाह्यचक्षु अंतरचक्षु । बाह्य इंद्रियां बाहरी विषयका ज्ञान करा देती हैं । प्रांपंचिक ज्ञानका साधन बनती हैं किंतु अंतर्विषयोंके ज्ञानका क्या साधन ? वह है अंतःकरण । इसी अंतःकरणके कारण सुख, दुःख, राग, द्वेष, आदिका ज्ञान होता है । यह अंतःकरण बाह्य इंद्रियोंको—ज्ञानेंद्रिय और कर्मेंद्रियोंको—नियंत्रित करता है । दार्शनिक दृष्टिसे यह अंतःकरण दर्पणकी भांति होता है अथवा जलाशयकी भांति होता है । जैसे स्वच्छ दर्पणमें किसीका स्पष्ट प्रतिबिंब पड़ता है, या तरंग रहित शांत जलाशयमें विश्व प्रतिबिंबित होता है वैसे शुद्ध निर्मल अंतःकरणमें ब्रह्म प्रतिबिंबित होता है । मन, बुद्धि, चित्त, और अहंकार मिलकर अंतःकरण होता है । संदेह, निश्चय, स्मरण और अभिमान इनके विषय हैं । अक्षर—न + क्षर = अक्षर । जिसका क्षय नहीं होता, जो नहीं घुलता, गलता, वह अक्षर है । अक्षरमें किसी प्रकारका विकार नहीं होता । परिवर्तन नहीं होता । वह नित्य है । सदैव एकसा रहता है । वह भावोंसे परे, गुणोंसे परे, अर्थात भावातीत= निर्भाव, गुणातीत= निर्गुण, आकारा- तीत= निराकार ऐसा है । वेदांतके मतसे यही परब्रह्म है । गीतामें भी अक्षर शब्द इसी अर्थमें आया है । ओंकार, वेदसार, ईश्वरवाचक नाम, इसी अर्थमें गीतामें यह शब्द आया है । अर्थात ज्ञानेश्वरीमें यह शब्द इसी अर्थमें लिया गया है । इसी अर्थका और एक शब्द अव्यय भी आया है । न + व्यय=अव्यय । अक्षौहिणीसेना—महाभारतयुद्धमें कुल अठारह अक्षौहिणी सेना थी । पांडवोंकी सात अक्षौहिणी सेना और कौरवोंकी ग्यारह अक्षौहिणी सेना । अक्षौहिणी इस सेना विभागमें २१८४० रथ, उतने ही हाथी, ६५६१० घोडे, तथा १०९३५० पादचारी सैनिक होत थे । प्रत्येक रथ, हाथी, तथा घोडेके साथ ५ पैदल सैनिक रहा करते थे । कुल मिलाकर एक अक्षौहिणी सेनामें २१८७०० सैनिक होते थे । जिसके आधीन यह सेना होती थी उसको अक्षौहिणीपति कहा जाता था । अज्ञान—अविद्याकी जो बात वही अज्ञानकी बात है । गीताके, ज्ञानेश्वरीके तेरहवे अध्यायमें–विस्तारपूर्वक इसके लक्षण कहे गये हैं । इसका लक्षण कहते समय " जो अनादि अनंत है, नित्य है उस पर परदा डालनेवाला तत्व अज्ञान है" ऐसे कहा गया है । गीतामें " आत्मज्ञान को ही नित्य कहा है । इस बोधको ज्ञान और उसके विपरीत सबको अज्ञान कहा है । " आत्मविषयक अज्ञानके कारण ही मनुष्य अपूर्णताका अनुभव करता है और अपूर्णताके अनुभवसे वह विषयोंके (8) १०५ परिशिष्ट ५