ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपीछे दौड़ता है। इस अज्ञानसे अविवेक, अविवेकसे अभिमान, और अभिमानसे राग-द्वेषादि द्वंद्व परंपरा प्रारंभ होती है। इसीसे कर्मचक्र और जन्म मरणका चक्र, चलता रहता है। ज्ञानसे अज्ञान नष्ट होता है। ज्ञान एक चिनगारी है जो अज्ञानका सारा कूड़ा जला कर राख कर देता है किंतु जब तक कूड़ा है तब तक आग जलती रहती है। जब तक अज्ञान है तब तक ज्ञान रहता है। जैसे कूड़ा जला कर आग स्वयं बुझ जाती है वैसे अज्ञानको नष्ट करके ज्ञान भी नष्ट हो जाता है। यही सहज स्थिति है। ज्ञानेश्वर महाराजकी दृष्टिसे ज्ञानाज्ञानसे परेकी अवस्था मुक्तावस्था है। सामान्य जीवन ज्ञानाज्ञानका कल्लोल है। सद्गुरु ज्ञान देता है अर्थात् कूड़ेके ढेर पर चिनगारी रखता है। इसीका नाम दीक्षा है। उस कूड़ेको जलाना साधना है। कूड़ेके साथ आगका भी बुझ जाना सिद्धि ! अद्वैत—जिसमें द्विधा-भाव नहीं वह अद्वैत है। जगद्गुरु श्रीआद्य शंकराचार्य इस अद्वैत दर्शनके आद्य आचार्य माने जाते हैं। "केवल ब्रह्म ही सत्य है और सारा असत्य है यही वेद उपनिषदादिमें कहा है" ऐसे आद्य शंकराचार्य कहते हैं। केवल ब्रह्म सत्य है। दीखनेवाला यह नामरूपात्मक जगत् मिथ्या है। जीव और ब्रह्म एक है। यह आद्य शंकराचार्यका सिद्धांत है। किंतु ज्ञानेश्वर महाराज दीखनेवाले नामरूपात्मक जगतको मिथ्या न मानकर ब्रह्मका स्फुरण मानते हैं यह स्फुरण सिद्धांत ज्ञानेश्वर महाराजका स्वतंत्र आविष्कार है। जैसे बीजसे वृक्षका स्फोट होता है, शरीरसे रोमावलीका स्फुरण होता है वैसे ब्रह्मसे ब्रह्मांडका स्फोट या स्फुरण हुआ है। ब्रह्म जमा हुवा घी तो ब्रह्मांड पिघला हुवा घी है। यह सारा, जो कुछ हम देखते हैं वह सब आत्माका विस्तार है। यह सारी विविधता आत्माका ऐश्वर्य योग है। इसका बोध ही आत्मबोध है। ज्ञानेश्वरी और अनुभवामृतमें इसीको विस्तारपूर्वक कहा गया है। अनादि—जिसका कोई आदि नहीं। जो कबसे है यह नहीं कहा जाता वह अनादि है। ब्रह्मका परिचय देते समय "अनादि अनंत" ऐसे दो शब्द आते हैं। अनादि अनंतका अर्थ देश- कालमें न आनेवाला, बिना ओर छोरका अथवा देशकालातीत ऐसा मान सकते हैं। ब्रह्मके साथ मायाको भी अनादि कहा गया है क्यों कि मायाका अपना कोई अस्तित्व नहीं है। जिसका अस्तित्व ही नहीं उसका भला आदि कैसे? वैसे ही जो है ही नहीं उसका अंत कहां? माया अस्तित्व हीनताके कारण अनादि है किंतु ब्रह्मका अस्तित्व हो कर भी वह अनादि है। अनंत है। अर्थात् बिना ओर छोरका है। ब्रह्म शब्दका अर्थ है बृहत, बडा; इतना बडा कि कोई भी उसको आच्छादित नहीं कर सकता, उसका आदि अंत नहीं नाप सकता। उसका ओर छोर नहीं पा सकता। अनादि शब्दमें आद्य तथा स्वसंबेद्य इन शब्दोंका भाव समाया हुवा है। अनाहतध्वनि—योग-विद्यामें छ चक्रोंका विवेचन है। इसको षट्चक्र कहा गया है। वे छ चक्र हैं (१) मूलाधार (२) स्वाधिष्ठान (३) मणिपूरक (४) अनाहत (५) विशुद्धि (६) आज्ञाचक्र। इसमें अनाहत हृदय-स्थानमें है। वह रक्तवर्ण है। बिना किसी ताडनाके, प्रेरणाके वह शब्द-प्रत्यय देता है। इसलिये वह अनाहत चक्र है। अनाहत चक्रमें शब्द-ब्रह्मका बिना किसी आघातके, अनुभव होता है। इसको अनाहत ध्वनि कहते हैं। ज्ञानेश्वरी १०६