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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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नाद आकाश तत्त्वका गुण है। यह दो प्रकारका होता है। एक आघात-जन्य दूसरा बिन आघातके । हृदय चैतन्यका स्थान है। इसीमें शुद्ध-आकाशका एक स्थान है। वहाँ सदैव बिना आघातके ही नाद गूंजता रहता है। किंतु बाह्य-विषयोंमें फंसा हुआ मनुष्य उसको नहीं सुन सकता । योगी लोग इंद्रियोंको अंतर्मुख करके वह नाद सुननेका अभ्यास करते हैं। कुंडलिनी शक्ति जगने पर ही यह ध्वनि आने लगती है। कुंडलिनी शक्ति हृदय कमलके पास-अनाहत चक्रके पास-आनेपर, दस प्रकारसे यह अनाहत ध्वनि सुनाई देती है । चिणी, चिणचिणी, घंटा, शंख, तंत्री, ताल, वेणु, मृदंग, भेरी, और मेघ ध्वनि । इसके बाद, आज्ञाचक्रके पास जाने पर वही सोऽहम् शब्द, ओंकार नादमें परिवर्तित होता है। नाद अथवा ध्वनि अव्यक्त परतत्वके व्यक्तिकरणकी सूचना है। परा-वाणीमें सूक्ष्म रूपसे निहित यही शब्द अपरावाणीमें आकर सदैव हृदयमें गूंजने लगता है। इसका रूप ॐ है। यही ब्रह्मांडका मूलतत्त्व है। यह नाद अनाहत रूपसे व्यक्तिके हृदयाकाश तथा विश्वाकाशमें एकरूपसे गूंजता रहता है। इस गूंजनकी एकताका अनुभव ही सोऽहं भाव है। सदैव इस सोऽहं भावमें डूबा रहना ही अद्वैतस्थिति अथवा ब्राह्मी-स्थिति है जो सब प्रकारकी साधनाओंकी परम-सिद्धि है ! अपान—मनुष्यमें पांच प्रकारके प्राण होते हैं। इन्हें पंच-प्राण कहा जाता है । (१) प्राण (२) अपान (३) व्यान (४) उदान (५) समान ये उनके नाम हैं। शरीरमें उनका भिन्न भिन्न स्थान और काम है। हठयोगमें इसका विस्तृत विवेचन किया गया है। अपान वायु अधोमुखी होता है। मलमूत्रादि बाहर ढकेलना इसका सामान्य काम है। उपनिषदोंमें इसका स्थान नाभी कहा गया है। अन्नादिके निस्सार भागको नाभीके नीचे ढकेलना, मूत्र शुक्रादिको बहाना इसका कार्य है । किंतु योगी, योग विद्यासे इसको ऊर्ध्वमुख करके अपनी सुप्त शक्तिको जगाते हैं । अपानको ऊर्ध्वमुख करके प्राण और अपानको मिलानेसे मनुष्योंमें नयी शक्ति जगती है। अमृत—जिसको पीनेसे मृत्यु नहीं होती वह अमृत । इसको पीयूष, सुधा आदि भी कहा गया है। समुद्र मंथनसे अमृतकी प्राप्ति हुई । यद्यपि देव और दानव दोनोंने समुद्र मंथन किया था अंतमें देवोंको ही अमृत मिला। दैत्योंको नहीं मिला। यह पौराणिक कथा है। किंतु वैदिक “ऋषिकी प्रतिभा=अमृत” रहस्य जाननेके लिये स्वर्ग-मृत्यु पातालका अतिक्रमण करती है। उपनिषद् “ मृत्योर्मामृतं गमय ” कहते हैं। उपनिषद् अमृत न कहकर अमृतत्व कहते हैं। वह है जन्म मरणका अतिक्रमण करके पानेवाली स्थिति। जिसे पीनेसे मरण ही नहीं तब भला पुनर्जन्म कैसे ? अर्थात् ज्ञानेश्वर या ज्ञानेश्वरीका अमृत या अमृतत्त्व जन्म-मरण रहित मुक्तावस्था है। अरणी—दो लकड़ीके टुकड़ोंके घर्षणसे यज्ञाग्निका निर्माण किया जाता है। इसके लिये पीपलकी लकड़ी काममें लायी जाती है। इन लकड़ीके दो टुकड़ोंमेंसे जो नीचेका टुकड़ा रहता है उसे अधरारणी कहते हैं तो ऊपरके टुकड़ेको उत्तरारणी कहते हैं। अधरारणीमें खांच करके जो लकड़ीका टुकड़ा बिठाते हैं उसको मंथा कहते हैं। ऋग्वेदमें इस प्रकारके अग्निस्फोटका वर्णन आता है। अर्धमात्रा—ॐकारकी साढ़ेतीन मात्राओंमें अर्धमात्रा । योग-शास्त्रमें परा ब्रह्मांडमें मूर्धन्याकाशका भाग। आज्ञाचक्र, जो भृकुटीमध्यमें होता है और सहस्रार ब्रह्मरंध्र सहस्रदल- लाखमें होता है, इसकी मध्यसंधि है। ज्ञानेश्वरीके छठे अध्यायमें इसका विस्तृत विवेचन है। १०७ परिशिष्ट ५