भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1057, कुल 1172 में से

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पृष्ठ 1057

अष्टादश पुराण—जन-सामान्यमें भारतीय धर्म, संस्कृति परमार्थ तथा सभ्यताका प्रसार करनेका काम पुराणोंने किया है। पुराण सदैव सामान्य-लोक-शिक्षाका माध्यम रहे हैं। इसलिये पुराणोंको “लोक-वेद" कहा गया है। वेद, उपनिषदादि जन-सामान्यका साहित्य नहीं हो सकता था। अनुभवी विद्वान ही उसको समझ सकते थे। इसलिये भारतीय मनीषियोंने लोक-शिक्षाके लिये तत्वज्ञानको आख्यानोंद्वारा समझाया है। पुराणोंमें सदाचार, नीति, धर्म; इतिहास, दर्शन, संस्कृति आदि सरल सुगम कहानियोंके रूपमें जनताके सम्मुख रखा ही है। साथ ही साथ राजनीति, अर्थनीति, समाजनीतिका शिक्षण दिया है। पुराणोंके कारण हिंदू-धर्ममें एक भव्यता आयी है। वैसे ही साहित्यकी दृष्टिसे भी पुराणोंका बड़ा महत्त्व है। पुराणोंमें कई जगह श्रेष्ठतम साहित्यका दर्शन हो जाता है। भारतीय जीवनपरंपरा, इतिहास आदि जाननेके लिये पुराणोंका-विश्लेषणात्मक दृष्टिसे अध्ययन करना आवश्यक है। तथा यह नित्य-नूतन है। पुराण शब्दका अर्थ ही “पुराना होकर नया” ऐसा है। पुराणोंमें (१) सृष्टिवर्णन (२) सृष्टि उत्पत्ति (३) जीवन निर्वाहका साधन (४) परमात्माद्वारा सज्जनोंकी रक्षा और दुर्जनोंका संहार (५) मन्वंतर (६) वंशोंका इतिहास (७) वंशचरित्र और चारित्र्य (८) विविधप्रकारकी क्रांतियां और नाश (९) जीव-वर्णन (१०) उसकी दशा-अवस्थात्रयोंका विवेचन - इन दस विषयोंका विवेचन और विश्लेषण होता है। साथ साथ भारतमें प्राचीन कालमें प्रचलित अनेक प्रकारकी विद्या, कला तथा विज्ञानका भी वर्णन पुराणोंमें है। पुराणोंमें (१) पशुविद्या (२) आयुर्विद्या, (३) रत्नपरीक्षा (४) वास्तु-शिल्पविद्या (५) सामुद्रिक (६) धनुर्विद्या आदि विद्याओंके साथ प्रसिद्ध (१) अनुभूति विद्या (२) स्वेच्छा रूपधारिणी विद्या (३) अक्षग्राम हृदयविद्या (४) सर्वभूतरूप विद्या (५) पद्मिनी विद्या (६) जालंदरी विद्या (७) पराबाला विद्या (८) रक्षोघ्न विद्या, (९) पुरुषप्रमोदिनी विद्या (१०) उच्छापनविधान विद्या (११) देवहूति विद्या (१२) युवकरण विद्या (१३) वज्रहवनिका विद्या (१४) गोपालमंत्र विद्या ऐसे १४ विद्याओंका वर्णन है। पुराणोंमें विषयानुसार, सूत्रात्मक, विवेचनात्मक, व्याख्यात्मक, रसात्मक, भावात्मक, विविध प्रकारकी भाषाशैलियोंका सुंदर दर्शन होता है। साहित्य तथा भाषाशैलियोंके अध्येताओंके लिये पुराण आदर्श ग्रंथ है। पुराण कथनका मूल उद्देश्य, लोकरंजनके साथ जन-सामान्यको गहरेसे गहरे विषयको समझाना है। इसीलिये वहां सभी प्रकारकी भाषा- शैलियोंका प्रयोग देखनेको मिलता है। ऐसे अनेक दृष्टिसे पुराण भारतीय-जीवन परंपराके ज्ञानकोश हैं। ऐसे अठारह पुराण हैं। (१) ब्रह्मपुराण (२) पद्मपुराण (३) विष्णुपुराण (४) वायुपुराण (५) भागवतपुराण (६) नारदपुराण (७) मार्कंडेयपुराण (८) अग्निपुराण (९) भविष्यपुराण (१०) ब्रह्मवैवर्तपुराण (११) लिंगपुराण (१२) वराहपुराण (१३) स्कंदपुराण (१४) वामनपुराण (१५) कूर्मपुराण (१६) मत्स्यपुराण (१७) गरुडपुराण (१८) ब्रह्मांडपुराण । इसके अलावा अठारह उपपुराण हैं। अहंकार—"मैं" का भ्रामक भाव, नामरूपात्मक शरीरको मैं मानना। इसी अहं- कारके आवरणमें जीव अपनेको परमात्मासे भिन्न मानने लगता है। इसीको चिजड ग्रंथी कहते हैं। इस अहंकारके नाशसे जीवात्मा और परमात्माके एकत्वका बोध होता है। १११ परिशिष्ट ५

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