भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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सांख्यमतानुसार-अव्यक्त प्रकृति महत्तत्त्व-अहंकार इस क्रमसे सृष्टिकी उत्पत्ति है। अहंकारके सात्त्विक, राजसिक तथा तामसिक इन त्रिविध रूपोंसे (१) ज्ञानेंद्रिय (२) कर्मेंद्रिय (३) पंच तन्मात्राओंकी उत्पत्ति हुई। यह सारी स्थूलसृष्टिका आधार है। त्रिगुणोंके कारणसे क्रियाशील महत्तत्त्वसे अहंकारकी निष्पत्ति होती है। "मैं" और "मेरा" यह भाव ही अहंकारका रूप है। अभिमान गर्व, घमंड, मैंपना यह इसके रूप हैं तथा दंभ इसकी विकृति । आकाश-इस शब्दके कई अर्थ हैं। वैसे आकाशका वाच्यार्थ रिक्तता है। सर्वव्यापी अनंत आकाशरूप है। आकाश पंचमहाभूतोंमें अंतिम तथा सूक्ष्मतम सर्वव्यापी तत्त्व है। घनमें भी आकाश-तत्त्व रहता है। अणुमें भी रहता है। उपनिषदमें "सारा आकाशसे प्रकट होकर आकाशमें लीन होता है!" ऐसे कहा गया है। विश्व-निर्माणकी इस कल्पनाको सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। जैन दार्शनिकोंने लोकाकाश तथा अलोकाकाश ऐसे दो आकाश माने हैं। लोकाकाश कुछ द्रव्योंका आधारभूत है तो अलोकाकाशमें किसी प्रकारके द्रव्य नहीं हैं। और बौद्ध दार्श- निकोंके मतमें आकाशका अर्थ सूक्ष्म-वायु अथवा शून्य = रिक्तता है। विश्वके प्रत्येक दर्शनने जैसे आकाशका विचार किया है, वैसे ही विश्वके प्रत्येक धर्ममें आकाशको देवता माना है। आकाश- देवताके कार्योंके विषयमें सभी धर्म-ग्रंथोंमें जो लिखा है वह करीब करीब एकसा है। ऋग्वेदमें उसे अमृतधारण करके अमृतवर्षा करनेवाला देव कहा है। इससे पृथ्वी खिलती है। ऋग्वेदमें द्यावा-पृथ्वी (आकाश और भूमिको) पिता तथा माता कहा गया है। इस माता पिता पर ऋग्वेदमें छ सूक्त हैं। किंतु योगमार्गमें बाह्य आकाशकी भांति मानवी शरीरमें भी आकाशका वर्णन है। शरीरमें स्थान स्थान पर जो रिक्तता है वहां वहां होनेवाले कार्योंका वर्णन करते समय हृदयाकाश मूर्धन्याकाश आदि शब्द आये हैं। भारतीय दर्शनमें पिंड ब्रह्मांड न्याय प्रसिद्ध है। मानव देह समग्र विश्वकी या ब्रह्मांडकी छोटी प्रतिकृति है। जैसे ब्रह्मांडमें स्वर्ग, मृत्यु, पाताळ ऐसे त्रिलोककी कल्पना की गयी है वैसे शरीरमें भी त्रिलोक हैं। शरीरके ऊपरके भागको परा ब्रह्मांड माना गया है। बीचका भाग स्व-ब्रह्मांड है। नीचेका भाग अपर ब्रह्मांड। इस स्व-ब्रह्मांडमें हृदयाकाश माना गया है। यह हृदयाकाश ऋषिमूनि तथा संत-सिद्ध पुरुषोंके सारे अमृत अनुभवोंकी जन्मभूमि है। यही परमात्मधाम है। भारतीय ही नहीं विश्वका संत साहित्य यहांके मधुर अमृत तुल्य अनुभवोंकी बांसरी बजाता है। आत्म-निवेदन-वैष्णवोंके भक्ति-शास्त्रमें भक्तिके नौ प्रकार कहे गये हैं। (१) श्रवण (२) कीर्तन (३) स्मरण (४) पादसेवन (५) अर्चन (६) वंदन (७) दास्य (८) सख्य (९) आत्मनिवेदन। आत्म-निवेदन इस नव-विधा भक्तीका अंतिम रूप है। और इस भक्तीका आदर्श-पुरुष बलि है। आत्म-निवेदनमें भक्त अपना सब कुछ परमात्माके चरणोंमें अर्पण करता है। अंतमें अपनेको भी। आत्म-निवेदनको सर्वसमर्पण कह सकते हैं। आत्मबोध-आत्मज्ञान-अपनेको जानना। अपने आपको जानना। हर समय मनुष्य जो "मैं" कहता है वह "मैं" कौन है? क्या है? इस तत्त्वको जाननेकी साधना आत्म-साधना ज्ञानेश्वरी ११२