ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै । अपने आपको जानना ज्ञान है । "मैं" वह शरीर है क्या ? तो हम मेरा शरीर स्वस्थ है कहते हैं । तब शरीरसे भिन्न यह मैं कौन ? मन है क्या ? नहीं; आज मेरा मन प्रसन्न है कहता है मनुष्य ! मेरा मन कहनेवाला मैं कौन ? वैसे ही "मेरी बुद्धि" और "मेरी भावना" कहनेवाला मैं कौन ? मनुष्य जब सोता है तब उसे इस "मैं" का भान नहीं होता किंतु उठते ही कहता है "मैं" सो गया था । सो जानेवाला मैं कौन ? कौन ? और क्या ? प्रश्न पूछते पूछते हम ऐसी एक स्थितिमें पहुंच जाते हैं "जहां कुछ भी (उत्तर) नहीं है। जहां कुछ भी नहीं वहीं स्थिर रह कर देखनेसे वहां जो कुछ "है" का बोध होगा वही आत्मबोध है। "कुछ भी नहीं है" "में" "है" पाना ही आत्मबोध है ! आत्मबोध मौन होता है। वह मौन अनुभव है । जैसे "मरा हुवा मनुष्य मैं मरा" नहीं कह सकता वैसे आत्मबोध पाया हुवा मनुष्य आत्मबोध क्या है यह नहीं कह सकता । पानीमें घुला हुवा नमक अपना रूप खोकर केवल "खारा पन" से रहता है वैसे है आत्म-बोध । केवल अनुभव गम्य ! आत्मा—सतत सर्वव्यापी गतिशील, अर्थात् जो सर्वव्यापी है, सर्वग्राही है, सदैव जिसका अस्तित्व रहता है उसे आत्मा कहते हैं। यह आत्मा शब्दका शब्दार्थ है। वैसे अन्यान्य दार्शनिकोंने इसका भिन्न भिन्न अर्थ किया है। ऋग्वेदमें "मर्त्य शरीरसे अमर्त्य संलग्न" इस प्रकार इसका वर्णन किया गया है। वायुके अर्थमें भी इसका उल्लेख है। यह "अहम्" का बोधक भी रहा है। किंतु उपनिषदोंमें इसका अर्थ बदला है। सर्वप्रथम उपनिषदोंमें फिर जागतिक दार्शनिक ग्रंथोंमें आत्माकी कल्पना विकसित हुई है। मनुष्यने अपनी जीवन शक्तिको "मैं" कहते हुए उस "मैं" को आत्मा माना । अर्थात् आत्माका अर्थ है मैं । अहं ब्रह्मास्मि, अथवा सोऽहं शिवोऽहम् । "मैं ही विश्व शक्ति हूँ !" अथवा "विश्व शक्ति मैं है !" यह दर्शानेवाले महावाक्य हैं । इस एकात्म-भावका बीज वेदोंमें भी देखनेको मिलता है। "विश्व-शक्ति ही आत्मा है और मनुष्य विश्व-शक्तिका रूप है" यह उपनिषदोंका अंतिम निर्णय है। उपनिषद् मानव मात्रको कहते हैं तत्=वह विश्व शक्ति त्वम् असि=तू है। और "सोऽहमस्मि" "वह मैं हूं" उपनिषद् गानेवालोंका अनुभव है। इसीलिये वह "पूर्ण है वह पूर्ण है यह" कहते हैं। यह अनुभव मनुष्यको निर्भय बनाता है। द्वंद्वातीत बनाता है। सदैव आनंद विभोर रखता है। "विश्वमें मेरे बिना कुछ भी नहीं। यह सारा केवल मैं हूं" ऐसे अनुभव आनेके बाद किसका भय ? किसका द्वेष ? किससे प्रेम या काम ? अपनेमें इस विश्व शक्तिका अनुभव करना आत्म- दर्शन है तो विश्वमें अपनेको देखना विश्वरूप दर्शन है। उपनिषद, गीता, ज्ञानेश्वरी इसीको कहते हैं। अपनेको विश्वमें विलीन करके संपूर्ण विश्व स्वयं बन जाना आध्यात्मिक जीवनका अंतिम साध्य है ! उपनिषदादि ग्रंथ इसका साधन भी सिखाते हैं और साध्यकी ओर इंगित भी कहते हैं। आत्मानंद-आत्मसुख—सारे विश्वमें जो एक शक्ति अखंड रूपसे व्याप्त है वही शक्ति मनुष्यमें भी विद्यमान है। उस शक्तिको आत्मा कहते हैं। इसी शक्तिको मनुष्य "मैं" कहता है। यह "मैं" ही आत्मा है। यह मैं विश्वाकार है। वही विश्वका भी संचालन करता है। इस विश्व संचालक शक्तिको परमात्मा अथवा ब्रह्म कहा है। जब मनुष्य अपना सीमित मैं भूलकर विश्व- संचालक शक्ति ही मैं हूं अथवा-विश्व-शक्ति और मैं एक हूं" यह अनुभव करने लगता है तब ११३ परिशिष्ट ५