ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 1060, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो सुख तथा तज्जन्य आनंद या समाधान होता है वह आत्मानंद और आत्मसुख है। यह आत्मा परमात्माके समरसैक्यका सुख है। यह आत्म-सुख निरालंब है। जैसे इंद्रियजन्य सुख या तज्जन्य आनंदके लिये बाहरी वस्तुओंकी आवश्यकता अथवा आलंबनकी आवश्यकता है वैसे इस आत्म-सुखके लिये किसी प्रकारके आलंबनकी आवश्यकता नहीं है। यह अपनेमें अपनेसे आप ही अनुभव करना होता है। इसलिये वह निरालंब सुख, क्षणिक न होकर तात्कालिक न होकर सतत टिकता है। आत्म सुख वर्षामें कड़कनेवाली बिजली अथवा इंद्रधनुष्यकी भांति नहीं किंतु सूर्य प्रकाशकी भांति एक बार प्राप्त होकर अंतकाल तक टिका रहता है। इसलिये यह सबसे महान सुख है। इससे अन्य सुखकी अथवा अन्य आनंदकी तुलना नहीं की जा सकती। यह आत्म-सुख ही मानवमात्रका अंतिम और एका मात्र साध्य है। और सब साध्य उसके साधन रूप हैं। आत्मानात्म विचार — आत्मा=शुद्ध चैतन्य और देह, इंद्रिय, विषयादिकी भिन्नताका विचार। "मैं शुद्ध चैतन्यरूप आत्मा हूं" यह इस विचारका स्वीकारात्मक भाव है। तथा "मैं शरीर नहीं। मैं मन या बुद्धि नहीं।" यह उसका निषेध भाव है। "चैतन्य रूप जो मैं" छोड़ कर अन्य सब देह मन बुद्धि आदि अनात्म है इसका विवेक आत्मानात्म विचार है। आदिमाया—पर-ब्रह्मकी स्वाभाविक स्फुरण शक्ति। इसी स्फुरण-शक्तिसे ब्रह्ममें ब्रह्मांडका आभास होता है और उसीमें विलीन भी हो जाता है। इसको ज्ञानेश्वरीमें विश्वाभास कहा गया है। ब्रह्मकी इसी स्फुरण-शक्तिको माया, आदिमाया, अव्यक्त प्रकृति आदि नाम दिये गये हैं। इसी मायाके कारण सच्चिदानंद अखंड ब्रह्मतत्वके स्थान पर विविधता रूप, दुःखमय सृष्टिका भास होता है। द्वैतका भास होता है जो सभी प्रकारके दुःख और द्वंद्वका कारण है। आदिसंकल्प—विश्वोत्पत्तिका कारण रूप ब्रह्मका मूल-संकल्प अथवा इच्छा। वेदोप- निषदोंमें ऐसे कहा गया है कि जब कुछ भी नहीं था उस समय जो मूलतत्व था उसके मनमें इच्छा होनेसे उसके कामसे-यह विश्व निर्माण हुवा। पहले ब्रह्म अकेला था। निराकार, निर्विकार, निर्विशेष ! उसके मनमें इच्छा हुई-संकल्प जगा-मुझे अनेक होना चाहिए। इस संकल्पस्फुरणसे यह सारा विश्व प्रकट हुवा। ब्रह्मकी जिस इच्छासे यह विश्व स्पष्ट हुवा, अथवा ब्रह्मकी जिस कामनासे इस विश्वका स्फुरण हुवा उस इच्छाको "आदि संकल्प" कहा गया है। आद्य—संभवतः केवल ज्ञानेश्वर महाराजने नमन करते समय परमात्माके लिये इस शब्दसे संबोधन किया है। आद्य कुछ भी नहीं था तब जो था वह ! ऋग्वेदके नासदीयसूक्तमें जैसे "वह" शब्द आया है उसी शब्दका द्योतक यह आद्य शब्द है। आद्य-जिससे सारे विश्व अथवा ब्रह्मांडका स्फुरण हुवा है। आद्य=सबसे प्रथम जो था और जिसके प्रथम कुछ भी नहीं था। आधारचक्र—योग-शास्त्रमें षट्चक्रोंका विवेचन है। आगे "षट्चक्र" में इसका पूरा विवेचन देखनेको मिलेगा। आधारचक्रको मूलाधारचक्र कहा गया है। यह चक्र शिश्न और गुदाके बीचमें मेरुदंडके प्रारंभमें-सुषुम्ना नाडीके मूलमें (?) स्थित है। -नाडी देखें-सुस ज्ञानेश्वरी ११४