ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 1061, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुंडलिनीका वास यहीं होता है। योग, भक्ति, ज्ञानादि साधनासे वह सुप्त कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है। हठयोगमें सिद्धासनसे इसपर दबाव लाकर-मूलबंध-क्रियासे-आधार मुद्रा देखें-इस सुप्त-शक्तिको जागृत करनेका विधान है। इस आधारचक्र अथवा आधारकमलकी चार पंखुडियां होतीं हैं। यह आधारकमल लाल रंगका होता है। इस कमलकी-पंखुडियों पर वं. शं. षं. सं. ये बीज होते हैं। प्रत्येक मंत्र तथा देवताका बीज-मंत्र होता है । इस बीजमें देवता शक्ति है। अन्यान्य मंत्रोंके साथ इन बीजोंको जोडनेसे शरीरस्थित उन उन देवताओंसे संबंध जुडकर विश्वकी उसी देवतासे साधक समरस हो जाता है । भिन्न भिन्न बीजसे जुडी देवता शरीरके भिन्न भिन्न स्थान पर स्थित हैं। इसीलिये उस स्थानको बीजके नामसे जाना जाना है। आधारमुद्रा—हठयोगकी प्रणालीमें कई प्रकारके बंध हैं। इनको मुद्रा भी कहा गया है। अन्यत्र षट्चक्रोंका विवेचन किया गया है। इन चक्रोंको जागृत तथा कार्यक्षम बनानेके लिये हठयोगमें अन्यान्य क्रियायें हैं। उन क्रियाओंमें यह बंध अथवा मुद्रायें हैं। इस आधारमुद्राका दूसरा नाम मूलबंध है। मूलबंध एक प्रकारका प्राणायाम है। मूलबंधका अर्थ गुदद्वारसे अपानको अंदर खींचना। मूलबंध क्रिया करते समय सिद्धासन-वज्रासन सबसे अच्छा है। प्राणायाम करते समय जब नाकसे अंदर श्वास लिया जाता है उसी समय गुदद्वारसे अपानको भी अंदर खींचा जाता है। ऐसे करनेसे प्राण और अपानके दबावमें कुंडलिनी जागृत होती है। प्राण और अपानका मिलन भी होता है। जिससे अपानसिद्धि होती है। अपानसिद्धि इंद्रिय-जयमें महत्व- पूर्ण कार्य करती है। हठयोगमें बंधत्रय मूलबंध, उड्डियानबंध तथा जलंधरबंध अत्यंत महत्वके माने गये हैं। शरीर निरोग रखनेके लिये बंधसह प्राणायाम महान् वरदान माना गया है। आनंदत्रय—ब्रह्मानंद। वासनानंद। विषयानंद। आसन—योगाभ्यासके लिये सहज स्थिरतापूर्वक बैठनेकी प्रक्रिया। मनकी एकाग्रताके लिये आसनका अत्यंत उपयोग होता है। हठयोग और राजयोग दोनों योगमें आसनका महत्व कहा गया है। योग-सूत्रमें जिससे स्थिर रहकर मनको सुख मिलता है, अधिकसे अधिक समय बैठनेकी इच्छा होती है उसको आसन कहा गया है। किसी भी महान् कार्यके लिये, साधन अथवा योगाभ्यासके समय पृथ्वीकी प्रार्थना करके बैठनेकी क्रियाको आसनविधि कहा गया है। कहीं कहीं भिन्न भिन्न प्रकारके कार्यके भिन्न भिन्न प्रकारसे बैठनेकी भी विधि है। ज्ञानेश्वरीके छठे अध्यायमें आध्यात्मिक साधनामं बैठनेकी आसनविधिका विस्तृत विवेचन देख सकते हैं आहार—यह सभी जानते हैं कि आहरका अर्थ है खाना। आहारका शब्दार्थ अंदर लेना है। संभवतः इसी परसे जगद्गुरु श्रीशंकराचार्यजीने आहारका अर्थ करते समय "किसी भी इंद्रियकी ओरसे किया जानेवाला विषयसेवन" ऐसे किया है। देखना आंखोंकी भूख है और सुनना कानोंकी भूख जैसे चखना जिव्हाकी भूख है! अर्थात् प्रत्येक इंद्रियकी ओरसे अपनी अपनी भूख मिटानेके लिये "अपना विषय सेवन" करना भी आहार है। इस गहरे अर्थको ग्रहण करके ही गीताके "युक्ताहारविहार" का भाव ग्रहण करना चाहिए। आवाहन-विसर्जन—आवाहन पूजाके लिये किसी देवताको बुलाना। देवतागमनके लिये जो प्रार्थना की जाती है उसे आवाहन कहते हैं, और पूजाके बाद देवताको लौटाया जाता है ११५ परिशिष्ट ५