ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 107, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्वोपरि तू हैं ईश वैसे । हमारा जीवनाधार जैसे । असहमत मेरी बातसे । अब जो कही थी ॥ ६२ ॥ तो करना क्या उचित । यहां है धर्म-सम्मत । कहो मुझे तू त्वरित । पुरुषोत्तम ॥ ६३ ॥ न हि प्रपश्यामि ममापनुद्यात् यच्छोकमुच्छोषणमिंद्रियाणाम् । अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥ ८ ॥ हरि-कृपाका वर्णन— देखकर यह कुल सकल । हृदय हुआ है शोक विव्हल । सुनकरके वह तेरे बोल । होगा शांत ॥ ६४ ॥ मिलेगा यह पृथ्वीतल । या महेंद्र पद सकल । मन है जो मोह विव्हल । शांत न होगा ॥ ६५ ॥ भूना हुआ बीज जैसे । अच्छे खेतमें बोनेसे । औ' खाद पानी देनेसे । नहीं अंकुरता ॥ ६६ ॥ यदि आयुष्य भरा हो किसीका । उपयोग न होता औषधका । वहां उपाय परमामृतका । एकमात्र ॥ ६७ ॥ वैसे राज्य-भोग समृद्धि । न दें संजीवन जीवबुद्धि । अनुग्रह ही है कृपानिधि । तव कारुण्यका ॥ ६८ ॥ ऐसा बोला है अर्जुन । जो था मोह-मुक्त क्षण । मोह-उर्मिसे तत्क्षण । हुआ व्याप्त ॥ ६९ ॥ यहां मिलेगा बिना शत्रु राज्य वैसे ही इंद्रासन स्वर्गमें भी । तोभी न होगा यह शोक शांत मेरे सभी इंद्रिय सोखता जो ॥ ८ ॥ ३९ सांख्ययोग