भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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मुझे लगता यह नहीं मो-लहर । यह है असंगत कोई अन्य प्रकार । इसपर पड़ा काल-सर्पका असर । महामोहकें ॥ ७० ॥ मर्म-स्थान जो हृदय कमल । उसपे कारुण्यका सम काल । दंश किया है महा-मोह व्याल । चढ़ता विष लहर ॥ ७१ ॥ इसके प्रभावको जानकर । जिसकी कृपादृष्टि ही उतार । दौड़ा है श्रीहरी करुणाकर । सपेरा बनके ॥ ७२ ॥ व्याकुल वह पांडुकुमार । समीप उसके जादूगर । रक्षा करेगा वह सत्वर । कृपा-लीलासे ॥ ७३ ॥ इसीलिये वह पार्थ । जो है मोहफणिग्रस्त । जानकर यह बात । कही मैंने ॥ ७४ ॥ वहां खड़ाथा धनुर्धर । मोहसे व्याकुल होकर । जैसे बादलोंमें भास्कर । निस्तेज होता ॥ ७५ ॥ वैसा खड़ा वह पांडुकुमार । दुःखावेगसे होकर जर्जर । जैसे ग्रीष्मकालमें गिरिवर । होता दावानल ग्रस्त ॥ ७६ ॥ इसलिये सहज सुनील । कृपामृतसे जो है सजल । अनुकूल हुआ श्रीगोपाल । महामेघ हो ॥ ७७ ॥ द्युति है वहां सुदर्शनकी । झलक वही विद्युल्लताकी । सजी हुई गंभीर वाणीकी । गर्जना-सी ॥ ७८ ॥ अब होगी वह वर्षा उदार । शांत होगा अर्जुन गिरिवर । फूटेगा ज्ञानका नव अंकुर । उसी स्थानपे ॥ ७९ ॥ सुनो यह कथा गहन । जिससे शांत होता मन । ज्ञानदेवका है बचन । जो निवृत्तिदास ॥ ८० ॥ संजय उवाच एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परंतप । न योत्स्य इति गोविंदमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥ ९ ॥ ऐसा अर्जुन जो वीर बोलके कृष्णसे यह अंतमें मैं न जूझूंगा कहके शांत हो गया ॥ ९ ॥ ज्ञानेश्वरी ४०

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