ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअहंता छंदन— संजय ऐसा बोला । राजा ! अर्जुन बोला । पुनः हो शोकाकुल । यह बात ॥ ८१ ॥ धनंजय बोला श्रीकृष्णसे । अब न कहो कुछ मुझसे । न लडूंगा सर्वथा इनसे । निश्चित यह ॥ ८२ ॥ ऐसा कहकर अर्जुन । बैठा रहा हो मौन । देख कर यह श्रीकृष्ण । हुआ चकित ॥ ८३ ॥ तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत । सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः ॥ १० ॥ फिर कहता मन ही मन । क्या करता है यह अर्जुन । न जानता यह अनजान । क्या करना अब ॥ ८४ ॥ अब होगा कैसे इसको ज्ञान । कैसे आयेगा धीरजका भान । करता है श्रीकृष्ण अनुमान । मांत्रिकसा ॥ ८५ ॥ अथवा देख असाध्य-व्याधी । अमृत सम दिव्य औषधि । योजता है वैद्य निरवधि । निदान करके ॥ ८६ ॥ करता श्रीहरि विवेचन । दोनों सेनाओंके मध्यस्थान । जिससे होगा मुक्त अर्जुन । महामोहसे ॥ ८७ ॥ उस निश्चित हेतुसे । हरिने कहा क्रोधसे । माताके क्रोधमें जैसे । रहता स्नेह ॥ ८८ ॥ औषधके तीतापनके अंदर । होता है जैसे अमृतका असर । वह गुण रूपसे ही निरंतर । दीखता वैसे ॥ ८९ ॥ वैसे ऊपरसे कठोर । अंदर जो अति मधुर । ऐसे वाक्य शार्गधर । बोला पार्थसे ॥ ९० ॥ पार्थसे यों हृषीकेश हंसके कहने लगे । खडा जो शोकमें डूबा वहीं उभयं सैन्यमें ॥ १० ॥ (6) ४१ सांख्ययोग