ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
अहंता छंदन— संजय ऐसा बोला । राजा ! अर्जुन बोला । पुनः हो शोकाकुल । यह बात ॥ ८१ ॥ धनंजय बोला श्रीकृष्णसे । अब न कहो कुछ मुझसे । न लडूंगा सर्वथा इनसे । निश्चित यह ॥ ८२ ॥ ऐसा कहकर अर्जुन । बैठा रहा हो मौन । देख कर यह श्रीकृष्ण । हुआ चकित ॥ ८३ ॥ तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत । सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः ॥ १० ॥ फिर कहता मन ही मन । क्या करता है यह अर्जुन । न जानता यह अनजान । क्या करना अब ॥ ८४ ॥ अब होगा कैसे इसको ज्ञान । कैसे आयेगा धीरजका भान । करता है श्रीकृष्ण अनुमान । मांत्रिकसा ॥ ८५ ॥ अथवा देख असाध्य-व्याधी । अमृत सम दिव्य औषधि । योजता है वैद्य निरवधि । निदान करके ॥ ८६ ॥ करता श्रीहरि विवेचन । दोनों सेनाओंके मध्यस्थान । जिससे होगा मुक्त अर्जुन । महामोहसे ॥ ८७ ॥ उस निश्चित हेतुसे । हरिने कहा क्रोधसे । माताके क्रोधमें जैसे । रहता स्नेह ॥ ८८ ॥ औषधके तीतापनके अंदर । होता है जैसे अमृतका असर । वह गुण रूपसे ही निरंतर । दीखता वैसे ॥ ८९ ॥ वैसे ऊपरसे कठोर । अंदर जो अति मधुर । ऐसे वाक्य शार्गधर । बोला पार्थसे ॥ ९० ॥ पार्थसे यों हृषीकेश हंसके कहने लगे । खडा जो शोकमें डूबा वहीं उभयं सैन्यमें ॥ १० ॥ (6) ४१ सांख्ययोग
भगवान उवाच अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । गतासूनगतासूंश्च नानुशोचंति पंडिताः ॥ ११ ॥ फिर अर्जुनसे कहता है। हमने अचरज देखा है। आज तुमने यहां किया है। मेरे समक्ष ॥ ९१ ॥ बनता बड़ा जानकार । न छोड़ता मूर्ख विचार । औ' कहता नीति विचार । सिखाना चाहुं ॥ ९२ ॥ जन्मांधका पागलपन । करता है जैसा थैमान । वैसा तेरा श्यानापन । दौडता चहूँ ओर ॥ ९३ ॥ अपनी बात न जानता । तो भी कौरवोंकी सोचता । देखकर विस्मय होता । मुझे अतिशय ॥ ९४ ॥ मुझे कह तू जरा अर्जुन । तुझपे है स्थित त्रिभुवन । अनादि यह विश्व-निर्माण । असत्य क्या ? ॥ ९५ ॥ सर्व समर्थ है यहां एक । उससे निर्माण होते लोक । कहना जगतका तू देख । व्यर्थ है क्या ? ॥ ९६ ॥ औ' ऐसा हुआ है क्या सांप्रत । जन्म मृत्यु तुझसे निर्मित । नाश होंगे ये तेरे ही हाथ । तेरे करनेसे ॥ ९७ ॥ भ्रमसे तू अहंकृति मानता । यदि इनका घात न करता । तो यह सैन्य क्या अमर होता । चिरजीवि-सा ॥ ९८ ॥ अथवा तू है एक घातक । तथा अन्य सभी हैं मृतक । चित्तमें ऐसा ही भ्रम एक । नहीं आने दे ॥ ९९ ॥ अनादि सिद्ध है यह पूर्ण । होना जाना स्वभाव कारण । सोचनेका तुझे क्या कारण । है इसमें ॥ १०० ॥ श्री भगवानने कहा करता तू वृथा शोक कहता ज्ञान भी फिर । ज्ञानी न करता शोक गतागत विचारका ॥ ११ ॥ ज्ञानेश्वरी ४२
अज्ञानवश कुछ न जानता । जो सोचना वह नहीं सोचता । फिर भी बडी नीति है कहता । हमको ही ॥ १ ॥ होते हैं जो विवेकी । न सोचते दोनोंकी । आना जाना भ्रांतिकी । मानकर ॥२ ॥ न त्वेवाहं जातु नाऽऽसं न त्वं नेमे जनाधिपाः । न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥ १२ ॥ आत्म लक्ष्य— कहता हूं बात एक । यहां हम तुम देख । तथा भूपति अनेक । सारे जन ॥ ३ ॥ नित्य ऐसे ही रहेंगे । या निश्चित क्षय होंगे । यह भ्रांति छोड देंगे । दोनों व्यर्थ ॥ ४ ॥ यह जन्म तथा नाश । दीखता है भ्रमवश । तत्वतः है अविनाश । वह वस्तु ॥ ५ ॥ जैसे पवन जल हिलाता । उससे हिलोर जो उठता । उसको कहें क्या जनमता । कह तू पार्थ ॥ ६ ॥ वायुका वही स्फुरण गया । हिलोर भी वहां बैठगया । तब कहें क्या है मर गया । सोचकर देख ॥ ७ ॥ देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । तथा देहांतरप्राप्तिः धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ १३ ॥ सुनो शरीर है एक । वयसे भेद अनेक । यह प्रत्यक्ष ही देख । प्रमाण तू ॥ ८ ॥ मैं तू तथैव ये राजे पहले थे सभी यहां । वैसे ही हम जो सारे होंगे भविष्यमें यहीं ॥ १२ ॥ देहीको देहमें आता बाल्य तारुण्य औ' जरा । वैसा ही है नया देह न डिगे धीर जो कभी ॥ १३ ॥ ४३ सांख्ययोग
होता है प्रथम कौमार्य । बदलता उसे तारुण्य । उससे नहीं होता लय । शरीरका ॥ ९ ॥ इस चैतन्यके भी ऐसे । बदलते शरीर वैसे । जो यह जानता है उसे । न मोह न दुःख ॥ १० ॥ मात्रास्पर्शास्तु कौंतेय शीतोष्ण सुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥ न जाननेका है यह कारण । जो है इंद्रियोंका आधीनपन । यह खींचता है अंतःकरण । इससे है भ्रम ॥ ११ ॥ इंद्रियां विषय सेवन करतीं । जिससे हर्ष शोक हैं उपजातीं । तथा अंतरंगको रस है देतीं । संसर्गसे अपने ॥ १२ ॥ विषयोंमें नहीं रहती । सदैव एकसी ही स्थिति । कभी दुःखकी है दीखती । कभी सुखकी ॥ १३ ॥ देखो है यह शब्दकी व्याप्ति । कहते हैं निंदा तथा स्तुति । उपजाते हर्ष शोक अति । श्रवणद्वारसे ॥ १४ ॥ मृदु और कठिन । स्पर्शके हैं दो गुण । त्वचा दे संग कारण । हर्ष शोक ॥ १५ ॥ सुरूप और कुरूप । रूपके हैं ये स्वरूप । नेत्रोंसे देते अमाप । सुख औ' दुःख ॥ १६ ॥ सुगंध औ' दुर्गंध । ये हैं गंधके भेद । दें विषाद औ' मोद । घ्राणके संग ॥ १७ ॥ ऐसा ही द्विविध रस । उपजाता प्रीति त्रास । तभी यह अपभ्रंश । विषय संगका ॥ १८ ॥ होनेसे इंद्रियोंके आधीन । भोगना शीत तथा उष्ण । जो हैं सुख दुखके कारण । अपनेको ॥ १९ ॥ शीतोष्ण विषय-स्पर्श फेंकते सुख दुःखमें । यही तू झेल ले सारा आते जाते अनित्य ये ॥ १४ ॥ ज्ञानेश्वरी ४४
विषयोंके बिना है नहीं । रम्य कछु मिलता नहीं । स्वभाव जैसा हुवा यही । इंद्रियोंका ॥ १२० ॥ ये विषय भी हैं कैसे । रोहिणीके जल जैसे । स्वप्नके गजराज से । आभास रूप ॥ २१ ॥ अनित्य इन्हे जानकर । इनका कर अनादर । कभी इनका नहीं कर । संग तू पार्थ ॥ २२ ॥ यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १५ ॥ विषय ये जिन्हे नहीं जकड़ते । उन्हे सुख दुःख दोनों नहीं होते । तथा गर्भवास संग नहीं होते । उनको कभी ॥ २३ ॥ वे हैं नित्य रूप पार्थ । जानो है तुम सर्वथा । जो कभी इंद्रियार्थ । हुये नहीं ॥ २४ ॥ नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः ॥ १६ ॥ सन्तोंको ही आत्मदर्शनकी शक्यता— पार्थ अब कुछ एक । कहूंगा सुन तू नेक । जिससे तू परलोक । जानेगा सब ॥ २५ ॥ इस उपाधिमें गुप्त । चैतन्य है सर्वगत । वह तत्वज्ञ जो संत । स्वीकारते हैं ॥ २६ ॥ सलीलमें पय जैसे । एक हो रहे हैं वैसे । किंतु राज-हंस उसे । जाने भिन्न ॥ २७ ॥ इनकी न चले बात सम जो सुख दुःखमें । ऐसा ही धीर होता है मोक्ष लाभार्थ योग्य जो ॥ १५ ॥ असत्यको न अस्तित्व सत्यका नाश भी नहीं । जानते यह तत्वज्ञ दोनोंको इस भांतिसे ॥ १६ ॥ ४५ सांख्ययोग
अथवा है अग्नि मुखसे मल । जलाके करते स्वर्ण निर्मल । निकाल लेते उसीको केवल । बुद्धिमान ॥ २८ ॥ अथवा ज्ञान मथनीसे । दधि मथन करनेसे । दीखता नवनीत जैसे । अन्तमें जो ॥ २९ ॥ रहता भूसा नाज मिलकर । उसे देखनेसे फटककर । नाज रहता है स्व स्थानपर । भूसा उड़ जाता ॥ १३० ॥ सोचनेसे है छूट जाता । प्रपंच यह स्वभावता । रहता है तत्व तत्वता । ज्ञानियोंको ॥ ३१ ॥ जिससे अनित्यमें नहीं । आस्तिक्य बुद्धि होती कहीं । यह निष्कर्ष दोनोंमें ही । देखा है सदा ॥ ३२ ॥ अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् । विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति ॥१७॥ अंतर्यामीका घात नहीं होता- सरासर विचार कर । जान तू भ्रांति है असार । स्वभावसे ही जो है सार । नित्य जान ॥ ३३ ॥ लोकत्रयका है आकार । जिसका है यह विस्तार । वहां वर्ण नाम आकार । नहीं चिन्ह ॥ ३४ ॥ वह है सर्वदा सर्वगत । जन्म मरणके है अतीत । करनेसे भी उसका घात । कभी होता नहीं ॥ ॥ ३५ ॥ अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥ १८ ॥ जिससे है भरा सारा जान तू वह अक्षय । नहीं हो सकता नाश उस अव्यय तत्वका ॥ १७ ॥ विनाशी देह हैं सारे सदा ही उसमें कहा । नित्य निःसीम है आत्मा इससे जूझ तू यहां ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी ४६
नष्ट होना शरीरका स्वभाव है- तथा सारा शरीर जात । स्वभावसे है नाशवंत । इसलिये हो युद्धरत । ऊठ अर्जुन ॥ ३६ ॥ य एनं वेत्ति हंतारं यश्चैनं मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हंति न हन्यते ॥ १९ ॥ परिवर्तन देहोंका है, बाहरी है - धर तू देहका अभिमान । शरीरको ही सर्वस्व मान । मारता मैं मरते आप्त जन । कह रहा है ॥ ३७ ॥ अर्जुन ! तू यह नहीं जानता । यदि विचार करे तो तत्वता । तू नहीं हैं किसीका वधिता । न ये हैं बध्य ॥ ३८ ॥ न जायते म्रियते वा कदाचित् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ २० ॥ वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् । कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥ २१ ॥ जैसे स्वप्नका है दृश्य । स्वप्नमें ही है सत्य । जगकर देखें तो अदृश्य । वैसे ही ॥ ३९ ॥ कहे जो मारता आत्मा और जो मरता कहे । दोनों न जानते तत्व मार या मरता न जो ॥ १९ ॥ न जन्म पाता न कदापि मृत्यु होता न पीछे न आगे न होगा । अजन्म जो नित्य सदा पुराण देही न मरता नाशे भी देह ॥ २० ॥ जानता जो निर्विकार अनाशी नित्य अव्यय । कैसे वह मरता या मारता किसको कब ॥ २१ ॥ ४७ सांख्ययोग.
जान तू ऐसी है यह माया । भ्रममें तू है व्यर्थ ही गया । शस्त्रसे वध किया तो छाया । न टूटता अंग ॥ १४० ॥ अथवा पूर्ण कुंभ उलट । दीखता बिंबाकार है टूटा । किंतु भानु-बिंब है अटूट । वैसे ही ॥ ४१ ॥ अथवा जैसे मठमें आकाश । मठकृतिसे बना मठाकाश । भंगनेसे मठके समावेश । महदाकाशमें ॥ ४२ ॥ लोप होनेसे वैसे शरीरका । नाश न होता कभी स्वरुपका । तभी आरोप न कर नाशका । भ्रांतिसे तू ॥ ४३ ॥ वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णान् अन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २२ ॥ जैसे जीर्ण वस्त्रको त्यजते । फिर नवीनको हैं ओढते । वैसे देहान्तर स्वीकारते । चैतन्यके ॥ ४४ ॥ नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ २३ ॥ अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयम् अक्लेद्योऽशोष्य एव च । नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ २४ ॥ उतारके जर्जर जीर्ण वस्त्र मनुष्य लेता दुसरे नवीन । तथैव तजके शरीर जीर्ण आत्मा भी लेता दुसरे नवीन ॥ २२ ॥ इसे न चुभते शस्त्र इसे अग्नि न बालता । न गलाता इसे पानी इसे वायू न सोखता ॥ २३ ॥ छिदता जलता ना जो गलता सूखता नहीं । स्थिर निश्चल है नित्य सर्व-व्यापी सनातन ॥ २४ ॥ ज्ञानेश्वरी ४८
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते । तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥ २५ ॥ है यह अनादि नित्य सिद्ध । निरुपाधि तथा विशुद्ध । इससे शस्त्रादिकोंसे छिद्र । न होता यह ॥ ४५ ॥ प्रलयोदकसे यह न भीगता । अग्निदाह यहां न संभवता ! महाशोषका प्रभाव न होता । मारुतके ॥ ४६ ॥ अर्जुन यह है नित्य । अचल तथा शाश्वत । सर्वत्र यह सदोदित । परिपूर्ण होता है ॥ ४७ ॥ अजी ! दृष्टिसे तर्ककी । भेंट न होती इसकी । ध्यानको इसकी भेंटकी । उत्कंठा है ॥ ४८ ॥ मनसे न होता प्राप्त । साधनासे अप्राप्त । निःसीम यह पार्थ । पुरुषोत्तम ॥ ४९ ॥ है गुणत्रय रहित । व्यक्तिकेलिये अतीत । अनादि औ' अविकृत । स्वरुप इसका ॥ ५० ॥ अर्जुन इसको ऐसे जानना । सकलात्मक रूप ही देखना । इससे सहज ही शोक पूर्ण । मिटेगा तेरा ॥ ५१ ॥ अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् । तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥ २६ ॥ यदि तू ऐसा नहीं जानता । अन्तवन्त ही इसे मानता । तब भी कहो कैसी है चिन्ता । पांडुकुमार ॥ ५२ ॥ जो है आदि स्थिति अंत । है निरंतर औ' नित । प्रवाह है अनुस्यूत । गंगा जलका-सा ॥ ५३ ॥ अचिंत्य वह अव्यक्त निर्विकारी कहे सब । ऐसी है जानके आत्मा तेरा शोक अकारण ॥ २५ ॥ अथवा देखता तू है जन्म-मृत्यु प्रति-क्षण । तो भी तुझे न है कोयी शोकका योग्य कारण ॥ २६ ॥ ४९ सांख्ययोग (7)
आदि भी वह अखंड रहता । अन्तमें है सागरसे मिलता । मध्यमें वह बहता रहता । दीखता वैसे ॥ ५४ ॥ वैसे ही यहां ये तीन । चलते एक समान । असंभव है अर्जुन । रोकना इसको ॥ ५५ ॥ इसलिये इस बातका । कारण नहीं शोकका । स्वभाव ही है इसका । मूल रूपसे ॥ ५६ ॥ न तो भी सुन अर्जुन । जीव जन्म मरणाधीन । देख कर यह कारण । शोक है व्यर्थ ॥ ५७ ॥ इससे यहां कुछ नहीं । शोकका कारण भी कहीं । टलता यहां कभी नहीं । जन्म औ' मरण ॥ ५८ ॥ जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ २७ ॥ अजी ! जन्मता जो सो नाशता । नाशता सो है पुनः दीखता । जैसे घटिका-यंत्र चलता । वैसे ही पार्थ ॥ ५९ ॥ या उदयास्त जैसे स्वभावसे । अखंडित होते जाते हैं वैसे । जन्म-मरण भी विश्वमें वैसे । हैं अनिवार्य ॥ १६० ॥ महाप्रलयके अवसर । होता त्रिभुवनका संहार । इसीलिये नहीं परिहार । आदि अन्तका ॥ ६१ ॥ जानकर तू यह मनमें । पडता क्यों व्यर्थ ही दुःखमें । जानकर बनता जनमें । पागलका--सा ॥ ६२ ॥ सब ढंगसे पार्थ । शोक है सब व्यर्थ । दुःखदायह सर्वथा । नहीं विषय ॥ ६३ ॥ तय है जन्मसे मृत्यु मृत्युसे जन्म निश्चित । अटल उसका जो है व्यर्थका शोक है यह ॥ २७ ॥ ज्ञानेश्वरी ५०
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ २८ ॥ हैं यहां ये भूत समस्त । जन्मके पहले अमूर्त । फिर किया व्यक्तित्त्व प्राप्त । जन्म लेके ॥ ६४ ॥ मिटाकर अपना आकार । नाशसे बनते निराकार । जाते हैं मूल-रूपमें और । यथा स्थिति ॥ ६५ ॥ मध्यमें जो प्रतिभासे । निद्रितका स्वप्न जैसे । वैसे आकार मायासे । है सत्यरूपका ॥ ६६ ॥ न तो वायुने छेड़ा नीर । बना जैसे तरंगाकार । परापेक्षासे अलंकार । दीखता सोनेमें ॥ ६७ ॥ वैसे सकल हैं यह मूर्त । जान ले तू मायाका है रीत । जैसे आकाशमें है बिंबित । बादल सारे ॥ ६८ ॥ नहीं यहां जो मूलता । उसके लिये है रोता । देख तू नित तत्वता । चैतन्यएक ॥ ६९ ॥ उसकेलिये होकर पार्थ । विषय तज करके संत । रहते हैं सदैव विरक्त । एकांतमें ॥ १७० ॥ दृष्टि रखकर जिस पर । ब्रह्मचर्यादि व्रतको कर । तपाचरते मुनीश्वर । अनन्य हो ॥ ७१ ॥ आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनम् आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः । आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥ २९ ॥ अव्यक्त मूल भूतोंका मध्य है व्यक्त भासता । पुनः है अंत अव्यक्त इसमें शोक है कहां ॥ २८ ॥ आश्चर्य कोयी अवलोकता है आश्चर्य कोयी कहता यही है । आश्चर्य है वर्णित अन्य बातें सुने भी ना जान पाता इसे हैं ॥ २९ ॥ ५१ सांख्ययोग
अन्तरमें एक निश्चल । देख करके जो केवल । भूल गये हैं जो सकल । संसार मात्र ॥ ७२ ॥ गुणगान करता । उपरत हो चित्त । सदैव तल्लीनता । रहते हैं वे ॥ ७३ ॥ शांत होते सुनकर । देहभान भूलकर । पाते तद्रूप होकर । अनुभाव ॥ ७४ ॥ जैसे नदी-नद बहकर । सागरमें नहीं मिलकर । परांग्मुख आते लौटकर । ऐसा नहीं होता ॥ ७५ ॥ वैसे है योगियोंकी मति । पाकरके आत्मानुभूति । पुनः देह-तादात्म्य वृत्ति । पाती । नहीं ॥ ७६ ॥ देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वंशोचितुमर्हसि ॥ ३० ॥ देहमें जो सर्वत्र बसता । उसका घात कभी न होता । देख वह विश्वात्मक सत्ता । चैतन्य एक ॥ ७७ ॥ स्वभाव ही है इसका । होता जाता है सबका । इसमें क्या है शोकका । यहां कारण ॥ ७८ ॥ न तो भी हे अर्जुन । न जाने क्यों बुद्धिमान । शोक करना है हीन । सब प्रकारसे ॥ ७९ ॥ स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि । धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ ३१ ॥ क्षात्र धर्म महता— अबतक तू क्या सोचता । यह कैसी चिन्ता करता । स्वधर्म को ही है भूलता । जो है तारक ॥ १८० ॥ अमर नित्य जो आत्मा सबके देहमें बसा । इससे भूत-मात्रोंमें नकर शोक तू कभी ॥ ३० ॥ स्वधर्म देखके यों भी न योग्य डिगना तुझे । क्षत्रियोंको नहीं कोयी श्रेष्ठ है धर्म-युद्धसे ॥ ३१ ॥ ज्ञानेश्वरी ५२
कौरवोंका हुआ अनुचित । अथवा तेरा ही हुआ घात । या मानो हो गया है युगांत । तो भी यहां ॥ ८१ ॥ स्वधर्मे यह रहता एक । सदा जो आचरणीय नेक । तुझे वह है कृपा पूर्वक । तारेगा ही ॥ ८२ ॥ अर्जुन तेरा जो चित्त । हुआ यदि द्रवीभूत । किंतु यह अनुचित । संग्राममें ॥ ८३ ॥ हुवा यदि गायका दूध । पथ्यमें हुआ इससे बाध । करेगा विषसा प्रमाद । नव ज्वरमें ॥ ८४ ॥ वैसे असमयमें अनुचित । इससे होगा हितका घात । इसलिये हो सावध चित । कार्यकर ऊठ ॥ ८५ ॥ व्याकुल है तू अकारण । कर स्वधर्मका आचरण । उससे होगा सब रक्षण । तीनों कालमें ॥ ८६ ॥ जैसे सरल पथपे चलना । उपाय है अपायसे बचना । या है दीप प्रकाशमें चलना । न लगे ठोकर ॥ ८७ ॥ वैसे सुन तू अर्जुन । करस्वधर्माचरण । सकल कामना पूर्ण । होती हैं ॥ ८८ ॥ देखो इससे अन्य नहीं । क्षत्रियकेलिये जो सही । रणके बिन कछु कहीं । उचित धर्म ॥ ८९ ॥ हो करके निष्कपट । लडना अति विकट । देखना क्या रही बाट । प्रत्यक्षमें यहां ॥ १९० ॥ यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ ३२ ॥ स्वधर्माचरणकी अपूर्व स्वर्णसंधि— यह है युद्ध आजका । फल है तेरे दैवका । धरोहर है धर्मका । हुआ प्रकट ॥ ९१ ॥ हुवा प्राप्त अनायास स्वर्गका द्वार है खुला । भाग्य शाली क्षत्रियोंको मिलता धर्म-युद्ध है ॥ ३२ ॥ ५३ सांख्ययोग
इसे युद्ध कहे कैसा। यह है स्वर्गरूप सा । या तब प्रताप ऐसा । उत्तर आया ॥ ९२ ॥ या तेरे गुणों पर हो लुब्ध । उत्कट भावसे करबद्ध । स्वयंवरार्थ होकर सिद्ध । आयी है कीर्ति ॥ ९३ ॥ क्षत्रियों को अतीव पुण्यसे । लडने मिलते युद्ध ऐसे । मिलती है चिंतामणि जैसे । राह चलतेको ॥ ९४ ॥ अथवा देते हुये जंभायी । अमृतबूंद टपक आयी । ऐसी है यह लडाई आयी । स्वाभाविक हो ॥ ९५ ॥ अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि । ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥ ३३ ॥ करके इसकी अवहेलना । व्यर्थका शोक करते बैठना । अपना घात आपही करना । यह है ऐसा ॥ ९६ ॥ पूर्वजोंका जो यश संचित । अपनेसे खोना है निश्चित । शस्त्र त्यजना हो शोकग्रस्त । रणमें यहां ॥ ९७ ॥ इससे नष्ट होगी तब कीर्तिं । विश्व गायेगा तेरी अपकीर्तिं । मिलेगी महापापकी थाथी । निश्चित तुझे ॥ ९८ ॥ वनिता जो भर्तार रहित । होती सर्वत्र अनादरित । वैसे है जीवनका सतत । बिन स्वधर्मके ॥ ९९ ॥ अथवा रण-भूमिका प्रेत । होता गिद्धसे क्षत विक्षत । नर वैसा स्वधर्म रहित । होता महादोषसे ॥ १०० ॥ अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् । संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥ ३४ ॥ ऐसा जो धर्म संग्राम टालेगा यदि तू यहां । पायेगा पाप दुष्कीर्ति तजके धर्म युद्ध को ॥ ३३ ॥ सदैव लोग गायेंगे तेरी दुष्कीर्ति विश्वमें । अकीर्ति मृत्युसे हीन मानी पुरुषके लिये ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी ५४
यदि तू स्वधर्म छोडेगा । महापापका भागी होगा । कल्पांतमें भी न मिटेगा । कलंक अकीर्तिका ॥ १ ॥ भलोंको तब तक ही जीना । जब तक कुयश न पाना । इससे कैसे अब बचना कह तू अर्जुन ॥ २ ॥ निर्मत्सर तू सहृदयतासे । जायेगा लौट रण-भूमिसे । किंतु सभी न मानेंगे इसे । युद्ध भूमिमें ॥ ३ ॥ घेरेंगे यहां चहूं ओर । चलेंगे तीर पर तीर । कैसे होगा यहांसे पार । कृपालुतासे ॥ ४ ॥ इस प्राण संकटसे मुक्त । हुआ तो अपकीर्तिमें लिप्त । ऐसा जीवन भी है निश्चित । मृत्युसे हीन ॥ ५ ॥ भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः । येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥ ३५ ॥ न सोचता तू और एक बात । आया रणमें उत्साह सहित । लौटेगा यदि हो रण विरत । युद्ध भूमिसे ॥ ६ ॥ सोच देख तब अर्जुन । सोचेंगे क्या शत्रु दुर्जन । मानेंगे क्यां सत्य वचन । यह कहो मुझे ॥ ७ ॥ अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः । निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥३६ ॥ कहेंगे वे गयारे गया । पार्थ हमसे डर गया । यह वाक्य जो गूंज गया । तब क्या होगा ॥ ८ ॥ अनेक कष्ट करके जन । करते हैं स्वयश रक्षण । समय पे कर प्राणार्पण । आनंदसे ॥ ९ ॥ तुझे वह अनायाससे मिला अनजान भावसे । वह भी अद्वितीय जैसे । आकाश है ॥ २१० ॥ डरके रणसे भागा मानेंगे ये महारथी । मान्य तू इनमें आज पायेगा क्षुद्रता फिर ॥ ३५ ॥ बोलेंगे शत्रु जो तेरे अवाच्य कुत्सित सब । कोसेंगे शौर्य जो तेरा यह है अति दुःखद ॥ ३६ ॥ ५५ सांख्ययोग
कीर्ति है तेरी निःसीम । वैसी ही जो निरुपम । तेरे गुण भी उत्तम । तीनों लोकमें ॥ ११ ॥ नृपति जो हैं त्रिभुवनके । गाते हैं गीत भाट बनके । डरते गीत सुनकरके । कृतांत भी वे ॥ १२ ॥ ऐसी तेरी महिमा महान । गंगाकी गरिमाके समान । देख करके सुभट मर्न । चकित होता ॥ १३ ॥ पौरुष तेरा ऐसा अद्भुत । सुनकरके ये हैं समस्त । जीवनसे हुये वे विरक्त । अपने ही ॥ १४ ॥ सिंह गर्जनासे जैसे । कांपते हैं हाथी वैसे । कौरव तेरे भयसे । होते त्रस्त ॥ १४ ॥ जैसे हैं पर्वत वज्रसे । अथवा सर्प गरुड़से । वैसे अर्जुन हैं तुझसे । सहमतें सब ॥ १६ ॥ जायेगी वह महानता । चिपकेगी अति दीनता । यदि तू यहांसे लौटता । युद्धके बिना ॥ १७ ॥ किंतु तुझे ये भागने नहीं देंगे । पकड़ अति अपमान करेंगे । अमर्याद कटु वचन कहेंगे । तेरे ही सम्मुख ॥ १८ ॥ तब होगा विदीर्ण हृदय । अब न लड़ना क्यों कौंतेय । राज्य करेगा पाकर जय । पृथ्वीतलका ॥ १९ ॥ हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् । तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥ ३७ ॥ अथवा यहीं रण भूमिमें । पावोगे मृत्यु भी लड़नेमें । अनायास ही स्वर्ग लोकमें । पहुंचेगा तू ॥ २२० ॥ इसी लिये तू यहां पर । छोड़कर सारे विचार । करमें ले कमान तीर । लडो शीघ्र ॥ २१ ॥ मरनेसे स्वर्ग भोग जीतनेसे धरातल । तथैव पार्थ तू उठ युद्धार्थ कर निश्चय ॥ ३७ ॥ ज्ञानेश्वरी ५६
स्वधर्मका है आचरण । करता दोष निवारण । चित्तभ्रम किस कारण । जो है पाप ॥ २२ ॥ डूबेगा क्या कोई नांवसे । अड़े क्या कोई पथसे । सही न चलने आनेसे । होगा ये सब ॥ २३ ॥ अमृत-पान भी मारेगा । विष-सह यदि पीयेगा । स्वधर्म भी दोष लायेगा । सहेतुक जो ॥ २४ ॥ इसीलिये तुझको पार्थ । निरहेतुक हो सर्वथा । लडनेमें क्षात्र-धर्मार्थ । नहीं पाप ॥ २५ ॥ सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥ ३८ ॥ सम-बुद्धिसे लड — संतोष न मानना सुखमें । विषाद न मानना दुखमें । तथा लाभालाभ भी मनमें । नहीं धरना ॥ २६ ॥ यहां जो विषय भी होगा । या सर्वथा तन जायेगा । न सोचना आगे क्या होगा । पहलेसे ही ॥ २७ ॥ उचित जो अपना । स्वधर्म सो करना । प्राप्तव्यको भोगना । शांत भावसे ॥ २८ ॥ ऐसे होनेसे तू सम चित्त । होगा सहज ही पाप-मुक्त । इसलिये हो तू युद्ध रत । निश्चिंत भावसे ॥ २९ ॥ एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धियोंगे त्विमां शृणु । बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥ ३९ ॥ बुद्धियोगका वज्र कवच — सांख्य स्थिति यह संक्षिप्त । किया तुझको निरूपित । तभी होकरके निभ्रांत । लडना अब ॥ २३० ॥ हानि लाभ सुख दुःख सम हो हार जीतमें । फिर युद्धार्थ हो सिद्ध न होगा पाप लिप्त तू ॥ ३८ ॥ सांख्य बुद्धि यही जान सुन तू योग बुद्धि भी । तोडेगा उससे सारे जगमें कर्म बंधन ॥ ३९ ॥ (४) ५७ सांख्ययोग
जो है बुद्धि युक्त । सुनो वह पार्थ । कर्म-बंध मुक्त । रहता सदा ॥ ३१ ॥ वज्र कवच पहननेसे । शस्त्रोंकी वर्षांमें भी है जैसे । शरीर रहता है उससे । अचुंबित ॥ ३२ ॥ नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ ४० ॥ ईश्वरार्पित बुद्धिसे अनासक्त कर्म — मिटता नहीं जिससे लौकिक । सहज मिलता पारलौकिक । चल आया पूर्वानुक्रम देख । शुद्ध रूपसे ॥ ३३ ॥ कर्माधारसे बरतना । कर्म फलको न देखना । मंत्रज्ञको मुक्त रहना । भूत बाधासे ॥ ३४ ॥ उस पर जो सुबुद्धि । अपनेको निरवधि । मिलने पर उपाधि । नहीं लगती ॥ ३५ ॥ न जा वहां पुण्य-पाप । जो है अति सूक्ष्म निष्कंप । औ' गुणत्रयादिका लेप । चढता नहीं ॥ ३६ ॥ अर्जुन ऐसा यदि पुण्यवश । हुआ हृदयमें बुद्धि प्रकाश । होगा उससे ही अशेष नाश । संसारका भय ॥ ३७ ॥ व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ ४१ ॥ जैसे छोटीसी दीप-ज्योति । तेजसे प्रकाशती अति । वैसे न मानता सुमति । अल्पसी कभी ॥ ३८ ॥ सुन तू पार्थ अनेक प्रकार । चाहते हैं बुद्धि विचार शूर । किंतु है दुर्लभ सचराचर । सद्वासना ॥ ३९ ॥ चूकता जो न आरंभ न बने विपरीत भी । अल्प भी यह धर्मांश तारता भयसे महा ॥ ४० ॥ बुद्धि एकाग्र होती है इसमें दृढ होकर । अनंत बहु शाखाकी बुद्धि निश्चय हीनकी ॥ ४१ ॥ ज्ञानेश्वरी ५८ (8)
जैसे वस्तु अनेक मिलते । वैसे पारस नहीं मिलते । अमृत-बिंदु हैं मिलते । दैव योगसे ॥ २४० ॥ वैसी दुर्लभ है सद्बुध्दि । जिसे परमात्म ही अवधि । जैसे भागीरथीको उदधि । निरंतर ॥ ४१ ॥ नहीं जिसे ईश्वरके बिन । कोई अन्य है अवलंबन । वही एक सद्बुध्दि है जान । इस जगतमें ॥ ४२ ॥ अन्य जो है सब दुर्मति । पाती है अनेक विकृति । वहां निरंतर सुमति । रमते हैं ॥ ४३ ॥ वेदवादविदोंके वाग्जालमें नहीं आओ— इसीलिये सुन उन्हे पार्थ । स्वर्ग संसार नर्ककी वार्ता । न कभी आत्म-सुख सर्वथा । मिलता देखने भी ॥ ४४ ॥ यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः । वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥ ४२ ॥ वेदके आधारसे हैं बोलते । केवल कर्म-प्रतिष्ठा करते । किंतु आसक्ति हैं नित धरते । कर्म फलोंमें ॥ ४५ ॥ संसारमें जनम लेकर । यज्ञ यागादि कर्मको कर । भोगो स्वर्ग सुख मनोहर । कहते ऐसे ॥ ४६ ॥ यहां बिन इसके नहीं । अन्य सुख सर्वथा कहीं । अजी ! ऐसे बोलते यही । दुर्बुद्ध लोग ॥ ४७ ॥ कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् । क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥ ४३ ॥ देखो कामनासे अभिभूत । होकरके कर्म-आचरित । केवल वे भोगमें दे चित्त । अपना सारा ॥ ४८ ॥ अनाडी व्यर्थकी बात कहते हैं फुलाकर । वेदके करते वाद कहते अन्य ना कछु ॥ ४२ ॥ जन्म लेके करो कर्म पावोगे भोग वैभव । लो कर्म फल स्वादिष्ट कहते स्वर्ग कामुक । ४३ ॥ ५९ सांख्ययोग
क्रिया विशेषको बहुव । नहीं लोपते विधिवत । निपुण हो धर्ममें रत । करते हैं नित्य ॥ ४९ ॥ भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयाऽपहृतचेतसाम् । व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ ४४ ॥ किंतु करते एक बुरी बात । स्वर्ग कामनामें हो लिप्त चित्त । भूलते हैं यज्ञ पुरुषको नित । भोक्ता है जो ॥ २५० ॥ बनाकर जैसे कर्पूरका ढेर । उसमें आग लगाकरके फिर । अथवा मिष्ठान्न भला पकाकर । मिला दिया विष ॥ ५१ ॥ पाकर अमृतकुंभ दैवसे । ठुकराते हैं उसको पैरसे । नासते हैं धर्म-कृत्यको वैसे । करके फलाकांक्षा ॥ ५२ ॥ पुण्य करते हैं सायास । धरके संसारकी आस । विवेक बिनु करें नास । करें क्या ॥ ५३ ॥ जैसे घरका सुग्रास भोजन । बेचते लेकरके कुछ धन । वैसे खाते हैं धर्म मति-हीन । भोगार्थि जो ॥ ५४ ॥ इसीलिये सुन तू पार्थ । दुर्बुद्धिमें होकर लिप्त । ये वेदवाद रत सतत । आचरते हैं ॥ ५५ ॥ त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥४५॥ तीन गुणोंसे है आवृत । जानो ये वेद निर्भ्रांत । उपनिषदादि समस्त । हैं सात्विक ॥ ५६ ॥ है यहां रज रज-तमात्मक । जहां है निरूपण कर्मादिक । जो हैं केवल ही स्वर्ग सूचक । धनुर्धर ॥ ५७ ॥ लुभायी जिससे बुद्धि भोग वैभवमें फंसी । न होती बुद्धि स्थायी समाधिमें कंभी स्थिर ॥ ४४ ॥ तीन गुण वदे वेद उनसे हो अलिप्त तू । तथा निश्चित निर्द्वन्द्व सत्वस्थ योग क्षेममें ॥ ४५ ॥ ज्ञानेश्वरी ६०