ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअन्तरमें एक निश्चल । देख करके जो केवल । भूल गये हैं जो सकल । संसार मात्र ॥ ७२ ॥ गुणगान करता । उपरत हो चित्त । सदैव तल्लीनता । रहते हैं वे ॥ ७३ ॥ शांत होते सुनकर । देहभान भूलकर । पाते तद्रूप होकर । अनुभाव ॥ ७४ ॥ जैसे नदी-नद बहकर । सागरमें नहीं मिलकर । परांग्मुख आते लौटकर । ऐसा नहीं होता ॥ ७५ ॥ वैसे है योगियोंकी मति । पाकरके आत्मानुभूति । पुनः देह-तादात्म्य वृत्ति । पाती । नहीं ॥ ७६ ॥ देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वंशोचितुमर्हसि ॥ ३० ॥ देहमें जो सर्वत्र बसता । उसका घात कभी न होता । देख वह विश्वात्मक सत्ता । चैतन्य एक ॥ ७७ ॥ स्वभाव ही है इसका । होता जाता है सबका । इसमें क्या है शोकका । यहां कारण ॥ ७८ ॥ न तो भी हे अर्जुन । न जाने क्यों बुद्धिमान । शोक करना है हीन । सब प्रकारसे ॥ ७९ ॥ स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि । धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ ३१ ॥ क्षात्र धर्म महता— अबतक तू क्या सोचता । यह कैसी चिन्ता करता । स्वधर्म को ही है भूलता । जो है तारक ॥ १८० ॥ अमर नित्य जो आत्मा सबके देहमें बसा । इससे भूत-मात्रोंमें नकर शोक तू कभी ॥ ३० ॥ स्वधर्म देखके यों भी न योग्य डिगना तुझे । क्षत्रियोंको नहीं कोयी श्रेष्ठ है धर्म-युद्धसे ॥ ३१ ॥ ज्ञानेश्वरी ५२