ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 119, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंअव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ २८ ॥ हैं यहां ये भूत समस्त । जन्मके पहले अमूर्त । फिर किया व्यक्तित्त्व प्राप्त । जन्म लेके ॥ ६४ ॥ मिटाकर अपना आकार । नाशसे बनते निराकार । जाते हैं मूल-रूपमें और । यथा स्थिति ॥ ६५ ॥ मध्यमें जो प्रतिभासे । निद्रितका स्वप्न जैसे । वैसे आकार मायासे । है सत्यरूपका ॥ ६६ ॥ न तो वायुने छेड़ा नीर । बना जैसे तरंगाकार । परापेक्षासे अलंकार । दीखता सोनेमें ॥ ६७ ॥ वैसे सकल हैं यह मूर्त । जान ले तू मायाका है रीत । जैसे आकाशमें है बिंबित । बादल सारे ॥ ६८ ॥ नहीं यहां जो मूलता । उसके लिये है रोता । देख तू नित तत्वता । चैतन्यएक ॥ ६९ ॥ उसकेलिये होकर पार्थ । विषय तज करके संत । रहते हैं सदैव विरक्त । एकांतमें ॥ १७० ॥ दृष्टि रखकर जिस पर । ब्रह्मचर्यादि व्रतको कर । तपाचरते मुनीश्वर । अनन्य हो ॥ ७१ ॥ आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनम् आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः । आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥ २९ ॥ अव्यक्त मूल भूतोंका मध्य है व्यक्त भासता । पुनः है अंत अव्यक्त इसमें शोक है कहां ॥ २८ ॥ आश्चर्य कोयी अवलोकता है आश्चर्य कोयी कहता यही है । आश्चर्य है वर्णित अन्य बातें सुने भी ना जान पाता इसे हैं ॥ २९ ॥ ५१ सांख्ययोग