ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि भी वह अखंड रहता । अन्तमें है सागरसे मिलता । मध्यमें वह बहता रहता । दीखता वैसे ॥ ५४ ॥ वैसे ही यहां ये तीन । चलते एक समान । असंभव है अर्जुन । रोकना इसको ॥ ५५ ॥ इसलिये इस बातका । कारण नहीं शोकका । स्वभाव ही है इसका । मूल रूपसे ॥ ५६ ॥ न तो भी सुन अर्जुन । जीव जन्म मरणाधीन । देख कर यह कारण । शोक है व्यर्थ ॥ ५७ ॥ इससे यहां कुछ नहीं । शोकका कारण भी कहीं । टलता यहां कभी नहीं । जन्म औ' मरण ॥ ५८ ॥ जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ २७ ॥ अजी ! जन्मता जो सो नाशता । नाशता सो है पुनः दीखता । जैसे घटिका-यंत्र चलता । वैसे ही पार्थ ॥ ५९ ॥ या उदयास्त जैसे स्वभावसे । अखंडित होते जाते हैं वैसे । जन्म-मरण भी विश्वमें वैसे । हैं अनिवार्य ॥ १६० ॥ महाप्रलयके अवसर । होता त्रिभुवनका संहार । इसीलिये नहीं परिहार । आदि अन्तका ॥ ६१ ॥ जानकर तू यह मनमें । पडता क्यों व्यर्थ ही दुःखमें । जानकर बनता जनमें । पागलका--सा ॥ ६२ ॥ सब ढंगसे पार्थ । शोक है सब व्यर्थ । दुःखदायह सर्वथा । नहीं विषय ॥ ६३ ॥ तय है जन्मसे मृत्यु मृत्युसे जन्म निश्चित । अटल उसका जो है व्यर्थका शोक है यह ॥ २७ ॥ ज्ञानेश्वरी ५०