भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते । तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥ २५ ॥ है यह अनादि नित्य सिद्ध । निरुपाधि तथा विशुद्ध । इससे शस्त्रादिकोंसे छिद्र । न होता यह ॥ ४५ ॥ प्रलयोदकसे यह न भीगता । अग्निदाह यहां न संभवता ! महाशोषका प्रभाव न होता । मारुतके ॥ ४६ ॥ अर्जुन यह है नित्य । अचल तथा शाश्वत । सर्वत्र यह सदोदित । परिपूर्ण होता है ॥ ४७ ॥ अजी ! दृष्टिसे तर्ककी । भेंट न होती इसकी । ध्यानको इसकी भेंटकी । उत्कंठा है ॥ ४८ ॥ मनसे न होता प्राप्त । साधनासे अप्राप्त । निःसीम यह पार्थ । पुरुषोत्तम ॥ ४९ ॥ है गुणत्रय रहित । व्यक्तिकेलिये अतीत । अनादि औ' अविकृत । स्वरुप इसका ॥ ५० ॥ अर्जुन इसको ऐसे जानना । सकलात्मक रूप ही देखना । इससे सहज ही शोक पूर्ण । मिटेगा तेरा ॥ ५१ ॥ अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् । तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥ २६ ॥ यदि तू ऐसा नहीं जानता । अन्तवन्त ही इसे मानता । तब भी कहो कैसी है चिन्ता । पांडुकुमार ॥ ५२ ॥ जो है आदि स्थिति अंत । है निरंतर औ' नित । प्रवाह है अनुस्यूत । गंगा जलका-सा ॥ ५३ ॥ अचिंत्य वह अव्यक्त निर्विकारी कहे सब । ऐसी है जानके आत्मा तेरा शोक अकारण ॥ २५ ॥ अथवा देखता तू है जन्म-मृत्यु प्रति-क्षण । तो भी तुझे न है कोयी शोकका योग्य कारण ॥ २६ ॥ ४९ सांख्ययोग (7)