भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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जान तू ऐसी है यह माया । भ्रममें तू है व्यर्थ ही गया । शस्त्रसे वध किया तो छाया । न टूटता अंग ॥ १४० ॥ अथवा पूर्ण कुंभ उलट । दीखता बिंबाकार है टूटा । किंतु भानु-बिंब है अटूट । वैसे ही ॥ ४१ ॥ अथवा जैसे मठमें आकाश । मठकृतिसे बना मठाकाश । भंगनेसे मठके समावेश । महदाकाशमें ॥ ४२ ॥ लोप होनेसे वैसे शरीरका । नाश न होता कभी स्वरुपका । तभी आरोप न कर नाशका । भ्रांतिसे तू ॥ ४३ ॥ वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णान् अन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २२ ॥ जैसे जीर्ण वस्त्रको त्यजते । फिर नवीनको हैं ओढते । वैसे देहान्तर स्वीकारते । चैतन्यके ॥ ४४ ॥ नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ २३ ॥ अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयम् अक्लेद्योऽशोष्य एव च । नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ २४ ॥ उतारके जर्जर जीर्ण वस्त्र मनुष्य लेता दुसरे नवीन । तथैव तजके शरीर जीर्ण आत्मा भी लेता दुसरे नवीन ॥ २२ ॥ इसे न चुभते शस्त्र इसे अग्नि न बालता । न गलाता इसे पानी इसे वायू न सोखता ॥ २३ ॥ छिदता जलता ना जो गलता सूखता नहीं । स्थिर निश्चल है नित्य सर्व-व्यापी सनातन ॥ २४ ॥ ज्ञानेश्वरी ४८